👉🏻 अनेक सड़कों का झाड़ूओं से सम्पर्क टूटा
👉🏻 पर्यावरण दफ्तर के सामने रोज वायु प्रदूषण, पर कोई मतलब नहीं
👉🏻 साफ-सफाई व्यवस्था बेपटरी होने लगी
👉🏻आयुक्त ही सबसे पंगा लेते रहें- यही मंशा अधीनस्थों की..!
कोरबा (सत्या पाल) । छोटे-बड़े त्योहारों का मौसम शुरू हो चुका है और इसके साथ ही बाजारों की रौनक बढ़ने के साथ लोगों का रेला भी सामान्य दिनों की अपेक्षा बढ़ने लगा है। श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर मंदिरों में भगवान की विशेष झांकियों को देखने जहाँ श्रद्धालुओं ने मन्दिरों का रुख किया तो अब श्री गणेश की विशेष आराधना का त्यौहार जारी है। कल ही आदिशिल्पी विश्वकर्मा जगह-जगह विराजे व आज भी दर्शनार्थ हैं। जगह-जगह पंडालों में भगवान विराजे हैं जिनका दर्शन करने शाम होते ही लोगों का रेला सड़कों पर उमड़ने लगता है। लोग पैदल हों या दुपहिया, तीन पहिया या चार पहिया वाहन में, सड़कों पर झटका सबको लग रहा है।
👉🏻 मुख्य और आंतरिक सड़कों पर अंधेरा

यह विडम्बना है कि प्रशासनिक बैठकों में निर्देश के बावजूद सड़क रौशनी की व्यवस्था में अपेक्षित सुधार नहीं आ पा रहा है। इसमें मैदानी व सुपरविजन अमले के साथ-साथ उस वार्ड के निर्वाचित पार्षद की उदासीनता को जिम्मेदार ठहराना गलत न होगा। आलम यह है कि कोरबा मुख्य शहर में भी अंधेरा कायम दिखता है। अनेक इलाकों में दुकानें जब तक खुली रहती हैं, उनके उजाले से सड़क रौशन रहती है।

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कई स्ट्रीट लाइट जलती नहीं जिनके कारण हादसों का खतरा बना रहता है। इसी तरह अन्य प्रमुख सड़कों व व्यस्त रास्तों में भी पर्याप्त रोशनी का अभाव, खराब लाइटों के सुधार/बदलाव का अभाव के कारण यह समस्या कायम है।

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अनेक अंधेरी मुख्य/आंतरिक व्यस्त सड़कों पर बेतरतीब खड़े किए जाने वाले छोटे-बड़े-भारी वाहन, फिर अनगिनत गड्ढों से बच-बच कर निकलने की कोशिश करते लोग देखे जा सकते हैं।

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निगम अमले को चाहिए कि खराब सभी स्ट्रीट लाइटों/चौराहों के हाईमास्ट लाइटों का सुधार करें।

पार्षदों को अपने वार्ड क्षेत्र में इसकी निगरानी करनी होगी तभी सुधार की गुंजाइश सम्भव होगी। यह हाल शहर में है, किन्तु आउटर में क्या हाल होगा, समझा जा सकता है। अब आगामी दिनों में नवरात्रि का उत्सव प्रारम्भ होगा। दशहरा-दीपावली भी नजदीक है।
👉🏻 जहां से बजरी साफ किया, वहीं ढेर लगा दिया

बारिश थमने के बाद उखड़ती सड़कों की बजरी और इससे उड़ती धूल बेतहाशा परेशान किए हुए है। इमलीडुग्गु से लेकर कोसाबाड़ी-रिसदी मार्ग तक सड़क पर जगह-जगह बजरी बिखरी नजर आती हैं। ऐसा नहीं है कि झाड़ू लगती नहीं, रोज लगती है लेकिन सड़क देख-देख कर।

अनेक बाहरी और आंतरिक सड़कें झाड़ू को तरस जाती हैं। अब आलम यह है कि जिन बजरी गिट्टियों को झाड़ू लगाकर इकट्ठा किया जाता है उनको उठाकर किसी गड्ढे आदि में डलवाने की बजाय बीच या कुछ किनारे सड़क पर ही ढेर के रूप में छोड़ दिया जाता है। अब गाड़ियों के आवागमन में यही एकत्र बजरियां फिर से सड़क पर बिखर जाती हैं व धूल उड़ने की वजह भी बनती है। भला, ऐसी सफाई का क्या औचित्य? यह रवैय्या “तेरा तुझको अर्पण” को चरितार्थ कर रहा है।
👉🏻 पर्यावरण दफ्तर के सामने ही धूल का गुबार

क्षेत्रीय पर्यावरण संरक्षण विभाग का कार्यालय आईटीआई रामपुर क्षेत्र में स्थित है। यहीं पर जिला परिवहन विभाग का दफ्तर टाउन एन्ड कंट्री प्लानिंग का दफ्तर और भीतर की ओर मत्स्य पालन, आरईएस, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क सहित अन्य विभाग के भी दफ्तर संचालित हैं। इसी मार्ग पर जिले का सबसे बड़ा न्यू एरा प्रोगेसिव स्कूल भी स्थित है। स्कूल आने जाने-वाले बच्चों उनके अभिभावकों तथा विभागीय अधिकारियों- कर्मियों को हर दिन आने-जाने के दौरान धूल फांकनी पड़ती है। यह भी एक ऐसी सड़क है जिसकी बजरियां उखड़ रही हैं और सड़क पर ही चादर के रूप में बिखर रही है लेकिन इस सड़क पर झाड़ू लगाते और बजरियो का निपटान होते आज तक नहीं देखा गया। विभागीय अधिकारियों को भी सफाई कराने में कोई रुचि नहीं दिखती। सबको यह लगता है कि नगर निगम का अमला खुद यहां पर आकर सफाई करेगा किंतु अमले के पास इतनी फुर्सत कहां कि वह सड़क-सड़क झांकता फिरे। निगम में व्यवस्था भले ही लागू कर दी गई है किंतु छोटे-छोटे जोन होने के बावजूद जोन की समस्याओं से अधिकारी और उनका अमला ज्यादातर नावाकिफ रहता है। रोज धूल-बजरी उड़ती नजर आती है। वाहन गुजरते हैं तो सड़क की धूल हवा में और हवा के साथ लोगों की सांसों में समा रही है।

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अब जनता यह भी सोच रही है कि जिसके दरवाजे के सामने धूल का रोज शो चल रहा हो, वहां से शहर के प्रदूषण की निगरानी कितनी दूर तक पहुंच रही होगी? शहर की कई सड़कों को देखकर तो यही लगता है कि झाड़ू और सड़कों का काफी दिनों से संपर्क ही टूट गया है। सफाईकर्मी हैं, व्यवस्था है, जिम्मेदार अधिकारी हैं, फिर भी सड़क पर कचरा क्यों दिख रहा है,यह सवाल आम आदमी पूछ रहा है।
👉🏻 आयुक्त करें तो क्या करें?
त्योहारी सीजन में जब व्यवस्थाएं दुरुस्त होनी चाहिए, तब चौतरफा समस्या/अव्यवस्था दिखाई दे तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। नगर निगम की व्यवस्था में सबसे ऊपर आयुक्त हैं। लेकिन नीचे का सिस्टम अगर अपनी चाल में चलता रहे तो ऊपर बैठे अधिकारी भी आखिर कितनी जगह खुद झाड़ू लेकर पहुंचेंगे?
शहर में एक कहावत जैसी स्थिति बनती दिख रही है-काम नीचे का, जवाब ऊपर वाले का। अगर किसी सड़क की सफाई नहीं हुई तो सवाल आयुक्त से। स्ट्रीट लाइट बंद है तो सवाल आयुक्त से। कचरा नहीं उठा तो सवाल आयुक्त से। अब सवाल यह भी है कि अधीनस्थ अमला आखिर किसके लिए है?
या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि साहब से काम कराने के बजाय साहब को ही रोज किसी न किसी मुद्दे पर पंगा दिलाते रहो!
हालांकि, जनता को इससे मतलब नहीं कि फाइल किस टेबल पर रुकी। उसे बस इतना चाहिए कि त्योहार में सड़क साफ मिले, रास्ते में रोशनी मिले और सांस लेते वक्त धूल न मिले।




