0 CGM संजय कुमार मिश्रा पर गंभीर आरोप
0 दीपका के बाद अब गेवरा में भी डराने और आवाज दबाने का खेल शुरू
0 मुआवजा, पुनर्वास और बुनियादी हक मांगने पर थमाए जा रहे लीगल नोटिस और झूठी एफआईआर
0 मलगांव मुआवजा मामले में सीबीआई एंट्री के पीछे की साजिश पर उठे सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग
कोरबा। साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के दीपका और गेवरा खदान क्षेत्रों में भू-विस्थापितों किसानों और आउटसोर्सिंग कंपनियों के मजदूरों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का एक खतरनाक सिलसिला शुरू हो चुका है अपने जायज हक रोजगार मुआवजा बसाहट और बुनियादी सुविधाओं के लिए आवाज उठाने वाले आंदोलनकारियों की आवाज को दबाने के लिए कोर्ट और पुलिस-प्रशासन का गलत सहारा लिया जा रहा है इस पूरे दमन चक्र के केंद्र में एसईसीएल दीपका के पूर्व मुख्य महाप्रबंधक (CGM) और वर्तमान में गेवरा के सीजीएम संजय कुमार मिश्रा की कार्यप्रणाली पर गंभीर आरोप लग रहे हैं ।
दीपका से शुरू हुआ दमन का मॉडल अब गेवरा में सक्रिय
प्राप्त जानकारी के अनुसार संजय कुमार मिश्रा ने दीपका में पदभार ग्रहण करते ही आंदोलनकारियों और हक की लड़ाई लड़ने वाले भू-विस्थापितों के खिलाफ दंडात्मक रुख अपनाया था आंदोलन को दबाने के लिए कोर्ट के माध्यम से भारी-भरकम पेनाल्टी के लीगल नोटिस भेजना और स्थानीय थानों का दुरुपयोग कर झूठे मुकदमे दर्ज कराना मानो उनकी कार्यशैली का रामबाण फार्मूला बन चुका है अब दीपका से स्थानांतरण होकर गेवरा खदान के मुख्य महाप्रबंधक (CGM) का पद संभालते ही उन्होंने वही दमनकारी और भय का माहौल गेवरा क्षेत्र में भी निर्मित करना शुरू कर दिया है ।
हक मांगने पर मिलती है कानूनी प्रताड़ना
आरोप है कि प्रभावित ग्रामीण और मजदूर जब अपने बुनियादी अधिकारों जैसे:—
०१. किसानों के लिए:- रोजगार उचित मुआवजा बसाहट और पुनर्वास नीति का पालन ।
०२. मजदूरों के लिए:- एचपीसी (HPC) दर पर भुगतान सुरक्षा उपकरण पीएफ (PF) आई कार्ड और मेडिकल सुविधाएं ।
इन मांगों को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करते हैं तो उनकी जायज मांगों को पूरा करने के बजाय उन्हें कानूनी पचड़ों में फंसाकर मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है ।
जिस किसान की जमीन पर देश का कोयला उत्खनन हो रहा है उसे अपनी ही जमीन के बदले हक मांगने पर अपराधी की तरह देखा जा रहा है कोर्ट और थानों का डर दिखाकर किसानों-मजदूरों को चुप कराने की यह कोशिश तानाशाही की पराकाष्ठा है ।
मलगांव मुआवजा विवाद, सीबीआई जांच की आड़ में महाघोटाले के आरोप
प्रेस को जारी बयान में यह भी सनसनीखेज आरोप लगाया गया है कि मलगांव और अमगांव ग्राम पंचायत के भू-अर्जन व अधिग्रहण की कार्रवाई के दौरान विस्थापितों और मजदूरों के बीच खौफ पैदा करने के लिए सुनियोजित तरीके से सीबीआई (CBI) को इन्वॉल्व किया गया स्थानीय सूत्रों का दावा है कि मलगांव में असल में मुआवजा वितरण का एक महाघोटाला हुआ है जिसे संजय कुमार मिश्रा के इशारे पर अंजाम दिया गया यदि इस पूरे मामले की बिना किसी दबाव के निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की जाए तो इस घोटाले के मुख्य सूत्रधार और मुख्य आरोपी के तौर पर स्वयं वर्तमान सीजीएम का नाम सबसे सामने आएगा ।
दीपका के बाद अब गेवरा में मलगाँव जैसी तबाही की तैयारी, CGM संजय कुमार मिश्रा का सीक्रेट मास्टर प्लान तैयार, नराईबोध भिलाईबाजार और रलिया के किसानों पर उजाड़ होने का खतरा
दीपका खदान के पूर्व सीजीएम (CGM) और वर्तमान में गेवरा के CGM संजय कुमार मिश्रा ने अब एक नया चक्रव्यूह तैयार कर लिया है। दीपका के मलगाँव में जिस तरह से भूविस्थापितों को उजाड़कर उनके हाल पर छोड़ दिया गया ठीक उसी स्क्रीन प्लान के तहत अब नराईबोध, भिलाईबाजार और रलिया की जमीनों को अधिग्रहित करने की पूरी बिसात बिछाई जा चुकी है ।
आशंका जताई जा रही है कि प्रबंधन के इस चक्रव्यूह के कारण इन तीन गाँवों के हजारों ग्रामीण और भूविस्थापित किसान परिवार एक बार फिर अपने बुनियादी अधिकारों के लिए दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर होंगे ।
मलगाँव का खौफनाक इतिहास दोहराने की साजिश?
विस्थापितों के बीच इस बात को लेकर भारी आक्रोश और डर का माहौल है कि वर्तमान सीजीएम का पिछला ट्रैक रिकॉर्ड बेहद निराशाजनक रहा है आरोप है कि मलगाँव में:-
०१. जमीनों का अधिग्रहण तो कर लिया गया लेकिन हकदार किसानों को उचित मुआवजा नहीं मिला ।
०२. रोजगार बसाहट और पुनर्वास जैसी बुनियादी सुविधाओं के नाम पर सिर्फ खोखले आश्वासन दिए गए ।
०३. पूरा गाँव खाली होते ही प्रबंधन ने अपनी पीठ फेर ली और भूविस्थापितों को उनके नसीब के भरोसे छोड़ दिया ।
जब तक पूरा गाँव खाली नहीं होता तब तक बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं जैसे ही जमीन हाथ में आई प्रबंधन किसानों को पहचानने से भी इनकार कर देता है यही खेल अब नराईबोध भिलाईबाजार और रलिया में खेलने की तैयारी है ।
अधिकारों की लड़ाई, अब चुप नहीं बैठेंगे ग्रामीण
प्रबंधन की इस कथित स्क्रीन प्लान की भनक लगते ही प्रभावित गाँवों में सुगबुगाहट तेज हो गई है ग्रामीणों का साफ कहना है कि वे मलगाँव के किसानों जैसी दुर्दशा अपनी नहीं होने देंगे यदि बिना ठोस पुनर्वास नीति तय रोजगार और शत-प्रतिशत मुआवजे के बिना दमनकारी नीति अपनाई गई तो बर्दाश्त नहीं किया जाएगा ।
सवाल यह उठता है कि क्या विकास के नाम पर हर बार सिर्फ गरीब किसानों की ही बलि चढ़ाई जाएगी?
आर-पार की लड़ाई का शंखनाद
स्थानीय विस्थापित संगठनों किसान नेताओं और श्रमिक संगठनों ने इस तानाशाही रवैये की कड़े शब्दों में निंदा की है आंदोलनकारियों का साफ कहना है कि नोटिस और मुकदमों के दम पर किसानों और मजदूरों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता यदि जल्द ही इस दमनकारी नीति पर रोक नहीं लगी और विस्थापितों-मजदूरों की समस्याओं का सम्मानजनक समाधान नहीं हुआ तो आने वाले दिनों में एसईसीएल प्रबंधन के खिलाफ एक बड़ा और उग्र जन-आंदोलन खड़ा किया जाएगा जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी प्रबंधन की होगी ।








