माइंस की गाड़ियां रोकने के लिए सड़कों पर सियासी दबाव का खेल!
सड़क निर्माण और मरम्मत के नाम पर सरकारी खजाने पर निर्भर “सरकार” का कारोबार। कंपनी ने अपने खर्च पर सड़क सुधारी तो बिगड़ने लगे समीकरण! राजनीतिक संरक्षण, दुकान की मेहरबानी और दबाव की राजनीति ने खड़े किए गंभीर सवाल।
पखांजूर। सरकारी सड़कें जनता की सुविधा के लिए बनती हैं या कुछ ठेकेदारों की जिंदगीभर की कमाई का जरिया हैं। परलकोट के अंदरूनी इलाकों में सुरजागढ़ माइंस के वाहनों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब इसी सवाल पर आकर टिक गया है। सड़क निर्माण, मरम्मत, रेत के कारोबार और राजनीतिक संरक्षण के बीच सबसे ज्यादा नुकसान स्थानीय बेरोजगार युवाओं को उठाना पड़ सकता है।
कभी माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में सरकारी सड़क निर्माण के नाम पर वर्षों से सुख में लाल रहने वाले “सरकार” की ठेकेदारी का कारोबार चलता रहा है। सड़क की गुणवत्ता, बार-बार मरम्मत के नाम पर सरकारी धन खर्च होने और कोटरी जैसी नदियों से निर्माण कार्यों की आड़ में रेत निकालने के कारोबार पर सवाल उठते रहे हैं।
सड़क बनाने का ठेका भी उसी व्यवस्था में, खराब होने पर मरम्मत का काम भी उसी व्यवस्था में और भुगतान भी सरकारी खजाने से। जनता को मिलती है टूटी सड़क और ठेकेदार को मिलता है नया काम!
पैसा नहीं मिला तो बौखलाहट सड़क पर!
चर्चा है कि अपने कथित आर्थिक हित पूरे नहीं होने से बौखलाए एक नेता और उसके गुर्गों ने हाल ही में माइंस के वाहनों को रोककर लोगों के साथ धक्का-मुक्की, गाली-गलौज और बदसलूकी की। इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। सवाल उठता है कि आखिर आर्थिक हितों को लेकर नाराजगी का गुस्सा सड़क पर काम करने वाले लोगों पर क्यों उतारा जा रहा है। क्या सार्वजनिक सड़क को निजी दबाव और वसूली की राजनीति का अड्डा बनाया जा सकता है।
कंपनी ने सड़क सुधारी तो ठेकेदारी के समीकरण क्यों बिगड़ने लगे?
सुरजागढ़ माइंस की गाड़ियों का संचालन शुरू होने के बाद कंपनी ने महाराष्ट्र से छत्तीसगढ़ तक परिवहन मार्गों पर अपने खर्च से सड़क मरम्मत का काम शुरू कराया। जिन सड़कों की बदहाली वर्षों से जनता की परेशानी बनी हुई थी, वहां सुधार कार्य होने लगा।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
जब कंपनी खुद सड़क की मरम्मत करवा रही है तो सरकारी सड़क निर्माण और मरम्मत के ठेकों से जुड़े लोगों को परेशानी क्यों होने लगी। क्या सड़क मरम्मत के नाम पर होने वाली कमाई के पुराने रास्ते प्रभावित हो रहे हैं।
सवाल है कि सड़क की मरम्मत जनता के लिए होनी चाहिए या ठेकेदार की कमाई के लिए।
दुकान की मेहरबानी और राजनीतिक वफादारी का सड़क कनेक्शन!
इस विवाद में ठेकेदारी और राजनीतिक रिश्तों का पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ठेकेदार की ओर से एक दुकान उपलब्ध कराकर राजनीतिक व्यक्ति को उपकृत करने और बदले में सड़क मरम्मत तथा माइंस वाहनों के मुद्दे पर उसका साथ मिलने की चर्चा ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
आखिर निजी उपकारों और सार्वजनिक हितों के बीच की सीमा कहां है। क्या राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल किसी ठेकेदार के कारोबारी हितों की रक्षा के लिए किया जा सकता है।
सरकार-सरकार भाई-भाई, मिलकर मलाई खाई!
सरकारी सड़क पर माइंस की गाड़ियां चलें तो विरोध, कंपनी सड़क की मरम्मत करवाए तो विरोध और स्थानीय युवाओं को रोजगार मिले तो भी विरोध! आखिर यह कैसी जनहित की लड़ाई है। क्या यह मान लिया जाए कि “सरकार-सरकार” भाई-भाई मलाई खाने की कोशिश में एकजुट हैं।
यदि भारी वाहनों से सड़क को नुकसान हो रहा है तो परिवहन नियमों के अनुसार उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन सड़क की समस्या को आधार बनाकर वाहनों का संचालन रोकने का दबाव बनाना किसके हित में है।
सरकारी सड़क किसी सरकार या ठेकेदार की निजी संपत्ति नहीं है। उस पर अधिकार कानून और नियमों के अनुसार तय होगा, न कि राजनीतिक रसूख या ठेकेदारी के प्रभाव से।
ठेकेदारी की लड़ाई में बेरोजगार नौजवान क्यों पिसे?
सुरजागढ़ माइंस से जुड़े परिवहन और अन्य कामों में आसपास के युवाओं को रोजगार मिला है। इनमें ऐसे परिवार भी हैं जिनके लिए यह काम घर चलाने का एकमात्र सहारा है। दिव्यांग युवाओं को भी रोजगार के अवसर मिले हैं।
शासन पहले ही इन इलाकों के बेरोजगार युवाओं के लिए पर्याप्त अवसर पैदा नहीं कर पाया। ऐसे में ठेकेदारी और राजनीतिक दबाव के कारण रोजगार पर संकट आता है तो इसकी कीमत गरीब परिवारों को चुकानी पड़ेगी। विरोध करने वालों को बताना चाहिए कि इन युवाओं की रोजी-रोटी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब प्रशासन को सड़क और ठेकेदारी का पूरा हिसाब खोलना चाहिए!
किस सड़क का निर्माण कब हुआ? कितनी लागत आई? सड़क कितने समय में खराब हुई? मरम्मत पर कितनी बार और कितना सरकारी पैसा खर्च हुआ? निर्माण की गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसकी थी? कोटरी जैसी नदियों से रेत के उत्खनन और परिवहन का हिसाब क्या है?
इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।
परलकोट को ठेकेदारी का साम्राज्य नहीं, विकास चाहिए!
यह लड़ाई केवल सुरजागढ़ माइंस की गाड़ियों के आवागमन की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है जिसमें सरकारी निर्माण और मरम्मत से जुड़े आर्थिक हित जनता की जरूरतों से बड़े दिखाई देते हैं। सड़क और सरकारी पैसा जनता का है तथा रोजगार का अधिकार स्थानीय नौजवानों का है।
किसी ठेकेदार को सरकारी खजाने को अपनी कमाई का एटीएम बनाने का अधिकार नहीं है। न ही किसी राजनीतिक रसूखदार को अपने प्रभाव से सार्वजनिक परिवहन और रोजगार के रास्ते में बाधा खड़ी करने का अधिकार मिल सकता है।
अब सवाल सड़क का नहीं, उस सरकार के ठेकेदारी व्यवस्था का है जो सड़क को जनता की सुविधा नहीं, अपनी कमाई का जरिया समझती है!
डिस्क्लेमर: इस आलेख में प्रयुक्त ‘सरकार’ शब्द को पढ़ते समय पाठक अपनी समझ और विवेक का इस्तेमाल करें। हर जगह इसका अर्थ शासन चलाने वाली व्यवस्था या सत्ता के गलियारों से जोड़ना आवश्यक नहीं है।





