👉🏻 टेंडर “मैनेज” के खेल में मुखिया की संलिप्तता से सरकार को करोड़ों का चूना !
कोरबा। वैसे तो ऑनलाइन टेंडर प्रक्रिया को पारदर्शिता की मिसाल माना जाता है, लेकिन कोरबा जिले के R.E.S यानी ग्रामीण यांत्रिकी सेवा विभाग में इस व्यवस्था को भी मैनेज करने का खेल चल रहा है। सूत्रों के अनुसार पिछले 1 वर्ष में करोड़ों रुपये के टेंडर इसी “मैनेज सिस्टम” से निकाले गए हैं।
आरोप है कि इस पूरे खेल में विभागीय मुखिया की प्रत्यक्ष संलिप्तता है, जिससे शासन को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है।
👉🏻करोड़ों का बजट, R.E.S को मिला जिम्मा
सूत्र बताते हैं कि जिला खनिज न्यास मद और डिपॉजिट मद से प्राप्त राशि का आवंटन ग्रामीण यांत्रिक सेवा संभाग कोरबा को किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल, उप स्वास्थ्य केंद्र, हाई स्कूल भवन, महतारी सदन, रेजिडेंशियल हॉस्टल सहित कई निर्माण कार्यों का जिम्मा जिला कार्यालय ने इसी विभाग को सौंपा है। इसी बड़े बजट को हथियाने के लिए विभाग में टेंडर मैनेज का खेल चल रहा है।
👉🏻ऐसे होता है “टेंडर मैनेज” का खेल – असंतुष्ट ठेकेदारों ने खोला राज
असंतुष्ट ठेकेदारों के एक समूह ने टेंडर मैनेज की पूरी प्रक्रिया का खुलासा किया है:
- पहला चरण: ठेकेदार ऑनलाइन टेंडर डालता है और अपने सभी तकनीकी दस्तावेज, “TDR, सत्यनिष्ठा शपथ पत्र” सहित विभागीय शर्तों के दस्तावेज 3 पद्धति लिफाफे में बंद कर रजिस्टर्ड/स्पीड पोस्ट से विभाग को भेजता है।
- दूसरा चरण: ऑनलाइन अपलोड किए गए सभी दस्तावेजों की हार्ड कॉपी भी स्पीड पोस्ट से फिजिकल विभाग में जमा कराई जाती है।
- तीसरा चरण: टेंडर खोलने के दिन विभाग द्वारा लिफाफे खोलते समय सिर्फ “सत्यनिष्ठा और TDR” की जांच कर औपचारिकता पूरी की जाती है।
👉🏻असली खेल यहीं से शुरू: इसके बाद विभागीय निर्देश और ठेकेदारों की सहमति से “मैनेज” का खेल शुरू होता है। यह पूरी कार्यवाही विभाग के मुखिया के संज्ञान में होती है।
आरोप है कि एक निविदा में 9 से 10 ठेकेदार भाग लेते हैं लेकिन जिसे काम सौंपना तय होता है, उसे छोड़कर बाकी सभी ठेकेदारों के स्पीड पोस्ट से आए तकनीकी दस्तावेजों में से “किसी में सत्यनिष्ठा तो किसी में TDR में कमी” बताकर खारिज कर दिया जाता है।
सूत्रों का कहना है कि यह खेल विभागीय मुखिया की सहमति और ठेकेदारों द्वारा विभाग को “नजराना” देने के बाद ही संभव हो पाता है।
👉🏻सरकार को करोड़ों का नुकसान
इस मैनेज सिस्टम के कारण योग्य और कम दर वाले ठेकेदार बाहर हो जाते हैं और मनमानी दरों पर काम दिए जाते हैं। इससे सीधे तौर पर सरकार को करोड़ों रुपये का चूना लग रहा है। साथ ही निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और उच्चाधिकारी इस गंभीर आरोपों की जांच कराकर दोषियों पर क्या कार्रवाई करते हैं।






