कोरबा। डीएमएफ की राशि से कराए जाने वाले निर्माण और सामग्रियों की आपूर्ति में जमकर किए गए कमीशन खोरी के खेल में जिले में अब तक कई चौंकाने वाले खुलासे हो चुके हैं। पहले जहां सिर्फ जनपद पंचायतों के सीईओ के नाम सामने आए थे, अब उनके कार्यकाल में काम करने वाले बाबुओं और दलालों के नाम भी उजागर हो गए हैं।
इस घोटाले में ठेके देने और बिल पास करने के बदले अधिकारियों और कर्मचारियों को कमीशन दिया गया, ऊंचे पदों पर बैठे अफसरों को 7% तक का कमीशन मिलता था। क्लर्क (बाबू) को 1% से 2% कमीशन दिया जाता था। बिना कमीशन तय किए कोई भी बिल पास नहीं होता था। कोरबा जिले में पदस्थ रहे तत्कालीन जनपद सीईओ (CEO) वीके राठौर – पाली और कटघोरा (कोरबा), भुनेश्वर राज – जनपद पंचायत डोंडी, (बालोद), राधेश्याम मिर्झा – जनपद पंचायत पोड़ी उपरोड़ा (कोरबा), आरएस सेंगर – जनपद पंचायत सूरजपुर। इनमें मिर्झा, राठौर,बभुनेश्वर और भरोसा राम ठाकुर की गिरफ्तारी हो चुकी है।
0 बाबू (क्लर्क) जिनके नाम सामने आए: भारद्वाज बाबू, शर्मा बाबू, सूर्यवंशी बाबू, निषाद बाबू सभी कोरबा जिला, नोडल ऑफिसर: भरोसा राम ठाकुर – डीएमएफ फंड, कोरबा
0 बिचौलिए जिन्होंने फर्जी बिल और लेन-देन में भूमिका निभाई:
मनोज कुमार द्विवेदी, रवि शर्मा, पियूष साहू, अब्दुल : इन लोगों ने फर्जी बिल लगाकर भुगतान कराया। मनोज द्विवेदी ने ईडी को बताया कि अब्दुल और शेखर नाम के व्यक्ति 3% कमीशन लेकर टेंडर का नकली बिल बनाते थे।
कितना बड़ा घोटाला है, शुरुआत कहां से हुई।
22-23 करोड़ के टेंडर पर 2.5 से 3 करोड़ रुपए तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू को कमीशन के रूप में दिए गए। कारोबारी संजय शेंडे ने तीन अलग-अलग फर्मों के नाम पर 130 करोड़ रुपए के काम किए, जिसमें से 20 करोड़ कमीशन रानू साहू को दिया गया फर्मों को सोलर लाइट, आंगनबाड़ी सामग्री और कृषि यंत्र सप्लाई करने का काम मिला था।
जांच रिपोर्ट के अनुसार, DMF घोटाले की शुरुआत बालोद जिले से हुई थी। उस समय रानू साहू बालोद की कलेक्टर थीं। बाद में जब वह कोरबा कलेक्टर बनीं, तो यह खेल वहां भी चला। DMF फंड, जो जिले के खनिज संपदा से होने वाली आमदनी से जनता के विकास के लिए बनाया गया था, उसे योजनाओं के नाम पर लूट लिया गया। अब इस मामले की गहराई से जांच हो रही है और इसमें और भी बड़े नाम सामने आने की संभावना है।