खसरा नंबर 390 की 0.2630 हेक्टेयर भूमि का विवाद, दूसरे की जमीन पर कथित कब्जे और निर्माण के आरोप, तहसीलदार के इश्तहार के बाद बढ़ी हलचल, जांच की आंच राजस्व अधिकारियों तक पहुंचने की भी आशंका
कोरबा-पसान। पसान में जमीन से जुड़ा एक विवाद अब गंभीर सवालों का रूप ले चुका है। हरी प्रसाद शास्त्री का नाम सामने आए इस मामले में दूसरे व्यक्ति की भूमि पर कथित कब्जा कर निर्माण किए जाने के आरोप लगाए गए हैं। मामला ग्राम पसान, प.ह.नं. 03 स्थित खसरा नंबर 390, रकबा 0.2630 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। तहसीलदार पसान द्वारा 13 अगस्त 2026 को जारी इश्तहार के बाद मामला अब औपचारिक राजस्व प्रक्रिया में पहुंच गया है।
तहसीलदार कार्यालय के इश्तहार के अनुसार संबंधित भूमि वर्तमान ऑनलाइन राजस्व अभिलेख में उर्मिला देवी, पति हरी प्रसाद के नाम दर्ज बताई गई है, जबकि रामप्रताप पिता शिवरतन, निवासी पसान ने इसी भूमि पर अपना दावा प्रस्तुत करते हुए राजस्व अभिलेख में सुधार की मांग की है। आवेदन के साथ बी-01, खसरा और ऋण पुस्तिका सहित दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने की बात सामने आई है।
यहीं से विवाद की असली तस्वीर सामने आती है। एक तरफ ऑनलाइन राजस्व रिकॉर्ड में एक नाम दर्ज है, दूसरी तरफ दूसरे पक्ष द्वारा उसी जमीन पर अपना अधिकार जताया जा रहा है और साथ ही दूसरे की भूमि पर कथित कब्जा कर निर्माण किए जाने के आरोप भी सामने हैं। ऐसे में अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रिकॉर्ड में किसका नाम है, बल्कि सवाल यह है कि मौके पर जमीन पर कब्जा किसका है और निर्माण किस अधिकार के आधार पर किया गया।
दूसरे की जमीन पर कब्जा और निर्माण का आरोप
मामले से जुड़े आरोपों के मुताबिक हरी प्रसाद शास्त्री पर दूसरे व्यक्ति की भूमि पर कब्जा कर निर्माण कराने का आरोप है। यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो मामला सामान्य भूमि विवाद नहीं रहेगा। तब यह जांच जरूरी होगी कि निर्माण कब कराया गया, किसने कराया, निर्माण के समय भूमि का राजस्व रिकॉर्ड क्या था और क्या निर्माणकर्ता के पास उस भूमि पर वैध अधिकार मौजूद था। सवाल यह भी है कि क्या पहले भूमि पर कब्जा किया गया और उसके बाद निर्माण के जरिए कब्जे को मजबूत करने की कोशिश हुई? फिलहाल यह आरोप है और इसकी पुष्टि सक्षम जांच से ही हो सकती है, लेकिन आरोप की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन द्वारा मौके की जांच और सीमांकन बेहद जरूरी हो जाता है।
विवादों से नाम जुड़ने के आरोप, अब पुराने मामलों की भी पड़ताल?
गौरतलब है कि हरी प्रसाद शास्त्री को लेकर जमीन संबंधी विवादों और दूसरे की भूमि पर कब्जे जैसे आरोपों की चर्चा सामने आती रही है। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि दूसरों की जमीन पर कब्जा करना और जमीन हथियाने की कोशिश करना कथित तौर पर उनका तरीका रहा है। हालांकि इस तरह के आरोपों को प्रमाणित तथ्य मानने से पहले संबंधित पुराने मामलों के दस्तावेज, शिकायतें, राजस्व आदेश और न्यायिक रिकॉर्ड की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होगी। यदि प्रशासनिक रिकॉर्ड में इसी प्रकृति के अन्य प्रकरण मौजूद हैं और उनमें समान परिस्थितियां सामने आती हैं, तो उन मामलों की भी नियमानुसार जांच की जा सकती है। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौजूदा विवाद एक अलग घटना है या इसके पीछे कोई व्यापक पैटर्न है।
अब जांच सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रहेगी
इस मामले की गंभीरता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि यदि जमीन के रिकॉर्ड और मौके की स्थिति में अंतर सामने आता है, तो राजस्व प्रक्रिया की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी। आखिर जमीन का रिकॉर्ड कैसे तैयार हुआ? किस आधार पर नाम दर्ज हुआ? दस्तावेजों की जांच किस स्तर पर हुई? क्या मौके का सत्यापन किया गया? क्या सीमांकन कराया गया? और यदि किसी व्यक्ति की भूमि पर कथित रूप से कब्जा हुआ तथा निर्माण भी हो गया, तो संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी कब हुई?
यदि जांच में किसी राजस्व अधिकारी या कर्मचारी की जानबूझकर लापरवाही, नियमविरुद्ध कार्रवाई, रिकॉर्ड में हेरफेर या किसी पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने की भूमिका सामने आती है, तो जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों तक भी पहुंच सकती है। ऐसे में इस मामले की जांच का दायरा केवल जमीन पर कथित कब्जे तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा।
तहसीलदार के इश्तहार के बाद प्रशासन की अग्निपरीक्षा
तहसीलदार पसान ने संबंधित भूमि को लेकर आम और खास व्यक्तियों से दावा-आपत्ति आमंत्रित की है। 19 अगस्त 2026 तक दावा या आपत्ति प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है। अब देखना यह होगा कि इसके बाद प्रशासन केवल दस्तावेजी प्रक्रिया आगे बढ़ाता है या जमीन की वास्तविक स्थिति भी सामने लाता है।
मौके का सीमांकन, कब्जे की स्थिति का पंचनामा, निर्माण की वैधता की जांच और पुराने मैनुअल रिकॉर्ड से लेकर वर्तमान ऑनलाइन रिकॉर्ड तक का मिलान इस मामले में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
हरी प्रसाद शास्त्री से भी जवाब की उम्मीद
इस पूरे विवाद में हरी प्रसाद शास्त्री का पक्ष भी सामने आना जरूरी है। यदि विवादित भूमि पर उनका या उनके परिवार का कब्जा अथवा निर्माण है, तो उसके पीछे वैध अधिकार और दस्तावेज क्या हैं? यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप गलत हैं तो उन्हें भी सामने आकर अपना पक्ष रखना चाहिए। क्योंकि निष्पक्ष जांच का सिद्धांत यही है कि आरोप लगाने वाले की बात भी सुनी जाए और आरोप झेल रहे व्यक्ति को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिले।
लेकिन यदि जांच में यह प्रमाणित होता है कि किसी दूसरे व्यक्ति की भूमि पर बिना वैध अधिकार के कब्जा कर निर्माण किया गया, तो प्रशासन को कार्रवाई से पीछे नहीं हटना चाहिए।
क्या राजस्व अधिकारी भी आएंगे जांच के घेरे में?
अब इस मामले का एक बड़ा सवाल यही है। यदि जांच के दौरान दस्तावेजों में हेरफेर, नियमों की अनदेखी, गलत रिकॉर्ड तैयार करने या किसी पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाने की बात सामने आती है, तो जिन-जिन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका प्रमाणित होगी, उनकी जवाबदेही भी तय करनी होगी।
यानी जांच सही दिशा में आगे बढ़ी तो मामला सिर्फ कथित कब्जे और निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा। राजस्व रिकॉर्ड से लेकर मौके की स्थिति तक पूरी प्रक्रिया की जांच हो सकती है और जिम्मेदारी तय होने पर संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई की स्थिति बन सकती है।
फिलहाल खसरा नंबर 390 की 0.2630 हेक्टेयर भूमि का विवाद प्रशासन के सामने है। 19 अगस्त की दावा-आपत्ति की समय-सीमा के बाद सामने आने वाले दस्तावेज और जांच की दिशा ही तय करेगी कि वास्तविक स्थिति क्या है।
लेकिन सवाल अब सीधे हैं—दूसरे की जमीन पर कथित कब्जा कैसे हुआ? निर्माण किस अधिकार से हुआ? राजस्व रिकॉर्ड में अलग-अलग दावे क्यों सामने आए? हरी प्रसाद शास्त्री की वास्तविक भूमिका क्या है? और यदि पूरी प्रक्रिया में किसी राजस्व अधिकारी या कर्मचारी की भूमिका नियमविरुद्ध पाई गई तो क्या उस पर भी कार्रवाई होगी? पसान का यह मामला अब सिर्फ एक जमीन का विवाद नहीं रह गया है। यह राजस्व रिकॉर्ड की पारदर्शिता, जमीन पर वास्तविक कब्जे और प्रशासनिक जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है। अब देखना यह है कि तहसीलदार का इश्तहार केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाता है या प्रशासन जमीन पर उतरकर कब्जे, निर्माण, दस्तावेज और राजस्व रिकॉर्ड की पूरी परत खोलता है।


















