0 पहले महिला जनप्रतिनिधि, मनमोहन राठौर,फिर जवाहर, अगला कौन…?
कोरबा। कोयला खनन के लिए एसईसीएल की परियोजनाओं को जमीन की जरूरत है। वर्षों पूर्व अधिग्रहित की गई जमीनों पर SECL को अपना आधिपत्य लेना है लेकिन भूविस्थापितों की लंबित कई जगह मुआवजा तो कई जगह रोजगार फिर सबसे बड़ी समस्या बसाहट में मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता को लेकर प्रबंधन के साथ टकराव के हालात अक्सर बना रहे हैं। भूविस्थापितों और SECL प्रबंधन के बीच जिला प्रशासन इस बात के लिए मजबूर है कि उसे SECL का साथ देना है और किसी भी तरह से जमीन पर काबिज कराना है ताकि कोयला खनन के लिए आवश्यक गतिविधियों को वह अंजाम दे सके। पुलिस कानून व्यवस्था बनाने के लिए मैदान में रहती है। इन तीनों के बीच कहीं ना कहीं भूविस्थापित पिस रहे हैं, ज्यादातर वे भूविस्थापित पिस रहे हैं जिनके पास कोई अप्रोच नहीं है, कोई पहुंच नहीं है और वह अपने हक के लिए कहीं ना कहीं भीड़ में अकेले ही लड़ रहे हैं। जो सेटिंगबाज हैं, जिनका अंदरूनी दखल है व अप्रोच रखते हैं वे प्रबंधन के साथ मिलकर नौकरी हासिल करने के बाद घर बैठे अपना वेतन ले रहे हैं। वह SECL की नजर में एक मध्यस्थ की भूमिका में भी हैं जो कभी इधर से तो कभी उधर से बात करके प्रबंधन का भला करते हैं।
इन सब के बीच अब जब खासकर दीपका विस्तार परियोजना की बात आती है तो यहां ग्राम मलगांव एक बड़ा रोड़ा बना हुआ है। मलगांव को पूरी तरह से विस्थापित करने का काम सरकारी रिकॉर्ड में हो चुका है और अधिकारियों की मानें तो यह गांव विलोपित भी हो गया है लेकिन दूसरी तरफ यहां जमीनों और परिसंपत्तियों का मुआवजा को लेकर तकरार अभी भी चल रही है। इस तकरार के बीच एसडीएम कार्यालय के बाबू मनोज गोविल और कोयला ट्रांसपोर्टर श्यामू जायसवाल के परिजनों व रिश्तेदारों का फर्जी मुआवजा काफी चर्चा में रहा। मुआवजा की लड़ाई को लेकर मलगांव के पंच जवाहर सिंह चौहान ने पिछले वर्षों में आवाज बुलंद की और गांव के प्रमुखों तथा प्रभावित ग्रामीणों के साथ मिलकर हस्ताक्षरित शिकायत पत्र शासन-प्रशासन, पुलिस स्तर तक पहुंचाने का काम किया। बीच बाजार में उसे हाथ-पैर के टूटते तक मारा भी गया जिस पर एफआईआर दर्ज हुई। इसका एक हाथ पूर्व से लकवाग्रस्त है और पैर टूटने के बाद उसे चलने में दिक्कत होती है।
सूत्रों के मुताबिक हाल ही में गेवरा परियोजना प्रबंधन के द्वारा शिकायत दीपका थाना में की गई इसमें जिन लोगों के विरुद्ध कोयला चोरी करने-कराने की शिकायत की गई है,उसमें से कुछ की गिरफ्तारी हुई है तो कुछ फरार हैं। इन फरार लोगों में पूर्व पंच जवाहर सिंह चौहान भी शामिल है जिस पर कोयला चोरी का आरोप लगाया गया है। कोयला प्रभावित भूविस्थापित क्षेत्र में जवाहर सिंह चौहान के विरुद्ध कोयला चोरी का अपराध दर्ज होने की बात किसी अचरज से काम नहीं। हालांकि, अब वर्षो बाद उसका पिछला रिकार्ड भी तलाशा जा रहा है। यह बात और है कि जवाहर सिंह चौहान व अन्य ग्रामीणों की शिकायत पर जांच के बाद अंतत: मनोज गोविल के परिजनों का करोड़ों का फर्जी मुआवजा वितरण होने से बचा लिया गया लेकिन एकाएक इतने वर्षों के बाद जवाहर सिंह चौहान वांटेड अपराधी बन गया। उस पर कोयला चोरी जैसा आरोप लगाया जाना कहीं ना कहीं इस बात को भी बल देता है कि प्रबंधन अपने रास्ते के कांटों को हटाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तत्पर है। मोस्ट वांटेड अपराधी की तरह जवाहर सिंह के घर पर एक राजस्व अधिकारी के साथ आधी रात के बाद दबिश दी जा रही है जिसका सीसीटीवी फुटेज भी सामने आया है।
हालांकि जवाहर सिंह ने पूर्व में इस बात की आशंका विभिन्न माध्यमों पर लिखे गए आवेदन में जताई है कि उसे किसी भी झूठे मामले में साजिश के तहत फंसाया जा सकता है और यह आशंका सही साबित हुई। उसने पुनः बिलासपुर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक को पत्र लिखकर झूठे मामले में फंसा देने का जिक्र करते हुए न्याय की गुहार लगाई है। अब देखना यह है कि SECL की नीतियों से भूविस्थापितों की लड़ाई लड़ने वाले, अपने हक के लिए लड़ने वाले लोग कितना बच पाते हैं और कितना उलझते जाते हैं..क्योंकि प्रबन्धन व अधिकारियों की नजर में ये लोग अपने हक के लिए पब्लिक न्यूसेन्स क्रिएट करते हैं….!
0 संगठन शक्ति में सेंध
दूसरी तरफ SECL प्रबंधन अपनी अर्जित की गई जमीनों पर काबिज होने के लिए प्रयासरत है। अब वह साम-दाम-दंड-भेद की नीति पर उतर आया है, ऐसी चर्चा भूविस्थापितों के बीच से निकलकर आई है।कोयला खनन की राह में जमीन का रोड़ा दूर करने के लिए प्रबंधन ने भूविस्थापित नेताओं की एकता को तोड़ने का काम किया और कभी फ्रंट पर आकर लड़ने वाले भुविस्थापितो के रहनुमा नेता अब धीरे-धीरे बैक फुट पर जाते हुए गायब से हो गए हैं। जो कुछ लोग बचे हैं वह एकजुटता और संगठन शक्ति के साथ लड़ने पर जोर देते हैं लेकिन अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए भी इन्हें एकजुट करना टेढ़ी खीर साबित होने लगा है। कारण बताया जा रहा है कि प्रबंधन ने इन्हें अलग-अलग तवज्जो देना शुरू कर दिया है और जब किसी को तवज्जो मिलने लगती है तो वह अपने आप को महान समझने लगता है। कुछ ऐसी ही भावनाएं भूविस्थापितों के लिए लड़ने वालों के मन में घर करने लगी है और वह किसी संगठन के बैनर तले रहने की बजाय स्वतंत्र होकर रहनुमा बनने की भूमिका में हैं। कुछ लोगों को पैसे के बल पर अपने साथ करने की कोशिश में प्रबंधन के पुराने अधिकारी और दलालनुमा लोग सफल हुए, फिर अब जो लोग सीधी तरह से रास्ते में नहीं आ रहे हैं, जमीन के अर्जन में रोड़ा बन रहे हैं तो उन्हें रास्ते से हटाने के लिए दंड की नीति का सहारा लिया गया है।
बताते चलें कि भूविस्थापितों की लड़ाई में ही एक महिला जनप्रतिनिधि पर 3 करोड़ से अधिक की रिकवरी प्रबंधन के द्वारा निकाली गई। जब छात्र नेता मनमोहन राठौर ने हरदी बाजार कॉलेज के संबंध में लड़ाई लड़ी तो उसके खिलाफ भी एफआईआर दर्ज कराते हुए जेल भेजा गया और उसे जमानत करानी पड़ी। अभी जब एक साथ सभी खदानों में बंदी का आंदोलन किया गया तो आंदोलन के अगुआ नेताओं को साथ देने वाले विभिन्न पंचायतों के सरपंचों को अलग-थलग करने की नीति पर भी काम किया गया है। पूर्व के कई श्रमिक नेताओं को प्रबंधन ने कोई ना कोई काम-धंधे में लगवा कर, उनकी गाड़ियां चलवा कर साधने की कोशिश की और ऐसे लोग जो इन्हीं भूविस्थापितों के नाम का सहारा लेकर अपनी श्रमिक राजनीति की शुरुआत की, वह आज इनको भूल बैठे हैं- उनके हाल पर छोड़ दिए हैं क्योंकि उनका कथित स्वार्थ अब सिद्ध होने लगा है। इन सबके बीच मुआवजा, रोजगार, बसाहट की मांगे स्थानीय प्रशासन से लेकर CMD स्तर तक अनिराकृत ही हैं।










