👉🏻 कोरबा वन मण्डल में कुदमुरा रेंज का मामला
कोरबा। जिले के कोरबा वन मंडल में भी कटघोरा वनमंडल की तरह ही अधूरे निर्माण पर पूरे पैसे निकालकर जेब भरने का काम किया जा रहा है। पिछले दिनों हमने कुदमुरा वन परिक्षेत्र में आधा-अधूरा वॉच टावर निर्माण और वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पहले पूरा पैसा निकाल लिए जाने का मामला सामने लाया। इस मामले में एसडीओ से लेकर रेंजर तक की मिली भगत सूत्रों के हवाले से सामने आई है लेकिन पूरा पैसा निकाल लेने के बाद इस निर्माण को आज तक पूरा नहीं कराया जा सका है। यहां तक कि दूर-दूर तक निर्माण की कोई सामग्री भी नजर नहीं आती।
इसी कड़ी में कुदमुरा रेंज में एक और मामला सामने आया है जिसमें गजदर्शन रेस्क्यू कैंप भवन के निर्माण में भी घपला किया गया है। रेगुलर मद के 11 लाख की लागत से गजदर्शन रेस्क्यू कैम्प भवन निर्माण कार्य, परिसर रक्षक कैम्पस लबेद, कुदमुरा रेंज, की न सिर्फ गुणवत्ता पर सवाल है बल्कि कुदमुरा रेंज परिसर में ही हो रहे इस निर्माण को आज पर्यंत अधूरा छोड़ दिया गया है। मार्च माह में ही यह कार्य पूर्ण हो जाना था लेकिन कार्य अधूरा है। आश्चर्य इस बात का है कि अधूरे कार्य को पूरा बताकर या अन्य तरीके से निर्माण दर्शाकर निर्माण की राशि आहरित कर ली गई है।

निर्माण की राशि लेप्स ना हो जाए इसके लिए विभागीय अधिकारियों ने मिलीभगत कर जुगाड़ लगाया लेकिन यह राशि निकाल लेने के बाद भी कोई कार्य नहीं कराया गया है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब डीएफओ की जानकारी में एसडीओ स्तर के अधिकारी, रेंजर, डिप्टी रेंजर और बीटगार्ड मिलकर जंगल में चूना लगाने का काम कर रहे हैं। इसके पूर्व भी दर्जनों ऐसे मामले सामने आ चुके हैं किंतु विभागीय सांठगांठ से ना तो इस तरह के मामलों की कोई जांच होती है और न ही कोई विभागीय कार्रवाई। यदि कभी कोई मामले में जांच कराई भी गई तो जिस पर आरोप लगा होता है, उसे ही जांच अधिकारी बनकर पूरा लीपापोती कर दिया जाता है। ऊपर के अधिकारियों को गुमराह करने में भी ये लोग नहीं चूकते। इसी वजह से शासन की जीरो टॉलरेंस नीति को धता बताते हुए, वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों को अंधेरे में रखकर वन मंडल और रेंज स्तर पर विकास व निर्माण कार्यों में बड़ा घालमेल किया जा रहा है। बताते चलें कि कोरबा वन मंडल में ऐसे ही गुणवत्ताहीन निर्माण के कारण कोरबा रेंज के भुलसीडीह में एक मजदूर राकेश खड़िया की जान पर बन आई। वह जिंदगी भर के लिए कमजोर हो चुका है। इस हादसे का पूर्ण रूप से जिम्मेदार कोरबा रेंजर है लेकिन ना तो रेंजर पर किसी तरह की जिम्मेदारी तय हो रही है और ना ही पीड़ित को कोई राहत मिल रही है।
सीधी सी बात है कि डीएफओ इस पूरे मामले में न सिर्फ शामिल हैं बल्कि एसडीओ ने भी कागजों में सारा कुछ गोलमाल कर रेंजर को बचाने का खेल किया है। अधिकारी मिलकर सुनियोजित तरीके से षडयंत्र पूर्वक सरकारी धन पर डाका डाल कर बंदरबॉंट करते हुए सरकार को अंधेरे में रखकर उसे चूना लगा रहे हैं।
यही वजह है कि जंगलों में होने वाले विकास कार्यों के लिए विभिन्न मदों से राशि जारी तो होती है लेकिन काम धरातल पर नजर नहीं आता। बल्कि, अधिकारी अपनी जेब भरकर लाखों-करोड़ों की बेनामी संपत्ति बनाने से नहीं चूकते। एसडीओ सूर्यकांत सोनी की कार्यशैली को लेकर भी सूत्रों के जरिए कई मामले सामने आए हैं। उनके अनुविभागीय क्षेत्र में होने वाले कार्यों को लेकर सवाल उठते ही रहे हैं, बावजूद इसके किसी भी मामले में आज तक ना तो जांच हुई है ना करवाई।







