✍🏻 विशेष लेख- सपुरन कुलदीप✍🏻
कोरबा। आज जब हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में गर्व से सिर उठाकर खड़े हैं, तो इसका श्रेय काफी हद तक भारत रत्न डॉ. भीमराव अम्बेडकर की दूरदर्शिता को जाता है। वे केवल एक संविधान निर्माता नहीं थे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को गढ़ने वाले महान दार्शनिक भी थे।
▪️संविधान के माध्यम से समानता का आधार
अम्बेडकर जी का मानना था कि लोकतंत्र केवल एक ‘शासन पद्धति’ नहीं है, बल्कि यह एक ‘जीवन जीने का तरीका’ है। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से-
▪️सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार
जाति, लिंग या शिक्षा की परवाह किए बिना हर नागरिक को ‘एक वोट, एक मूल्य’ का अधिकार दिया।
▪️मौलिक अधिकार: समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को भी अभिव्यक्ति और गरिमा के साथ जीने की कानूनी सुरक्षा प्रदान की।
▪️सामाजिक लोकतंत्र पर जोर
अम्बेडकर जी ने चेतावनी दी थी कि “राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक कि उसके मूल में सामाजिक लोकतंत्र न हो।” उनके लिए लोकतंत्र का अर्थ था:
▪️स्वतंत्रता (Liberty)
▪️समानता (Equality)
▪️बंधुत्व (Fraternity)
इन तीन स्तंभों के बिना लोकतंत्र एक खोखली संरचना मात्र रह जाता।
▪️महिलाओं और वंचितों का सशक्तिकरण
‘हिंदू कोड बिल’ के माध्यम से महिलाओं को संपत्ति और तलाक के समान अधिकार दिलाने की उनकी पहल ने भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी बनाया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि लोकतंत्र में केवल बहुमत का शासन न हो, बल्कि अल्पसंख्यकों और दलितों के हितों की भी सुरक्षा हो।






