👉🏻 कोरबा निगम की सख्ती क्या सिर्फ पौधा काटने वालों तक सीमित है?
कोरबा। यह तस्वीर देखकर मन विचलित होना स्वाभाविक है। जिस पेड़-पौधे को शहर के सौंदर्यीकरण, हरियाली और लोगों को साफ हवा देने के लिए लगाया गया, आज वही पेड़-पौधा प्रचार का सहारा बना दिया गया है। पौधा बढ़ रहा है, शहर की हरियाली बढ़ रही है, लेकिन उसके साथ उसकी सांस रोकने का इंतजाम भी कर दिया गया।
कोरबा में इन दिनों ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे अभियान के जरिए पौधरोपण पर जोर दिया जा रहा है। नगर निगम और प्रशासन की ओर से शहर के अलग-अलग हिस्सों में पौधे लगाए जा रहे हैं। इसके पहले सौंदर्यीकरण के लिए टीपी नगर से सीएसईबी चौक तक डिवाइडर के बीच कीमती पौधे लगवाए गए। पॉम के 3-4 कीमती पौधे शुरुआत में चोरी हो गए तो अब विकसित होते यह पौधे प्रचार की भूख को शांत करते नजर आ रहे हैं।
👉🏻 नेता ही ऐसा करेंगे तो किसे रोकेंगे…?
जरा विडंबना तो देखिए, जिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आव्हान पर एक पेड़ मां के नाम अभियान में भाजपाई बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं तो दूसरी तरफ इसी पार्टी के जिलाध्यक्ष व पदाधिकारी से जुड़ा फ्लेक्स सौंदर्यीकरण के महंगे पौधों पर बांध दिया जाता है। अब भला सत्ता पक्ष के जिम्म्मेदार लोग ही ऐसा करेंगे तो, आप बनाए जाने वाले और पारित कराए गए सख्त नियमों का पालन दूसरों से कैसे करा पाएंगे?
👉🏻पौधा लगाना ही जिम्मेदारी है या उसे बचाना भी?
एक तरफ सरकारी धन से रोपे गए पौधे को नुकसान पहुंचाने पर अर्थदंड की कार्रवाई तक हो रही है, प्रतिबन्धात्मक कार्रवाई भी की गई फिर दूसरी तरफ यह तस्वीर देखकर गुस्सा भी आता है और व्यवस्था की नीयत पर सवाल भी उठता है।
👉🏻क्या पेड़-पौधों को नुकसान सिर्फ काटने से होता है?

अगर पेड़ के तने को फ्लेक्स, बोर्ड या प्रचार सामग्री के लिए इस्तेमाल किया जाए, उसे रस्सी या अन्य सामग्री से बांधा जाए, तो क्या यह पेड़ की सुरक्षा है? कुल्हाड़ी चलाने वाला ही दोषी है और पेड़-पौधों को प्रचार का खंभा बनाने वाला नहीं?
👉🏻 सौंदर्य के नाम धन पानी की तरह बहाया जा रहा
शहर के डिवाइडरों और सड़कों के किनारे लगाए गए पौधे महज सजावट की चीज नहीं हैं। इनके पीछे सरकारी पैसा, कर्मचारियों की मेहनत, पानी, देखभाल और सबसे बढ़कर प्रकृति के प्रति एक उम्मीद लगी है। लेकिन प्रचार की भूख में वही पौधे अब फ्लेक्स टांगने के काम आने लगें तो फिर सौंदर्यीकरण किसके लिए? प्रचार करने का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन प्रकृति को उसकी कीमत चुकाकर नहीं। ऐसे मामलों में निगम की सख्ती जमीन पर भी दिखनी चाहिए।
👉🏻 जवाबदेही आखिर कब तय करेंगे
यहां सिर्फ फ्लेक्स लगाने वाले से सवाल नहीं होना चाहिए। जिसने लगवाया, जिसने प्रचार का खर्च उठाया और जिसने पेड़ को माध्यम बनाया, उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। अक्सर होता यह है कि सरकारी डीजल और अमला लगाकर फ्लेक्स उतरवाया जाता है, फिर दूसरे लोग अपना प्रचार टँगवा देते हैं जो उसका समय निकल जाने के बाद भी लगा रहता है। जिसने लगवाया/लगाया, आखिर उतारने की उसकी जवाबदेही कब तय होगी? अवैध प्रचार सामग्रियों पर निगम की एमआईसी द्वारा पारित नियम का भी पालन नहीं कर/ करा पा रहे हैं। जिम्मेदार अधिकारी दूसरे काम के बोझ तले दबे हैं, इधर ध्यान ही नहीं देते।
अंत में यही कहना है- सरकारी धन खर्च कर लगाए गए महंगे पौधे पूरे शहर की साझी विरासत है और शहर की सांस भी।
पेड़ बेचारा बोल नहीं सकता, ना विरोध कर सकता है, ना शिकायत लिख सकता है। इसलिए शायद उसकी तरफ से बस इतना ही कहा जा सकता है—
“साहब..! प्रचार आपका है,
पेड़ हमारा भी है…
हमें तो कम से कम सांस लेने दो।”




