👉🏻सेटिंग और जुगाड़ से प्रशासनिक पदों पर वर्षों से जमे हैं कई प्राचार्य और व्याख्याता
कोरबा। यदि आपकी राजनीतिक अप्रोच दो प्रमुख दलों के लोगों के साथ है तो सरकार किसी की भी हो आप की दसों उंगलियों घी और सिर कढ़ाई में ही रहेंगे। कुछ इसी तरह की मलाई वे लोग खा रहे हैं जो मूल रूप से अध्ययन-अध्यापन के कार्य हेतु भर्ती हुए हैं, सरकार ने उनकी भर्ती स्कूलों में व्यवस्था को सुधारने के लिए की है किंतु शिक्षक, व्याख्याता, प्राचार्य जैसे पदों पर रहने वाले अनेक लोग आज भी प्रशासनिक पदों पर बैठे हैं। दफ्तरों में बाबू बनकर बैठे हैं (खासकर राजस्व विभाग में) और मूल शाला में जाना नहीं चाहते।
इसकी एक बड़ी वजह उक्त पदों पर बैठने के बाद होने वाली अतिरिक्त आय प्रमुख रूप से है। दूसरा, अब इनका मन पढ़ाने-लिखाने में नहीं लगता बल्कि कई लोगों को तो कुर्सी तोड़ने में मजा आ रहा है।
कोरबा जिले में सरकारी शिक्षा की व्यवस्था कुछ खास बेहतर नहीं कह जा सकती। शीर्ष अधिकारियों के द्वारा व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने पर जोर दिया जाता है लेकिन आंतरिक तौर पर देखें तो व्यवस्था गड़बड़ ही है। इसकी वजह है कि विभाग का मुखिया प्रशासनिक नहीं है। जिले में लंबे समय से प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी बैठा कर प्रशासनिक कामकाज निपटने की व्यवस्था चली आ रही है। इसकी वजह से न सिर्फ प्रभारी अधिकारी को वरदान प्राप्त हो जाता है बल्कि वह सब को ताक पर रखकर अपनी मनमानी करना शुरू कर देता है। छोटे-छोटे कामकाज के लिए वसूली भी शामिल है। जिले में चर्चा है कि एक पंडित जी प्रभारी डीईओ के लिए मीडिएटर का काम कर रहे हैं और जो भी काम कराना हो, इन पंडित जी के माध्यम से आप व्यवस्था पहुंचा दीजिए काम तत्काल हो जाएगा। प्रभारी डीईओ के खिलाफ काफी शिकायतें भी हैं और उजागर भी होती रही हैं लेकिन मजाल है कि कोई एक्शन हो जाए।
इसी तरह खंड शिक्षा अधिकारी और बीआरसी के पदों पर भी प्रशासनिक तौर पर पदस्थापना नहीं की गई है। व्याख्याता और शिक्षक के भरोसे ही काम चलाया जा रहा है। ऐसे में यह लोग अपने मूल शाला को छोड़कर दफ्तर में ही हाजिरी बजाते नजर आते हैं। इनकी अनुपस्थिति में संबंधित विद्यालय, जहां इनकी पदस्थापना है वहां का मूल कार्य प्रभावित न हो रहा हो, ऐसा भी संभव नहीं।
विभाग के जानकार बताते हैं कि जिले में सिर्फ ABEO की पोस्ट ही ऐसी है जिस पर परीक्षा पास कर प्रशासनिक अधिकारी बैठे हुए हैं। इसके अलावा सभी जिम्मेदार पदों पर गुरुजी ही बैठे हुए हैं और मलाई खा रहे हैं।
👉🏻 विभाग की फजीहत कराने वालों को संरक्षण
इससे पहले भी शिक्षा विभाग पदोन्नति के मामले में काफी फजीहत झेल चुका है। मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया लेकिन मजाल है कि दोषी अधिकारी के विरुद्ध कोई एफआईआर दर्ज हो जाए या कोई नोटशीट चल जाए क्योंकि उसने सारा कुछ ऊपर तक सेट कर रखा है। रूपयों की थैली का वजन इतना है कि उसके नीचे बड़े अधिकारी की भी कलम दब जा रही है। सरकारी स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था बदहाल है। सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों में ना तो गणवेश का अनुशासन है और न ही शिक्षकों को इनमें रुचि है। बच्चों के गणवेश के लिए आने वाला पैसा निकाल लिया जाता है, गणवेश घोटाला हो जाता है। भ्रष्टाचार के मामले सामने आते रहे हैं। किताब घोटाला होता है, वितरण के लिए आने वाली नई-नई किताबें कबाड़ी के दुकान की शोभा बढ़ाते हैं तो बिल्कुल फ्रेश किताबें ठेलों पर पुड़िया बनाने के काम में नजर आती है किंतु इन सभी मामलों में भी आज तक ना किसी पर कार्रवाई हुई ना जिम्मेदारी तय हुई, ना कोई जांच हुई है। यह सब सिर्फ इसलिए हो रहा है क्योंकि पद को गरिमा अनुरूप नहीं बल्कि धन अनुरूप निभाया जा रहा है।








