👉🏻जमाल खान व अन्य का तबादला कर क्लीनचिट देने की कोशिश, सहकारी समिति में आर्थिक अनियमितता को संरक्षण…?
कोरबा। जब महकमे के शीर्ष अधिकारी दोषियों को जानबूझकर बचाने की मंशा रखते हैं तो भला फिर किसी आर्थिक अपराध के मामले में शिकायत पर जांच कराने की जरूरत क्यों? यदि जांच टीम गठित की गई, जांच दल ने जांच किया और ईमानदाराना जांच में आर्थिक गबन का दोषी पाया है तो फिर दोषियों को बचाने के क्या मायने? विभागीय अधिकारियों के द्वारा दोषी पाए गए लोगों को बचाने के लिए की गई कवायद/तबादला छत्तीसगढ़ शासन के जीरो टॉलरेंस की नीति पर जहां सवाल उठाती है वहीं यह भी बताने के लिए पर्याप्त है कि सरकार चाहे कुछ भी कह ले/कर ले, लेकिन जहां भ्रष्टाचार और भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए शीर्ष अधिकारी संरक्षक के रूप में काम करेंगे तो वहां किसी की भी नहीं चलेगी। यदि अपराध करने वाला और रसूखदार है तो वह अपनी गर्दन बचा ही लेगा वरना कोई छोटा-मोटा कर्मचारी होता तो अब तक न सिर्फ निलंबित हो जाता बल्कि वसूली और एफआईआर में भी उलझ गया होता।
हम बात कर रहे हैं कोरबा जिले के उतरता समिति की जहां लाखों का गबन उजागर और प्रमाणित हुआ है। इसमें संलिप्त पर्यवेक्षक जमाल खान पूर्ण रूप से दोषी पाए गए हैं तो वहीं कोरबी समिति को लेकर भी उनकी भूमिका संदेह के दायरे में होने की शिकायत की गई है। एक मामले में विभाग ने उन्हें बचाने के लिए अपनी पूरी कोशिश की तो संबंधित बैंक के शीर्ष प्रबंधन के द्वारा भी उन्हें संरक्षण प्रदान किया गया और कोरबी के मामले में तो जांच की कोई सुगबुगाहट दूर-दूर तक सुनाई नहीं दे रही है।
👇🏻 नीचे लिंक में पढ़ें इनके भ्रष्टाचार की दास्तां…..





