👉🏻जश्न रिसोर्ट में बह रही श्रीमद् भागवत कथा की अमृतधारा
👉🏻सिंघानिया अग्रवाल परिवार (छितोली वाले) का आयोजन
👉🏻कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज महाराज का स्वागत कर आशीर्वाद लेने उमड़े श्रद्धालु
कोरबा। श्री हरि की कृपा एवं पितरों के आशीर्वाद से सिंघानिया अग्रवाल परिवार (छितोली वाले) की ओर से श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह का आयोजन किया जा रहा है।
कथा का आयोजन 12 सितम्बर से प्रारम्भ है जो 19 सितंबर तक जश्न रिसोर्ट, राताखार रोड, कोरबा में होगा। प्रतिदिन दोपहर 3 बजे से
कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज महाराज द्वारा कथा का वाचन किया जा रहा है।
कथा के दौरान अलग-अलग दिनों में भागवत के विविध प्रसंगों का वर्णन किया जा रहा है।
इस कड़ी में कथा के पांचवे दिन श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं, श्री गिरिराज पूजन के पश्चात भगवान को छप्पन भोग लगाए गए।
कथा को आगे बढ़ाते हुए छठवें दिन गुरुवार को कंस वध, गोपी गीत एवं रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाया। प्रसंग वर्णन में कथा व्यास ने कहा कि –
शास्त्र मनुष्य की बुद्धि को हंस बनाते हैं। भगवान भोले शंकर जी कैलाश पर्वत पर रहते हैं, हंस वहीं पाए जाते हैं और वहीं से आते हैं। उन्होंने कहा कि कोरबा की पवित्र हसदेव के तट पर और त्योहारों के विशेष मौके पर श्रीमद् भागवत कथा का आयोजन सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि परमात्मा इस धरती पर स्वयं सिखाने के लिए आए कि आपको मनुष्य के रूप में किस तरह कार्य करना है। मनुष्य का जन्म आपने प्राप्त तो कर लिया किंतु मुझे अर्थात भगवान को कैसे प्राप्त करेंगे इसका सूत्र उन्होंने स्वयं बताया। अब भगवान को हम कैसे प्राप्त करें यह अपना-अपना प्रयास होता है। विभिन्न प्रसंगों का वर्णन करते हुए आचार्य ने कहा कि मनुष्य नदी में पहली बार डुबकी लगाता है तो डरता है लेकिन बार-बार डुबकी लगाने पर वह उस नदी से कुछ ना कुछ निकालता ही है, ठीक इसी तरह शास्त्र में बार-बार प्रवेश करते रहने से, चिंतन मनन करते रहने से कुछ ना कुछ कीमती वस्तु तो मिलती ही है। संगीतमय भजनों के साथ विभिन्न प्रसंगों को गीतों में वर्णन करते हुए आचार्य ने जहां भक्तों को झुमाया वही कहा कि समय का सदुपयोग बहुत आवश्यक है। हम यह नहीं कहते कि भगवान के भजन का/ उन्हें स्मरण करने का कोई एक विशेष समय होना चाहिए बल्कि समय का सदुपयोग करते-करते परमात्मा से जुड़े रहना चाहिए। उन्होंने कथा के दौरान भगवान श्री कृष्ण का गोपियों के संग महारास व गोपी प्रसंग का वर्णन करते हुए कहां कि जहां अहंकार आ जाए, वहां से ओंकार अपने आप चला जाता है। अर्थात, अहंकार और ओंकार दोनों एक साथ नहीं रह सकते। ईश्वर को पाने के लिए अहंकार का त्याग करना ही पड़ता है। अहंकार जब शून्य हो जाता है तो ईश्वर से सरोकार होना निश्चित है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को कुछ पाने के लिए बार-बार दौड़ना पड़ता है। वह बाहर की दुनिया में जिंदगी भर दौड़ लगाता ही रहता है, भागता ही रहता है किंतु परमात्मा को पाने के लिए बाहर नहीं बल्कि अपने भीतर दौड़ लगानी पड़ेगी। मनुष्य का बाहर पसीना बहता है किंतु जब भीतर आंसू बहते हैं तो परमात्मा की प्राप्ति होती है। परमात्मा बिना आंसुओं के प्राप्त नहीं होते।
आचार्य ने कहा कि ज्ञानी वही है जिसमें अहंकार शून्य हो, जिसमें ज्ञान का अहंकार हो जाय तो वह ज्ञानी नहीं कहा जा सकता। विभिन्न प्रसंगों के वर्णन की कड़ी में गुरूवार को भगवान श्री कृष्णा और रुक्मणी के विवाह का सुंदर प्रस्तुतीकरण किया गया। उपस्थित भक्तवृन्द राधा रानी व भगवान कृष्ण के भजनों पर झूमते-नाचते रहे। कथा श्रवण करने के लिए सिंघानिया अग्रवाल परिवार के सदस्यों के अलावा नगर के भागवतप्रेमी भी पहुंच रहे हैं।
👉🏻आज का अगामी कार्यक्रम
आज 18 सितंबर को सुदामा प्रसंग, परीक्षित मोक्ष एवं व्यास पूजन होगा। 19 सितंबर को हवन, पूर्णाहुति एवं प्रसाद वितरण के साथ आयोजन का समापन होगा।
आयोजक सिंघानिया अग्रवाल परिवार (छितोली वाले) ने नगर के श्रद्धालुओं और भागवत प्रेमियों से कथा में सपरिवार उपस्थित होकर पुण्य लाभ प्राप्त करने का आग्रह किया है। कथा का यू-ट्यूब लिंक पर सीधा प्रसारण भी देखा जा सकता है।




