👉🏻करतला जनपद में सामने आया मामला, कोरबा में भी कई पंचायतें संदेह के घेरे में
कोरबा। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के नाम पर जिले में एक सुनियोजित आर्थिक आपराधिक षड्यंत्र रचे जाने के गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं। आरोप है कि अनेक पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, पंचायत सचिवों, आवास मित्रों तथा मनरेगा से जुड़े स्थानीय स्तर से लेकर जनपद, ब्लॉक और जिला स्तर तक के कुछ जिम्मेदार अधिकारियों-कर्मचारियों की कथित सांठगांठ के कारण योजना की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं। फर्जी जियो-टैगिंग, अधूरे या अस्तित्वहीन आवासों को कागजों में पूर्ण दर्शाने तथा रिकॉर्ड में हेरफेर किए जाने जैसे आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। हाल के दिनों में विशेष रूप से कोरबा और करतला जनपद से सामने आए मामलों ने प्रशासनिक गलियारे में भी हलचल मचा दी है। कहीं आपसी वर्चस्व की लड़ाई के चलते तो कहीं जागरूक लोगों द्वारा शिकायत किए जाने से एक-एक कर कई मामले सामने आने लगे हैं। यदि इन सभी आरोपों की निष्पक्ष और गहन जांच कराई जाए, तो कई बड़े चेहरे बेनकाब हो सकते हैं।
इन्हीं कथित अनियमितताओं की कड़ी में अब आवास मित्रों की नियुक्ति और कार्यप्रणाली को लेकर एक नया और बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरोप है कि जिन व्यक्तियों की आवास मित्र के रूप में नियुक्ति हुई है, वे स्वयं फील्ड में काम नहीं कर रहे, बल्कि उनकी जगह अन्य लोग जियो-टैगिंग, हितग्राहियों से संपर्क, निरीक्षण और विभागीय बैठकों में भागीदारी जैसी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं।
👉🏻 फिलहाल, इनको लेकर गहराया है संदेह
सूत्रों के अनुसार जनपद पंचायत करतला के ग्राम पंचायत कथरीमाल-गुमिया में आवास मित्र राकेश राजवाड़े (पिता- लक्ष्मीनारायण) की नियुक्ति हुई है। आरोप है कि उनकी जगह उसी नाम के दूसरे व्यक्ति राकेश राजवाड़े (पिता- मोहनलाल राजवाड़े) फील्ड में जाकर जियो-टैगिंग करते हैं तथा विभागीय बैठकों में भी शामिल होते हैं। यदि यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह सरकारी अभिलेखों और वास्तविक कार्य के बीच गंभीर विसंगति का मामला होगा।
इसी प्रकार ग्राम पंचायत बरपाली-सलिहाभाठा में संध्या पाटनवार (पिता- रामनारायण) की नियुक्ति आवास मित्र के रूप में होने की बात सामने आई है। सूत्रों का दावा है कि विवाह के बाद उनके बिलासपुर में निवास करने के कारण उनकी जगह उनके भाई शुभम राजवाड़े फील्ड का पूरा कार्य संभालते हैं और जियो-टैगिंग भी वही करते हैं। यह भी आरोप है कि नियुक्त आवास मित्र जनपद की बैठकों में कभी उपस्थित नहीं हुईं।
ग्राम पंचायत करतला में भी इसी प्रकार का मामला सामने आया है। यहां दुर्गा राजवाड़े (पिता- राजकुमार) के आवास मित्र के रूप में नियुक्त होने की जानकारी है। आरोप है कि विवाह के बाद उनके बिलासपुर में रहने के कारण उनकी बहन भुनेश्वरी कौशिक विभागीय बैठकों में शामिल होती हैं तथा जियो-टैगिंग सहित अन्य जिम्मेदारियां निभाती हैं।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि इन मामलों की जानकारी संबंधित विकासखंड समन्वयक को भी होने के बावजूद आज तक किसी प्रकार की प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। यदि यह आरोप सही हैं तो सवाल केवल आवास मित्रों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय करनी होगी, जिन्होंने ऐसे मामलों को नजरअंदाज किया।
👉🏻 योजना की पारदर्शिता पर सवाल
जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना में जियो-टैगिंग, निरीक्षण और प्रगति रिपोर्ट का महत्वपूर्ण महत्व होता है। ऐसे में यदि नियुक्त कर्मचारी की जगह कोई दूसरा व्यक्ति सरकारी कार्य कर रहा है, तो योजना की पूरी प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि इस तरह की व्यवस्था केवल करतला तक सीमित नहीं हो सकती। कोरबा जनपद की कुछ पंचायतों को लेकर भी संदेह जताया जा रहा है, जहां इसी प्रकार की अनियमितताओं की चर्चा है। हालांकि इन मामलों की अभी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में एक व्यक्ति आवास मित्र है और कार्य कोई दूसरा कर रहा है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी? इसके साथ ही यह यक्ष प्रश्न है कि-क्या जिले में ऐसे केवल तीन ही मामले हैं, या पूरी जांच होने पर और भी पंचायतों से ऐसे नाम सामने आएंगे?
🫵🏻इससे कई सवाल खड़े होते हैं
1.क्या नियुक्त आवास मित्र स्वयं जियो-टैगिंग करने के लिए अधिकृत हैं?
2.यदि कोई दूसरा व्यक्ति ऐप चला रहा है तो उसका लॉगिन किसके नाम से है?
3.बैठकों में उपस्थिति किसके नाम से दर्ज हुई?
4.मानदेय किसके खाते में गया?
यदि नियुक्त व्यक्ति मौजूद नहीं था तो कार्य का सत्यापन किसने किया?
5.क्या ब्लॉक और जनपद के अधिकारियों ने कभी इसकी जांच की?
🫵🏻जांच में ये 7 बिंदु सामने आने चाहिए
1.नियुक्ति आदेश किसके नाम जारी हुआ?
2.जियो-टैग किस मोबाइल और आईडी से हुए?
3.बैठक उपस्थिति रजिस्टर में किसके हस्ताक्षर हैं?
4.फील्ड में वास्तव में कौन काम कर रहा था?
5.मानदेय किसके बैंक खाते में गया?
6.क्या अधिकारियों को इसकी जानकारी थी?
7.यदि जानकारी थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?







