👉🏻 मिसिंग भूमि पर भी किया पौधारोपण, बिना बिजली बोर, लाल ईंट से निर्माण, फेंसिंग भी उखड़ने लगी
👉🏻 कैम्पा मद की राशि में गफलत जारी,पहले भी हो चुका है उजागर
कोरबा। कोरबा जिले के जंगलों में कैम्पा मद की राशि का उपयोग के साथ दुरुपयोग भी किया जा रहा है। पूर्व में पौधों का रोपण के कार्य में बड़े पैमाने पर किए गए गड़बड़ी को उजागर किया गया जिस पर जांच तो हुई लेकिन रिकवरी और कार्रवाई आज तक लंबित ही है। आदेश जारी करने के बाद इसे मूर्त रूप नहीं दिया जा सका है। कटघोरा वन मंडल के पसान रेंज में मिसिंग भूमि पर भी पौधों रोपण का मामला काफी चर्चा में रहा। जो जमीन ही नहीं थी, उस पर भी पौधारोपण करके लाखों रुपए का गबन कर दिया गया था। बिना बिजली बोर करा दिए गए। साथ ही अन्य गड़बड़ी भी उजागर हुई थी। इन सारे मामलों में बहुत लीपापोती तो थोड़ी बहुत कार्रवाई की गई।
अभी एक ताजा तरीन मामला फिर उजागर हुआ है। वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक पसान रेंज में ही “क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण कार्यक्रम” के तहत इस बार भी गड़बड़ी की गई है। सिंचित रोपणी में जितनी भूमि पर पौधारोपण दर्शाकर राशि हासिल की गई है, उसमें से बड़े पैमाने पर जमीन ही नहीं है।
तकनीकी तौर पर देखा जाए तो अधिकांश भू-भाग पर गांव बसा हुआ नजर आता है तो उसी गांव की जमीन पर भी पौधारोपण (वन भूमि बताकर) करना दर्शा कर रुपए गबन कर लिए गए हैं।
जो जानकारी सामने आ रही है उसके मुताबिक पसान वन परिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक पी 187 में 58.000 हेक्टेयर भूमि पर पौधारोपण करना बताया गया है किंतु इसमें लगभग 27 हेक्टेयर भूमि मिसिंग है। इसी तरह कक्ष क्रमांक पी 221 में 65.000 हेक्टेयर भूमि पर पौधारोपण की बातें कही गई है किंतु इससे भी करीब 32 हेक्टेयर वन भूमि मिसिंग है। अर्थात, मिसिंग वन में भी पौधों का रोपण करना बताकर इसके एवज में बड़ी राशि हासिल कर ली गई है।

इतना ही नहीं इस क्षेत्र में बिजली नहीं है इसके बावजूद यहां बोर खनन कराया गया है। आखिर इस बोर को किसके सहारे चलाया जाएगा? यह सवाल पूर्व के मामले की तरह इसमें भी कायम है। पसान रेंज के ही सीपतपारा पिपरिया में बिना बिजली के ही 19 से 22 बोर करा दिए गये थे जिसमें से कुछ धंस गए तो कुछ कायम रहे। लेकिन बड़ा सवाल रहा कि आखिर इन्हें संचालित कैसे किया जाएगा?

इसके अलावा यह भी ज्ञात हुआ है कि जंगल के भीतर निर्माण कार्य में शासन के नियमों के तहत सरकारी कार्य में फ्लाई ऐश से निर्मित ईंट को निर्माण में उपयोग किया जाना है किंतु अभी चौकीदार कक्ष के निर्माण में लाल ईंट का उपयोग होना पाया गया है। रोपण के लिए ले जाए गए पौधे,खाद आदि जैसे-तैसे पड़े हुए नजर आए। पौधरोपण की कार्ययोजना शिला पट्टिका पर भी नजर नहीं आ रही है।
👉🏻 कार्ययोजना पर एक नजर
बता दें कि क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण कार्यक्रम रखरखाव हेतु एपीओ वर्ष 2025-26 के तहत यह कार्य कैम्पा मद से कराया गया है। प्रथम वर्ष के लिए 205.89 लाख रुपए कक्ष क्रमांक पी 187 हेतु जारी किया गया।कक्ष क्रमांक पी 221 के लिए प्रथम वर्ष में 255.80 लाख रुपए जारी किए गए। इसी तरह द्वितीय वर्ष हेतु कक्ष क्रमांक 187 के लिए 98.26 लाख एवं पी 221 के लिए 121.84 लाख रुपए रोपण हेतु जारी किए गए। अब जबकि दोनों कक्ष को मिलाकर कुल 120 हेक्टर में से 59 हेक्टर मिसिंग भूमि है तो आखिर इस पर रोपित कथित पौधों की राशि किन-किन लोगों ने मिलकर बंदरबांट कर ली है? यह जांच का विषय है। इस मामले में जब पसान रेंजर मनीष सिंह से जानकारी लेने सम्पर्क किया गया तो बैठक में शामिल होने के कारण उनका पक्ष नहीं आ सका है।
👉🏻 क्या है इसका आशय
क्षतिपूर्ति वृक्षारोपण कार्य का मतलब है, जब किसी गैर-वानिकी काम (जैसे सड़क, फैक्ट्री, खनन आदि) के लिए वन भूमि का उपयोग किया जाता है, तो उसकी भरपाई करने के लिए उतनी ही या उससे अधिक क्षेत्र में नए पेड़ लगाना, ताकि पर्यावरण को हुए नुकसान की पूर्ति हो सके, यह वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत एक अनिवार्य प्रक्रिया है. इसका मुख्य उद्देश्य वनों की कटाई से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की क्षमता कम होना, जैव विविधता को नुकसान) की भरपाई करना और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना है। मुख्य उद्देश्य: गैर-वानिकी उपयोग के लिए काटी गई वन भूमि के बदले में नए वन लगाना है।







