👉🏻 प्रयासों को बार-बार झटका, धन-समय और ऊर्जा सब व्यर्थ
👉🏻 कम सक्रिय अधिकारी,मैन पावर की कमी से जूझता निगम, राजनीतिक कारण भी आड़े आ रहा
कोरबा। नगर निगम व स्थानीय प्रशासन की अव्यवस्थित योजना और बिना ठोस रणनीति के बाज़ार और शहर सुधारने की कोशिश “गंजों के सिर पर कंघी करने” जैसी साबित हो रही है। व्यवस्था सुधारने के नाम पर चार दिन की चांदनी और फिर अंधेरी रात वाली कहावत को प्रशासनिक अमला चरितार्थ कर रहा है। मामला सड़क तक अतिक्रमण का हो, यातायात व्यवस्था सुधारने में प्रशासनिक सहयोग का हो, कचरा न फैलाने का हो या फिर व्यवस्थित बाजार की स्थापना तथा नयनाभिराम साज-सज्जा का हो, सभी मामलों में “ढाक के तीन पात” वाला हाल है। सरकारी पैसा, समय और ऊर्जा को बर्बाद तो किया जा रहा है किंतु कोई सख्ती नहीं, क्योंकि “राजनीतिक दबाव” एक सधा हुआ सूत्र वाक्य है।
किसी न किसी मद का पैसा जो रखा हुआ है,उसे खर्च करना है तो ठेकेदार को सड़क किनारे, नालियों के स्लैब के ऊपर पेवर ब्लॉक, टाइल्स लगाने का काम दे दो। कहीं लाइटिंग करवा दो, बे वजह की साज सज्जा करा दो क्योंकि पैसा निकलना चाहिए और 1 से 3 प्रतिशत का फिक्स कमीशन बनना चाहिए।

अब गैर जिम्मेदार नागरिक हो या जानवर, दोनों ही अपनी आदत छोड़ नहीं सकते। उन्हें जहां गंदगी करनी होगी,करेंगे ही। फिर, यह तो दूरदर्शी अधिकारियों को भी समझना चाहिए कि कचरा फेंकने वाली जगह पर मखमल बिछा दो, फर्क नहीं पड़ेगा। हाँ, कमीशन और नजर में सक्रिय/क्रिएटिव बनने के चक्कर में जरूर धन का दुरुपयोग करवा दो क्योंकि सरकारी माल तो अपना ही है।

यह रही बात पेवर ब्लाकों की, अब कुछ महीनों से साज-सज्जा और बाजार सुधार/ मॉडर्न बाजार के नाम पर गजब की टोपी पहनाई जा रही है। नगर का विकास फाटक के इस पार तेजी से हो रहा है और उसी तेजी से चंद चहेते ठेकेदारों/ नेतानुमा ठेकेदारों का भी।
बुधवारी का इलाका इसमें टॉप पर है। यहां गन्दगी और आंतरिक अतिक्रमण से बजबजाते, निःशुल्क पसरों की खरीद-फरोख्त/किरायेदारी, अव्यवस्था के बीच मनमाने तरीके से लगते दुकानों, ब
बाजार के पूर्ण खराब मार्गों पर लगे तखत के कारण खरीदारों की आती अड़चन,अनेक पसरों पर बेजा कब्जा और अनुपयोगिता के सवालों के बीच बाहरी हिस्से को सजाने में लाखों रुपए फूंक दिए।
नजरों को नजारा अच्छा लगता है,जब उसे वैसा पेश किया जाय, यहां तो गैर जिम्मेदारों ने इन नजारों को भी साधन बना लिया है।
👉🏻 ऐसे लोग कब होंगे जवाबदार

बात चौंकाने वाली ही है क्योंकि कई लोग इस बात से मतलब नहीं रखते कि उनका शहर साफ-सुथरा और सुंदर लगे। उन्हें दिन भर की अपनी कमाई और दुकानदारी से मतलब है। रोजी-रोटी सबके लिए जरूरी है किंतु व्यवस्था दी गई है तो उस दायरे में रह कर काम करने में क्या बिगड़ जाएगा! सुविधाएं देने के चक्कर मे विभिन्न मदों से लाखों-करोड़ों रुपए फूंक कर भी यही अंजाम होना है, कोई नियंत्रण नहीं तो भला प्रशासनिक व्यवस्था और राजनेताओं की अपेक्षा कहाँ तक सफल होगी। आप तस्वीरों में देख सकते हैं, खुद भी रूबरू होते होंगे, यह सब देखकर सवाल तो उठता है कि, आखिर ये लोग कब अपने शहर के लिए जवाबदार बनेंगे..?
🫵🏻 इस पूरी स्थिति का मुख्य विश्लेषण और वास्तविकता इस प्रकार है:

- दिखावे की कोशिश: प्रशासन एक तरफ बाज़ार को व्यवस्थित करने का दावा कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ दुकानदार बाज़ार की सजावट के सामानों का उपयोग सिर्फ तिरपाल बांधने (दुकान को धूप/बारिश से बचाने) के लिए कर रहे हैं। इससे ‘सौंदर्यीकरण’ का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाता है।
- सड़क पर कब्ज़ा: नियमों का उल्लंघन करते हुए दुकानें अभी भी मुख्य सड़क तक लगाई जा रही हैं, जिससे आने-जाने का रास्ता बेहद डिस्टर्ब हो जाता है। सीतामणी से कोसाबाड़ी तक मुख्य सड़क बेहद चपेट में है। सड़क तक सामान फैलाने के साथ ही दुकान लगाने, मोड़ पर ठेले खड़े करने के कारण हर समय हादसा का खतरा रहता है। आंतरिक व्यावसायिक व आवासीय इलाके भी बहुत प्रभावित हैं। आवास हो या दुकान का निर्माण, सबको नाली तक बनाना है,फिर नाली के ऊपर सीढ़ी, प्लेटफॉर्म। भवन निर्माण अनुमति की शर्तों का खुला उल्लंघन इन दिनों धड़ल्ले से हो रहा है क्योंकि निगरानी और पालन शून्य है। यातायात अमले को पर्याप्त प्रशासनिक सहयोग का अभाव है,नेता वोट बैंक तो पुराने जमे अधिकारी अपना सम्बन्ध निभाने में लगे हैं।
- अव्यवस्थित पार्किंग: पार्किंग व्यवस्था का पालन न होने के कारण गाड़ियाँ जहाँ-तहाँ खड़ी रहती हैं, जो मुख्य और आंतरिक रास्तों के लेकर बाज़ारों में ट्रैफिक जाम का मुख्य कारण बनती हैं। यह नजारा सीतामणी से कोसाबाड़ी तक हर दिन का है। इसके अलावा सड़क तक रखे कचरों/ठोस अपशिष्ट, निर्माण सामग्रियों का ढेर पर अब निगरानी और कार्रवाई नहीं हो रही। इन सामग्रियों के आसपास, दुकानों के सामने सड़क तक आड़ा-तिरछा खड़े होते छोटे-बड़े वाहन मुख्य सड़क को संकरा बनाते हैं।
- गंदगी का आलम: व्यस्त बाज़ारों में साफ-सफाई की कोई उचित व्यवस्था नहीं है, जिससे त्योहारों या व्यस्त दिनों में स्थिति और भी बदतर हो जाती है। चिल्हर सहित थोक विक्रेताओं के द्वारा अपने कचड़ों/अपशिष्ट का उचित निपटान नहीं करने, नालियों में पेपर, फोम, पैरा डाल दिये जाने से सफाई में दिक्कत/जाम की समस्या बारहमासी है। इसमें बुधवारी बाजार प्रमुख है। इतवारी बाजार, मुड़ापार का साप्ताहिक बाजार में भी बदहाली है। बुधवारी बाजार को मॉडल बनाने की योजना तो है लेकिन इसकी सफलता पर संशय है।
इस सभी कारणों से यह कहना गलत न होगा कि “गंजे के सिर पर कंघी करने” की कोशिश हो रही है। अर्थात व्यर्थ या निरर्थक प्रयास किया जा रहा है। ऐसी जगह मेहनत हो रही है जहाँ उसका कोई फायदा या परिणाम निकलता नहीं दिख रहा।






