👉🏻 जुड़वा बच्चों ने जन्म लिया, इसमें से एक की पीलिया से हालत बिगड़ने पर गंभीरता से इलाज नहीं करने का आरोप
👉🏻 अस्पताल के कर्मचारी से हुई मारपीट, मचा हंगामा पुलिस ने शांत कराया
कोरबा। शारदा विहार में संचालित आयुष्मान हॉस्पिटल में जन्मे जुड़वा बच्चों में से एक नवजात की मौत के बाद परिजनों ने जमकर हंगामा किया। परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन और चिकित्सकों पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाते हुए मारपीट तक कर डाली। आरोप है कि बच्चे को समय पर उचित इलाज के लिए रेफर नहीं किया। हंगामे औऱ अफ़रा-तफरी के बीच पुलिस बुलाई गई तब जाकर माहौल व मामला शांत हुआ।
जानकारी के मुताबिक परशुराम नगर दादर निवासी शशिकांत ओझा की पत्नी ने 17 जुलाई को जुड़वा बच्चों को जन्म दिया। शादी के लगभग 16 साल बाद संतान सुख से परिवार में खुशी का माहौल था। जन्म के समय दोनों बच्चों का वजन सामान्य था। हालांकि, जन्म के कुछ घंटों बाद ही एक बच्चे के शरीर पर पीलिया के लक्षण दिखाई देने लगे। परिजनों ने तुरंत इसकी जानकारी ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सकों को दी।
👉🏻परिजानों का आरोप- डाक्टरों ने गंभीरता नहीं दिखाई
परिजनों का आरोप है कि शिकायत के बावजूद डॉक्टरों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और उन्हें आश्वासन दिया। इसके बाद बच्चे की हालत लगातार बिगड़ती गई। जब स्थिति अत्यधिक खराब हो गई, तब परिजनों के दबाव में आकर अस्पताल प्रबंधन ने बच्चे को रेफर किया। पीड़ित बच्चे को आनन-फानन में दूसरे अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। ओझा परिवार का कहना है कि यदि समय रहते बच्चे को बड़े अस्पताल भेजा जाता तो उसकी जान बच सकती थी। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन पर लापरवाही बरतने और मरीजों की गंभीरता को नजरअंदाज करने का आरोप लगाते हुए मामले की उच्च स्तरीय जांच और दोषी चिकित्सकों पर कार्रवाई की मांग की है। इस घटना के बाद परिजनों ने दूसरे बच्चे को ऐहतियात के तौर पर आयुष्मान हॉस्पिटल से निकलवा कर बिलासपुर के अस्पताल में भर्ती करा दिया है।
👉🏻पीलिया के लक्षण दिखने पर रेफर किया गया: प्रबन्धन
इस संबंध में अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि नवजात की स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही थी। पीलिया के लक्षण दिखते ही उचित उपचार शुरू किया गया था और स्थिति गंभीर होने पर ही बच्चे को रेफर किया गया। उपचार में कोई लापरवाही नहीं बरती गई और भला हम लापरवाही क्यों करेंगे…!
👉🏻 प्रबन्धन की सफाई के बीच सवाल
आयुष्मान हॉस्पिटल में हुए इस घटनाक्रम ने अस्पताल में जन्म लेने वाले शिशुओं के त्वरित इलाज और आवश्यक परीक्षण तथा देखभाल की सुविधाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ की उपलब्धता यदि है तो क्या उनसे प्रारम्भिक हालात संभाले नहीं संभले? उन्होंने समय रहते दोनों बच्चों को रेफर क्यों नहीं किया? काफी देर बाद जब रात में जुड़वा बच्चों को दूसरे अस्पताल ले जाया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी, साथ ही दूसरे बच्चे को लेकर रिस्क बताया गया। एक शिशु की मौत के बाद उस अस्पताल ने अपनी तमाम आवश्यक व्यवस्थाओं के साथ दूसरे शिशु को बिलासपुर रेफर किया। अब यदि आयुष्मान हॉस्पिटल में शिशु रोग विशेषज्ञ नहीं है तो अस्पताल प्रबंधन ने इस मामले में लापरवाही क्यों बरती, यह सवालों के दायरे में है। स्वास्थ्य विभाग को चाहिए कि वह तमाम अस्पतालों में शिशु रोग विशेषज्ञों की उपलब्धता और उनके द्वारा दी जा रही सुविधाओं के बारे में नियमित परीक्षण कराएं।







