👉🏻 मामले की जाँच शुरू, देर रात तक पुलिस लाइन में दर्ज किए गए बयान
👉🏻 जांजगीर-चाम्पा जिले के ASP कर रहे जाँच, रिपोर्ट तय करेगा अगली कार्रवाई
कोरबा। जेसीबी इंडिया के दिल्ली निवासी दो अधिकारियों संदीप कालरा व जसमीत सिंह पर 50 करोड़ से अधिक की धोखाधड़ी के दर्ज आपराधिक मामले में गिरफ्तारी के लिए हवाई यात्रा गले की फांस बन गई है। लोगों को यह बात कुछ जम नहीं रही कि, पुलिस टीम को ऐसी क्या गरज थी कि अधिकारी के निर्देश का उल्लंघन कर कार्य किया। इस मामले में भले ही पीड़ित पक्ष कोई खर्च वहन नहीं करने की बात कह रहा है लेकिन सवालों के कटघरे पूरी टीम जरूर खड़ी हो गई है। हालांकि, सदस्यों के द्वारा टीम के प्रभारी पर सारा कुछ निर्देशात्मक थोपने की कोशिश जरूर की जा रही है किंतु,कार्रवाई की आंच में तो झुलसना सबको पड़ेगा।
थाना कटघोरा के अपराध क्रमांक 175/26 से जुड़े इस मामले में पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों की टीम को दूसरे राज्य में विवेचना के लिए भेजा गया था। रेंज कार्यालय बिलासपुर से टीम को ट्रेन से यात्रा करने की अनुमति दी गई थी। लेकिन टीम ने ट्रेन के बजाय हवाई जहाज से यात्रा की।
यहीं से सवाल शुरू होता है—जब ट्रेन से जाने की अनुमति थी, तो फिर हवाई जहाज से जाने की ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी?
मामला केवल इतना नहीं है कि यात्रा का माध्यम बदल दिया गया। चर्चा यह भी है कि हवाई यात्रा पर खर्च होने वाली रकम यदि पुलिसकर्मियों ने अपनी जेब से खर्च की, तो फिर सवाल और गहरा जाता है। सरकारी ड्यूटी पर जा रही टीम आखिर अपनी तरफ से हजारों रुपए खर्च कर हवाई जहाज से दिल्ली जाने के लिए इतनी उत्सुक क्यों थी?
क्या वाकई इतनी जल्दी थी?
यदि विवेचना में ऐसी कोई असाधारण तात्कालिकता थी कि ट्रेन से जाना संभव नहीं था, तो स्वाभाविक रूप से सक्षम अधिकारी से हवाई यात्रा की अनुमति ली जा सकती थी। लेकिन अनुमति ट्रेन की और यात्रा हवाई जहाज से—यह अंतर ही अब चर्चा का विषय बन गया है।
क्या समय की इतनी कमी थी? क्या कोई ऐसी विशेष परिस्थिति थी जिसे कागजी अनुमति से भी ऊपर मान लिया गया? या फिर टीम ने अपनी सुविधा और जरूरत के हिसाब से यात्रा का रास्ता चुना?
इन सवालों का जवाब विभागीय स्तर पर भले स्पष्ट हो, लेकिन सार्वजनिक तौर पर यह स्थिति कई तरह की चर्चाओं को जन्म दे रही है।
👉🏻मामला भी ऐसा, जिसमें ‘दिल्ली दौरे’ की वजह जानना जरूरी
जिस प्रकरण में पुलिस टीम दिल्ली पहुंची, उसके पीछे शिकायत, विवेचना और संबंधित पक्षों के अपने-अपने हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में पुलिस की इस यात्रा को केवल सामान्य सरकारी दौरा मानकर छोड़ देना भी कई सवालों को अनुत्तरित छोड़ देता है।
जिस पक्ष की शिकायत पर पूरा घटनाक्रम शुरू हुआ, उसे इस कार्रवाई से क्या हासिल होना था? पुलिस की दिल्ली यात्रा से किसे कितना फायदा या राहत मिल सकती थी? और क्या पुलिस टीम की इतनी जल्दबाजी का संबंध मामले से जुड़े किसी पक्ष की अपेक्षाओं से था?
इन सवालों का कोई सीधा निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगा, लेकिन घटनाक्रम की कड़ियां जिस तरह जुड़ती हैं, उससे मामले की पृष्ठभूमि और यात्रा की जरूरत दोनों को समझना जरूरी हो जाता है। चर्चा है कि एक पक्ष को खुश करने विशेष रुचि लेकर खुद सजा का पात्र बन बैठे हैं, औऱ हासिल कुछ नहीं हुआ।
👉🏻ये कड़ी जुड़ती क्यों नहीं?
पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यही है कि विभागीय अनुमति एक माध्यम की थी और पुलिस टीम ने दूसरा माध्यम चुन लिया। यदि निजी स्तर पर खर्च कर हवाई यात्रा की गई, तो यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर ऐसा कौन सा उद्देश्य था, जिसके लिए सरकारी अनुमति की निर्धारित व्यवस्था से हटकर निजी खर्च करना भी मंजूर था। फिलहाल, सवाल कई हैं और जवाब कम।
इन सवालों के जवाब सामने आएंगे तो शायद कोरबा से दिल्ली तक के इस सफर की असली वजह भी साफ हो सकेगी।




