👉🏻 मंत्री जी ने किया लोकार्पण, मेयर-सभापति व पार्षद नदारद रहे तो मचा है हंगामा
कोरबा। कोरबा जिले में सत्ता की लहर अलग-अलग तरह से लहराते हुए चल रही है। तीन अलग-अलग ध्रुव में भाजपा की राजनीति हो रही है। इस गुटीय राजनीति का शिकार नगर निगम और इसके अधिकारी भी होने लगे हैं। पूर्व में कुछ आंतरिक मामले और घटनाक्रम हुए जो कहीं दबे रहे, छिपे रहे तो कुछ पैमाने पर शिला लेख के जरिये उभर कर सामने आए। इन सब के बीच जो ताजा घटनाक्रम शनिवार को घटित हुआ और जिस तेजी से यह बात निगम के गलियारे से लेकर सत्ता की गलियों में गूंज रही है उसने चौंकाया है।
कोरबा शहर के सौदंर्यीकरण के लिये 6 जून शनिवार को निगम द्वारा नवस्थापित ’’ द बुल एण्ड द मेटाडोर ’’ ’’ धर्मचक्र ’’ ’’ थॉट कॉर्नर-सेल्फी प्वाइंट ’’ का प्रदेश के श्रम मंत्री लखनलाल देवांगन ने न्यू अग्रवाल चौक राताखार, आई.टी.आई. चौक व कोसाबाड़ी चौक में लोकार्पण किया।
इन कार्यक्रमों के साथ ही निगम में सम्मान और अपमान की राजनीति हावी हुई है। इसमें अधिकारी टारगेट में रखे जाकर कहीं ना कहीं मोहरा के रूप में एक पदीय नेतृत्व को इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पूरे मामले में सभापति नूतन सिंह ठाकुर ने ऐलान कर दिया है कि यदि जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई नहीं होती है तो वे सदन का अध्यक्ष होने के नाते कुर्सी नहीं, बल्कि जमीन पर बैठकर काम करेंगे। उन्होंने अपना फरमान सुना दिया है तो दूसरी तरफ महापौर ने भी निगम के अधिकारियों को फटकार के कड़वे घूंट पिलाए। उनका गुस्सा अपनी जगह पर जायज हो भी सकता है कि मंत्री जी के कार्यक्रम में उन्हें बुलाया नहीं गया। सभापति की मानें तो उन्हें भी और वार्ड के पार्षदों को भी इन कार्यक्रमो की कोई सूचना नहीं दी गई। इस तरह का रवैया अपमानजनक है।
इधर, दूसरी तरफ प्रशासनिक और मंत्री जी के खेमे से बात निकली है कि इस तरह के कार्यक्रम की सूचना तात्कालिक तौर पर कुछ घंटे पहले सम्बन्धितों को दी जा चुकी थी। जिस तरह से पहले सूचना मिलती रही है,उसी तरह से सूचना दी गई। मौके पर उनकी उपस्थिति कार्यक्रम से कुछ देर पहले व कार्यक्रम के कुछ देर बाद देखी गई लेकिन शामिल होने नहीं पहुंचे।
अब बात रही उपस्थिति की तो कैबिनेट मंत्री के कार्यक्रम में उनके सम्मान स्वरूप महापौर, सभापति निर्वाचित पार्षद, सत्ता और संगठन से जुड़े लोगों की उपस्थिति स्वमेव होनी चाहिए, ऐसा जानकारों का कहना है। कैबिनेट मंत्री के कार्यक्रम में जानबूझकर शामिल नहीं होना एक तरह से उनका अपमान है।
अब अपमान और सम्मान की लड़ाई में साकेत की गलियां गूंज रही हैं। अधिकारी डांट-फटकार का सामना कर रहे हैं, एक-दूसरे पर बात थोपी जा रही है, शिकवा-शिकायतों का दौर चल रहा है।
👉🏻 आधे रास्ते से लौटने की वजह..
हमारी पूछ परख नहीं हुई, हमें क्यों नहीं बुलाया गया..? इस तरह के तमाम आरोप अधिकारी झेल रहे हैं। इस बीच शहर में एक चर्चा आधे रास्ते से लौटने की चल रही है। प्रत्यक्षदर्शी व निगम सूत्र बताते हैं कि अग्रसेन तिराहा में कार्यक्रम के बाद मल्टी लेवल पार्किंग के पास लोकार्पण कार्यक्रम में मंत्री जी शामिल हुए। यहां कार्यक्रम संपन्न होने के बाद जब उनका काफिला निकलने को तैयार था तो ठीक इसी समय राताखार की तरफ से महापौर की गाड़ी पहुंची। दोनों काफिला अगल-बगल एक/दूसरे के नजदीक हुए। माना जा रहा था कि यहां से अब अगले दो कार्यक्रमों में महापौर की उपस्थिति सुनिश्चित होगी लेकिन अगले कार्यक्रम स्थल पर पहुंचने तक महापौर का काफिला दूसरी दिशा पकड़ चुका था और मौके पर उपस्थिति दर्ज नहीं हुई। कोसाबाड़ी चौक में भी महापौर की उपस्थिति नहीं थी, ना ही सभापति कार्यक्रम में नजर आए। बताया जा रहा है कि इससे पहले अग्रसेन तिराहा में आयोजित कार्यक्रम स्थल पर सभापति की मौजूदगी थी लेकिन वह वहां रुके बिना आगे बढ़ गए।
👉🏻 नहीं पूछा गया, तो भी क्या फर्ज नहीं बनता…!
अब सवाल है कि क्या वाकई में निगम के जिम्मेदार अधिकारियों के द्वारा महापौर व सभापति को 6 जून के उक्त चार लोकार्पण कार्यक्रमों के संबंध में सूचना नहीं दी गई थी। सूचना दी गई थी तो क्या वह प्रॉपर चैनल था? यदि सूचना मिली थी तो उपस्थित क्यों नहीं हुए? क्या कैबिनेट मंत्री के द्वारा लोकार्पण कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए कोई विशेष सूचना देने की व्यवस्था है। यदि,सूचना नहीं दी जा सकी तो क्या खुद से केबिनेट मंत्री के कार्यक्रम में शामिल होना फर्ज नहीं था..?
ऐसे तमाम तरह के सवाल लोगों के मन में उभर रहे हैं। साथ ही यह भी बात भी उभरी है कि गुटीय संतुलन कुछ ठीक नहीं चल रहा और सरकार नाराज चल रहे हैं। इन सबके बीच प्रशासनिक अधिकारी इधर कुआं उधर खाई-जाएं तो जाएं कहां, वाले चक्कर में फंसकर रह गए हैं। सवाल कायम है कि आखिर गुटीय लड़ाई में टारगेट कौन है और किसके कंधे पर बंदूक रखकर गोली चलाई जा रही है, यह अस्पष्ट है।






