कोरबा। जिले के बहुचर्चित कृष्णा पांडेय हत्याकांड मामले में प्रथम अपर सत्र न्यायालय, कटघोरा (पीठासीन अधिकारी श्रीमती मधु तिवारी) ने आरोप साबित न कर पाने और पुलिस विवेचना में गंभीर खामियां पाए जाने के कारण मुख्य आरोपी गजेंद्र सिंह सोरठे समेत सभी 6 आरोपियों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए दोषमुक्त करार दिया है।
घटना दिनाँक 6 जनवरी 2025 की शाम कोरबी पुलिस चौकी के ग्राम कुरथा में उपसरपंच रामकुमार और कृष्णा पांडेय मोटरसाइकिल से जा रहे थे। इसी दौरान चलाई गई गोली कृष्णा पांडेय की पीठ में लगी, जिससे गंभीर हालत में इलाज के दौरान 10 दिन बाद बिलासपुर सिम्स अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।
पुलिस ने दावा किया था कि ग्राम पंचायत की राजनीति और रंजिश के चलते गजेंद्र सिंह सोरठे ने उपसरपंच रामकुमार की हत्या की साजिश रची थी। इसके लिए उसने सूरजपुर से अवैध पिस्टल खरीदी और शिवप्रसाद उर्फ मोनू के जरिए शूटरों का प्रबंध कर वारदात को अंजाम दिलवाया, जिसमें निशाना चूकने से गोली कृष्णा पांडेय को लग गई। मामले में रामकुमार, राजकुमार, शिवप्रसाद उर्फ मोनू, गजेंद्र सिंह, विरेन्द्र कुमार आर्मो और बलिन्दर रजवाड़े को आरोपी बनाया गया।
न्यायालय में विचारण के दौरानबचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता देवेश केला व अन्य सहयोगियों ने पैरवी करते हुए पुलिस की जांच प्रक्रिया और जप्ती पर गंभीर सवाल खड़े किए।
🫵🏻 जानें किस तरह की गई विवेचना में कई गंभीर चूक
- पिस्तौल और कारतूस की जप्ती प्रमाणित नहीं
कृष्णा पाण्डेय को गोली लगने के संबंध में अज्ञात व्यक्ति के विरूद्ध दर्ज प्रथम सूचना पत्र पर आरोपीगण राजकुमार, रामकुमार, गजेन्द्र एवं बलिन्दर रजवाड़े के जो मेमोरेंडम कथन लेखबद्ध किये गये, जिसके आधार पर आरोपी राजकुमार से जप्ती पत्र के अनुसार पिस्तौल एवं मैगजीन की जप्ती, आरोपी रामकुमार से मोटरसाईकल की जप्ती की गयी। उक्त आरोपीगण के कथन और जप्ती कार्यवाही का समर्थन 4 गवाहों के द्वारा न किये जाने से और इन साक्षियों के साक्ष्य में जो तथ्य आए,उसके आधार पर पिस्तौल और कारतूस की जप्ती कार्यवाही प्रमाणित नहीं हुयी।
झरनापारा रतनपुर से जप्त पिस्तौल और मैगजीन को लेकर तथ्य आया कि कोरबी पुलिस के अधिकारी एवं पुलिसवाले पुलिस वाहन में जप्ती और विडियो शूटिंग बनाने के लिये पहले से एक पिस्तौल एवं गोली मैग्जीन रखे थे तथा उन लोगों(आरोपियों व गवाह) को बोले कि इसी को वहाँ जप्ती बनाकर विडियो शूटिंग करना है, इसिलिये आप लोगो को ले जा रहे हैं। आरोपी राजकुमार के घर के पास पहुँचने के बाद पुलिसवाले राजकुमार को पिस्तौल और मैग्जीन को दिये और राजकुमार को बोले कि तुम इसे घर में रखकर आओ क्योकि विडियो शूटिंग करना है और जप्ती बनाना है तथा उसमें आप लोगो को जप्ती का गवाह बनाना है। - इसी गोली से मौत हुई,वही मृतक के शरीर से निकली, प्रमाणित नहीं
मृतक कृष्णा पाण्डेय के शरीर से पोस्टमार्टम पश्चात आरक्षक मयाराम भैना को दिये गये सीलबंद पैकेट किस प्रकार आरक्षक संजय कुमार साहू के पास आया, इस संबंध में कोई स्पष्टीकरण विवेचक द्वारा नहीं दिया गया और इस दौरान उक्त सीलबंद पैकेट में छेडखानी होने की जानकारी नहीं होने के संबंध में विवेचक अफसर हुसैन के द्वारा किये गये कथन तथा दो गवाह के द्वारा किया गया कथन कि चौकी कोरबी से पिस्तौल और मैगजीन लेकर आरोपी राजकुमार को देकर उक्त पिस्तौल और मैगजीन की जप्ती आरोपी राजकुमार के घर से की गयी है, के आधार पर मृतक के शरीर से जो बुलेट प्राप्त हुआ है, वह वही बुलेट जप्ती पत्र के अनुसार जप्त किया है, इस बारे में संदेह उत्पन्न हुआ है। - गिरफ्तारियों की कार्रवाई ने सन्देह उत्पन्न किया
विवेचक द्वारा आरोपी बलिन्दर रजवाड़े का कथन, आरोपी गजेन्द्र के कथन के पूर्व बजे लेखबद्ध किया गया जबकि आरोपी राजकुमार के कथन में आरोपी बलिन्दर रजवाड़े के संबंध में कोई उल्लेख नहीं था और किस आधार पर पुलिस वाले आरोपी बलिन्दर को सुरजपुर से लेकर आये इस संबंध में भी कोई स्पष्टीकरण विवेचक ने अपने साक्ष्य में नहीं बताया है। आरोपी शिवप्रसाद और विरेन्द्र आर्मों का भी कोई मेमोरेंडम कथन विवेचक द्वारा लेखबद्ध नहीं किया गया था। आरोपी गजेन्द्र के कथन के पूर्व ही आरोपी शिवप्रसाद उर्फ मोनू की किस आधार पर थाने लाकर उनकी गिरफ्तारी की कार्यवाही की गयी, आरोपी गजेन्द्र के कथन को लेखबद्ध करने के बाद आरोपी विरेन्द्र आर्मों को चौकी कोरबी में इतनी जल्दी ग्राम मोरगा मोहला मांझापारा से लाकर गिरफ्तार करने का तथ्य भी अभियोजन कार्यवाही को संदिग्ध कर गया। - पिस्तौल खरीदी के लेन-देन का प्रमाण और बैंक स्टेटमेंट प्रमाणित नहीं
आरोपी गजेन्द्र के कथन के पूर्व ही उसके बैंक खाता विवरण को शाखा प्रबंधक से निकलवाना भी अभियोजन कार्यवाही को संदिग्ध कर गया। अभियुक्त गजेन्द्र सिंह द्वारा सुनील सिंह नामक व्यक्ति को 90,000 रूपये यूपीआई के माध्यम से ट्रांसफर किया जाना लेख किया गया किन्तु सुनील सिंह नामक व्यक्ति कौन है और कहाँ का है, इसके संबंध में विवेचक को कोई जानकारी नहीं है, उसने सुनील सिंह को इस प्रकरण में न तो गवाह बनाया है और न ही अभियुक्त बनाया है। आरोपी बलिंदर रजवाड़े या अन्य व्यक्ति सुनील सिंह से विवेचना के दौरान कोई रकम की जप्ती नहीं की गई। आरोपी बलिंदर से किसी प्रकार की कोई जप्ती कार्यवाही नहीं की, सुनील सिंह नामक व्यक्ति के संबंध में उसने प्रकरण की विवेचना के दौरान कोई जाँच या अग्रिम कार्यवाही नहीं की है। यह लेन-देन भी अभियोजन संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा।
इस प्रकार अभियोजन द्वारा आरोपीगण के विरूद्ध की गयी संपूर्ण कार्यवाही साक्ष्य विवेचना के दौरान संदिग्ध पायी गयी।
✍🏻 अपने फैसले में न्यायाधीश ने यह कहा
दांडिक मामलों में न्यायालय का यह कर्तव्य होता है कि आरोपी के दोषी होने या न होने के प्रश्न पर निर्णय करे तथा न्यायालय सभी सुसंगत साक्ष्य का विश्लेषण करे। आरोपी के आरोपित अपराध में दोषी होने के प्रश्न का निर्णय करते समय अपराध के सभी शर्तों को स्पष्ट एवं दुविधारहित ढंग से साबित होना चाहिए, दांडिक मामले के तथ्य एवं परिस्थितियों कितनी भी जटिल हो, आरोपी के विरूद्ध समस्त आरोप के तथ्य युक्तियुक्त सन्देह से परे साक्ष्य प्रस्तुत कर अभियोजन को प्रमाणित किया जाना आवश्यक होता है। दाण्डिक विधि का यह सर्वमान्य सिद्धान्त रहा है कि अभियोजन पक्ष को अपना पक्ष कथन युक्तियुक्त सन्देह से परे प्रमाणित करना होता है। वह प्रतिरक्षा पक्ष की कमजोरियों से समर्थन ग्रहण नहीं कर सकता, जब तक आरोपी का अपराध विधिक साक्ष्य और अभिलेख से युक्तियुक्त सन्देह से परे प्रमाणित नहीं हो जाता, तब तक उसे किसी अपराध के लिए दोष सिद्ध करार नहीं दिया जा सकता। इस प्रकरण के समग्र तथ्यों एवं परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में अभियोजन कथानक किसी भी रूप में सुदृढ़, सकारात्मक, सत्य व प्रमाणित नहीं है।
अभियोजन आरोपीगण के विरूद्ध सारवान, विश्वसनीय और संपुष्टिकारक साक्ष्य के अभाव में यह संदेह से परे प्रमाणित करने में असफल रहा है। अतः आरोपीगण रामकुमार, शिवप्रसाद उर्फ मोनू एवं विरेन्द्र कुमार आर्मो, गजेन्द्र सिंह, राजकुमार, बलिन्दर रजवाड़े को आरोप में संदेह का लाभप्रदान करते हुए उन्हें दोषमुक्त किया जाता है।






