0 पूरे महीने काम कराकर सिर्फ 10-12 दिनों का भुगतान, मलगांव मुआवजा घोटाले से भी बड़े भ्रष्टाचार की आशंका
0 आधुनिक भारत में बंधुआ मजदूरी का नया रूप SECL दीपका में
कोरबा-दीपका। आजादी के लगभग 80 वर्षों के बाद भी देश के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में से एक कोरबा (छत्तीसगढ़) में श्रमिक शोषण का एक भयावह और आधुनिक चेहरा सामने आया है SECL दीपका क्षेत्र के कोल हैंडलिंग प्लांट (CHP) में कार्यरत आउटसोर्सिंग कंपनी हेम्स कॉरपोरेशन पर लगभग 400 ठेका मजदूरों के आर्थिक और मानसिक शोषण का गंभीर आरोप लगा है जन-जागरूकता और श्रमिक आंदोलनों से बचने के लिए कंपनी ने शॉर्ट अटेंडेंस (कम उपस्थिति) नामक एक नए तकनीकी हथियार के जरिए संगठित भ्रष्टाचार का जाल बुन रखा है ।
पीड़ित श्रमिकों ने हिम्मत दिखाते हुए इस संगठित लूट के खिलाफ SECL के महाप्रबंधक (GM) सहित तमाम सक्षम अधिकारियों को लिखित शिकायत सौंपकर न्याय की मांग की है।
०१. शॉर्ट अटेंडेंस:- शोषण और डिजिटल डकैती का नया हथियार शिकायत के अनुसार हेम्स कॉरपोरेशन के तहत कोल हैंडलिंग प्लांट में करीब 400 मजदूर रात-दिन जान जोखिम में डालकर पूरे 26 से 30 दिन काम कर रहे हैं परंतु कागजों पर हेराफेरी कर उन्हें केवल 10 से 12 दिनों की ही मजदूरी दी जा रही है ।
०२. वेतन पर्ची (Pay Slip) से इंकार:- इस वित्तीय चोरी को छिपाने के लिए मजदूरों को कानूनन मिलने वाली पेमेंट स्लिप तक नहीं दी जा रही है जिसकी मांग श्रमिकों ने अपने शिकायत पत्र में प्रमुखता से की है ।
०३. प्रबंधन की रहस्यमयी चुप्पी:- चौंकाने वाली बात यह है कि SECL का कार्मिक (Personnel) और ई एंड एम (E&M) विभाग वर्षों से आंखें मूंदकर यह मान रहा है कि मजदूर महीने में सिर्फ 12 से 15 दिन ही काम कर रहे हैं ।
मलगांव मुआवजा घोटाले से भी बड़े महाघोटाले की आशंका
पर्यावरण एवं SECL मामलों के जानकार शेत मसीह का कहना है कि दीपका क्षेत्र में पहले से ही मलगांव मुआवजा घोटाले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) कर रही है लेकिन मजदूरों के पसीने की कमाई की यह चोरी और कोल हैंडलिंग प्लांट में चल रहा यह संगठित खेल वित्तीय आकार में मलगांव घोटाले से भी बड़ा हो सकता है यह निजी कंपनियों भ्रष्ट अधिकारियों और स्थानीय कुछ स्वार्थी तत्वों (छुटभैया नेताओं) की त्रिकोणीय जुगलबंदी का नतीजा है ।
संवेदनशील कोयला संपदा की सुरक्षा पर उठे बड़े सवाल
विज्ञप्ति में इस बात पर भी गहरी चिंता जताई गई है कि जो निजी कंपनियां अपने गरीब मजदूरों की हक की मजदूरी चुराने से बाज नहीं आ रहीं उनके हाथों में देश की बेशकीमती कोयला संपदा और उसके परिवहन का संवेदनशील जिम्मा कितना सुरक्षित है? आशंका जताई जा रही है कि अधिकारियों से साठगांठ कर रात के अंधेरे में कोयले के खेल से भी इंकार नहीं किया जा सकता ।
अब प्रशासन के पाले में गेंद
ऊर्जाधानी भू-विस्थापित किसान कल्याण समिति किसान सभा और छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना जैसे संगठनों द्वारा पैदा की गई जागरूकता के बावजूद निजी कंपनियों ने शोषण के नए रास्ते तलाश लिए हैं मजदूरों की इस लिखित शिकायत के बाद अब गेंद कोरबा जिला प्रशासन कलेक्टर और श्रम विभाग के पाले में है ।
अब देखना यह होगा कि स्थानीय प्रशासन इस पर समय रहते संज्ञान लेकर उचित दंडात्मक कार्रवाई करता है या फिर बेबस और लाचार मजदूरों को न्याय के लिए एक बार फिर केंद्रीय जांच एजेंसी (CBI) का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा ।






