कोरबा-कटघोरा। “गौण खनिजों के बाजार मूल्य एवं वर्तमान रॉयल्टी दर अनुसार ठेकेदार के अंतिम देयक से राशि काटी जाये तथा किये गये निर्माण कार्य का खनिज विभाग से रायल्टी चुकता प्रमाण पत्र प्राप्ति पश्चात् ही संबंधित ठेकेदारों को अंतिम देयक का भुगतान किया जाना सुनिश्चित करें।”
यह शासन के द्वारा तय किये गए नियम के अनुसार समस्त विभाग प्रमुखों को जारी किया गया खनिज विभाग का निर्देश है, लेकिन कोरबा जिले के कटघोरा वन मण्डल से खबर निकल कर आई है कि रायल्टी के नाम पर खनिज विभाग और सरकार को खुली आँखों से लाखों-करोड़ों की चपत लगाई गई है/ जा रही है।
कटघोरा वन मंडल के जंगलों में विभिन्न निर्माण के नाम पर विभिन्न योजनाओं के मद से करोड़ों के कार्य कालांतर में कराए गए हैं और पसान सहित अन्य वन परिक्षेत्र में कार्य चल रहे हैं। कई कार्यो को स्वीकृति के लिए मुख्यालय भेजा गया है। आश्चर्य की बात यह है कि इन सभी निर्माण कार्यों में लगने वाले गौण खनिज रेत, गिट्टी, मुरूम, मिट्टी आदि का उपयोग के संबंध में खनिज विभाग के माध्यम से शासन को दी जाने वाली राजस्व की राशि में गफलत की जा रही है। गफलत का यह आंकड़ा कोई सैकड़ा या हजार में नहीं बल्कि लाखों से होते हुए करोड़ तक पहुंच जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
वन विभाग के अधिकारियों से लेकर रेंजर, डिप्टी डेंजर और मैदानी अमले के द्वारा इस पूरे मामले में न सिर्फ गोलमाल किया जा रहा है बल्कि खनिज विभाग की आंखों में भी धूल झोंकी जा रही है। खनिज विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि वन विभाग वाले उनके पास क्लीयरेंस के लिए आते जरूर हैं लेकिन जिस पैमाने पर रॉयल्टी प्राप्त होनी चाहिए वह नहीं मिलती है। उन्होंने भी इस बात को स्वीकार किया कि बड़े पैमाने पर खनिज की रॉयल्टी में गोलमाल किया जा रहा है।
कटघोरा वन मंडल वर्षों से स्टॉप डैम, चेक डैम, भवन निर्माण, गोदाम निर्माण,रिटर्निंग वॉल निर्माण सहित विभिन्न निर्माण और पौधारोपण के मामलों में गड़बड़ियों को लेकर सुर्खियों में रहता आया है। करोड़ों के घोटाले वन मंडल में अंजाम दिए गए। जंगल में घोटाल का खूब मंगल किया गया और अधिकारियों ने राशि की बंदरबांट की है,जो समय-समय पर उजागर होता रहा और प्रमाणित भी हुआ लेकिन यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
कोरबा के पड़ोसी जिला के मरवाही वन मंडल में 3 करोड़ 80 लाख रुपए का रॉयल्टी घोटाला अभी सुर्खियों में ही है और हाईकोर्ट ने इस मामले में वन अधिकारियों को फटकार भी लगाई है। कुछ इसी तर्ज पर कोरबा जिले में कटघोरा वन मंडल के अधिकारियों ने अपने चाहते ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों की गफलत की है। वन विभाग के लोगों द्वारा यह तर्क दिया जाना की जंगल से ही प्राप्त सामग्रियों का उपयोग कर निर्माण कराए जाते हैं, यह कुछ हद तक सही है लेकिन बड़े पैमाने पर अपने चाहते ठेकेदारों और सप्लायरों को लाभ पहुंचाने के लिए खनिज सामानों की खरीदी भी की जाती है अथवा फर्जी तरह से इसे दिखाया जाता है और भुगतान के नाम पर कमीशनखोरी की बंदरबांट हो रही है।
0 दिए गए हैं यह निर्देश,होना है कटौती
कार्यालय कलेक्टर (खनिज शाखा) कोरबा द्वारा जिले में वर्तमान में प्रचलित गौण खनिज की रॉयल्टी दर प्रदान करने बाबत् जारी पत्र के मुताबिक पर्यावरण उपकर एवं अधोसंरचना विकास उपकर वर्तमान में प्रचलित रॉयल्टी दर के अनुसार लिया जाना है। इन सामग्रियों में निम्न श्रेणी चूना पत्थर/डस्ट डोलोमाइट (सड़क निर्माण में उपयोग पर), साधारण पत्थर, मुरूम रेत, मिट्टी (इंट एवं अन्य व्यवासायिक प्रयोजन हेतु दर निर्धारित है।
इसके साथ ही सभी विभाग प्रमुखों को निर्देश है कि रॉयल्टी चुकता प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं कराये जाने पर उपयोगित गौण खनिजों की मात्रा के आधार पर गौण खनिजों के बाजार मूल्य एवं वर्तमान रॉयल्टी दर अनुसार ठेकेदार के अंतिम देयक से राशि काटी जाये तथा किये गये निर्माण कार्य का खनिज विभाग से रायल्टी चुकता प्रमाण पत्र प्राप्ति पश्चात् ही संबंधित ठेकेदारों को अंतिम देयक का भुगतान किया जाना सुनिश्चित करें।
0 3 वर्षों में रायल्टी निरंक
खनि अधिकरी कार्यालय कलेक्टर (खनिज शाखा) कोरबा से सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जानकारी चाही गईं कि- आपके द्वारा जिला खनिज विभाग कोरबा को वनमंडल कटघोरा से विगत तीन वर्षों में 2022-23-24-25 तक गौण खनिज से कुल प्राप्त रॉयल्टी वर्षवार सत्यापित छायाप्रति प्रदान करें। तत्संबंध में जवाब में आवेदक को लेख किया गया है कि आपके द्वारा चाही गई जानकारी निरंक है,जिसे उपलब्ध नहीं किया जा सकता है।
0 खेल कुछ ऐसा,मजदूरी में घालमेल,कमीशन प्रथा हावी
विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली है कि बीजेपी गवर्नमेंट में अभी जो भी खरीदी की जाती है, वह जेम पोर्टल से की जाती है पर कटघोरा वनमण्डल के अधिकारियों के द्वारा अपने खास सप्लायरों से जेम में रजिस्ट्रेशन करवा कर तुरंत रेट भर कर सप्लाई ली जाती है एवं उनको रॉयल्टी का बेनिफिट दिया जाता है। फॉरेस्ट के कर्मचारी काम करने वाले मजदूरों का भुगतान अपने रिश्तेदारों के नाम से ही निकाल कर देते हैं जबकि काम करने वाले मजदूर अलग होते हैं और पेमेंट अलग मजदूरों को होता है। एक ही मजदूर के नाम कई रेंज में हैं जिनके नाम से पेमेंट निकाल रहा है। अधिकारियों द्वारा 5 परसेंट में किराए से मजदूर के नाम मांगे जाते हैं, जिन्हें पेमेंट डाल कर लिया जाता है। सूत्रों के मुताबिक उपमंडलाधिकारी द्वारा 40 से 50% कमीशन पर कार्यों का ठेका दिया जाता है। रेंज ऑफिसर पर दबाव डाल कर हस्ताक्षर लिए जाते हैं, नहीं करने पर दूसरे रेंज ऑफिसर को उस कार्य का चार्ज देकर पेमेंट करवा दिया जाता है।