👉🏻चंगुल में फंसा कर तिल-तिल कर मरने मजबूर करते सूदखोर
कोरबा। शहर में कारोबार, प्रॉपर्टी, ट्रांसपोर्ट और दूसरे कामकाज की आड़ में निजी स्तर पर ब्याज पर रकम देने का कारोबार कितना बड़ा है, इसका अंदाजा शायद सरकारी कागजों से नहीं लगाया जा सकता। जरूरत के वक्त तत्काल पैसा उपलब्ध कराने के नाम पर शुरू होने वाला यह खेल कई लोगों के लिए बाद में ऐसा जाल बन जाता है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होता।
शहर में ऐसे सफेदपोश चेहरों की चर्चा लगातार सामने आती रही है, जो समाज में अपनी अलग पहचान रखते हैं, लेकिन जरूरतमंदों को रकम देकर मोटे ब्याज की वसूली करते हैं। शुरुआत में रकम छोटी दिखाई देती है, मगर ब्याज और ब्याज पर ब्याज का बोझ बढ़ते-बढ़ते मूल रकम से कई गुना ज्यादा हो जाता है। हालत यह होती है कि कर्ज लेने वाला व्यक्ति रकम चुकाने के बजाय हर महीने सिर्फ ब्याज भरता रह जाता है।
👉🏻जरूरतमंद की मजबूरी बनती है कमाई का जरिया
सबसे ज्यादा परेशानी उन लोगों को होती है जिन्हें बैंक या वैध वित्तीय संस्थाओं से समय पर ऋण नहीं मिल पाता। घर की जरूरत, इलाज, बच्चों की पढ़ाई, कारोबार में घाटा या अचानक आई आर्थिक परेशानी में ऐसे लोग निजी उधारदाताओं का दरवाजा खटखटाते हैं।
यहीं से शुरू होती है मजबूरी की वह कहानी, जिसमें रकम लेने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे ब्याज के बोझ में दबता चला जाता है। कई मामलों में समय पर पैसा नहीं लौटाने पर दबाव, लगातार तकादे और सामाजिक प्रतिष्ठा खराब करने की धमकी जैसे आरोप भी सामने आते रहे हैं।
👉🏻कागजों पर रकम कुछ, हिसाब में कई गुना
इस पूरे खेल का सबसे उलझा हुआ हिस्सा लेन-देन का हिसाब है। कितनी रकम दी गई, कितना ब्याज तय हुआ, अब तक कितना वापस किया गया और फिर भी कितनी रकम बकाया बताई जा रही है,इन सवालों का जवाब हर मामले में अलग हो सकता है।
कई बार जरूरतमंद अपनी मजबूरी में ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर देता है, जिनकी शर्तों की उसे पूरी जानकारी भी नहीं होती। बाद में वही कागज विवाद का आधार बन जाते हैं।
👉🏻सफेदपोश चेहरों के पीछे छिपा है पूरा नेटवर्क?
शहर में सवाल सिर्फ ब्याज पर रकम देने वालों का नहीं, बल्कि यह भी है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर यह कारोबार किस तरह चलता है? पैसा कहां से आता है, किसे दिया जाता है, कितना ब्याज लिया जाता है और वसूली का तरीका क्या होता है,इन पहलुओं की पड़ताल जरूरी है।
सबसे अहम बात यह कि जरूरतमंदों को आर्थिक मदद देने और उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर अनुचित ब्याज वसूलने के बीच एक स्पष्ट अंतर है। यदि किसी मामले में कानून का उल्लंघन होता है तो शिकायत और जांच के आधार पर कार्रवाई की जा सकती है। इसमें चिंताजनक यह है कि इन सूदखोरों का लालच और बेईमान मन इतना बड़ा है कि इनका मूलधन कभी आता ही नहीं, मूलधन और ब्याज की रकम मिला कर भी ब्याज वसूल लेते हैं, फिर भी बकाया बता-बता कर जीना हराम कर देते हैं।
👉🏻 क्या इनकी खुलेगी कुंडली, सामने आएंगे चेहरे..?
शहर में निजी तौर पर ब्याज पर रकम देने वालों को लेकर लगातार उठ रहे सवालों के बीच अब जरूरत है कि ऐसे मामलों की निष्पक्ष पड़ताल हो। किन लोगों का नाम बार-बार सामने आता है, किनके खिलाफ शिकायतें पहुंची हैं और किन मामलों में विवाद पुलिस या न्यायालय तक पहुंच चुका है,इन सबकी जानकारी जुटाना जरूरी है। ऐसे चेहरों का बेनकाब होना बेहद जरूरी है, जो समाज के लिए किसी जहर से कम नहीं।
किसी को बदनाम करना हमारा मकसद नहीं, लेकिन यदि जरूरतमंदों की मजबूरी को कमाई का जरिया बनाया जा रहा है तो उन चेहरों का सामने आना भी जरूरी है। आने वाले दिनों में ऐसे ही मामलों की पड़ताल कर लेन-देन के तरीके, ब्याज की दर, वसूली के आरोप और सामने आए विवादों के आधार पर तस्वीर सामने लाने की कोशिश की जाएगी। आखिर सवाल सिर्फ ब्याज का नहीं, बल्कि उन परिवारों का है जो कर्ज के ऐसे चक्र में फंसकर धीरे-धीरे आर्थिक और मानसिक दबाव झेल कर खुद को नुकसान पहुंचाने तक के लिए मजबूर हो जाते हैं। पुलिस की अपील होती रही है कि सूदखोरों के बारे में शिकायत करें,ताकि इसे हतोत्साहित किया जा सके। पीड़ितों को भी इसके लिए सामने आने की जरूरत है।






