0 विशेष लेख: सपुरन कुलदीप (अध्यक्ष, भूविस्थापित किसान कल्याण समिति)
कोरबा। लोकतंत्र में शब्द केवल शब्द नहीं होते। सत्ता के शीर्ष पदों से निकला एक शब्द कभी-कभी भाषण से कहीं आगे जाकर समाज की बहस का हिस्सा बन जाता है। वह शब्द लोगों को आहत कर सकता है, किसी आंदोलन को जन्म दे सकता है और कभी-कभी स्वयं सत्ता के लिए सवाल बनकर वापस लौट सकता है।
हाल के घटनाक्रमों में दो शब्द विशेष रूप से चर्चा के केंद्र में आए—‘कॉकरोच’ और ‘दिमागी नक्सल’।
पहला प्रसंग सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत से जुड़ा है। मई 2026 में सुनवाई के दौरान ‘कॉकरोच’ शब्द को लेकर विवाद खड़ा हुआ। इस टिप्पणी को लेकर युवाओं में तीखी प्रतिक्रिया हुई और सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम से एक व्यंग्यात्मक आंदोलन तक सामने आया। बाद में CJI ने स्पष्ट किया कि उनकी बात को गलत ढंग से प्रस्तुत किया गया और उसमें दुर्भावनापूर्ण अर्थ जोड़ा गया।
लेकिन लोकतंत्र का दिलचस्प पक्ष यह है कि किसी शब्द का अर्थ केवल बोलने वाला व्यक्ति तय नहीं करता; समाज भी उसके अर्थ को अपने अनुभवों के आधार पर ग्रहण करता है।
युवाओं ने ‘कॉकरोच’ शब्द को अपमान के रूप में लेने के बजाय उसे ही प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया। यही किसी लोकतांत्रिक समाज की शक्ति है—जिस शब्द से किसी को छोटा करने की कोशिश समझी जाती है, वही शब्द कभी-कभी विरोध की पहचान बन जाता है।
अब आइए दूसरे शब्द पर—‘दिमागी नक्सल’।
15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद के विरुद्ध देश ने सफलता हासिल की है, लेकिन अब ‘दिमागी नक्सल’ एक चुनौती है। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की बात कही तथा युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ने पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री का आशय जिस राजनीतिक या वैचारिक प्रवृत्ति से रहा हो, सवाल यह है कि ‘दिमागी नक्सल’ की सीमा आखिर तय कौन करेगा?
क्या सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने वाला व्यक्ति दिमागी नक्सल है?
क्या बेरोजगारी पर सवाल करने वाला युवा दिमागी नक्सल है?
क्या परीक्षा व्यवस्था की खामियों के खिलाफ आवाज उठाने वाला विद्यार्थी दिमागी नक्सल है?
क्या विस्थापन, शिक्षा, रोजगार, महंगाई या सामाजिक असमानता पर सवाल करने वाला नागरिक इस श्रेणी में आएगा?
या फिर यह शब्द केवल उन लोगों के लिए है जो सचमुच हिंसा और हथियारबंद उग्रवाद का समर्थन करते हैं?
यहीं लोकतंत्र की असली परीक्षा शुरू होती है।
भारत का संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर विचार सही है या हर आंदोलन उचित है। लेकिन इसका अर्थ इतना अवश्य है कि असहमति को अपराध, देशद्रोह या किसी अपमानजनक राजनीतिक लेबल में बदल देने से पहले उसके कारणों को समझना जरूरी है।
कॉकरोच विवाद और ‘दिमागी नक्सल’ की बहस को एक साथ देखने पर एक महत्वपूर्ण राजनीतिक-सामाजिक संदेश सामने आता है।
शब्दों से आंदोलनों को समाप्त नहीं किया जा सकता।
यदि किसी युवा को रोजगार नहीं मिलता, तो उसे कोई विशेषण देने से रोजगार पैदा नहीं होगा।
यदि किसी विद्यार्थी को परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा नहीं है, तो उसे किसी राजनीतिक नाम से पुकारने से उसकी चिंता समाप्त नहीं होगी।
यदि किसी किसान को अपनी जमीन और भविष्य की चिंता है, तो उसे विकास-विरोधी कह देने से उसकी समस्या खत्म नहीं होगी।
और यदि किसी नागरिक को सरकार की किसी नीति से असहमति है, तो उसकी असहमति को केवल एक लेबल देकर खारिज करने के बजाय उसके तर्क का जवाब देना लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती होगी।
यही बात न्यायपालिका पर भी लागू होती है। यदि किसी न्यायिक टिप्पणी को लेकर समाज में गलतफहमी पैदा होती है, तो स्पष्टीकरण देना संस्थाओं की कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी जवाबदेही और पारदर्शिता का हिस्सा है। CJI सूर्यकांत द्वारा ‘कॉकरोच’ टिप्पणी पर स्पष्टीकरण इसी संदर्भ में देखा जा सकता है।
आज भारत की युवा पीढ़ी पहले से अधिक प्रश्न पूछ रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया ने उसे अपनी बात रखने का मंच दिया है। वह नेताओं के भाषण सुनती ही नहीं, उनकी भाषा का विश्लेषण भी करती है। वह न्यायपालिका, संसद, सरकार, मीडिया और राजनीतिक दल—सभी से सवाल पूछती है।
इसलिए आज की राजनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती विरोध को चुप कराना नहीं, बल्कि विरोध के कारणों को समझना है।
लोकतंत्र में सत्ता के पास शक्ति होती है, लेकिन जनता के पास प्रश्न होते हैं।
सत्ता के पास मंच होता है, जनता के पास आवाज होती है।
सत्ता के पास शब्दों को परिभाषित करने की क्षमता हो सकती है, लेकिन उन शब्दों को स्वीकार या अस्वीकार करने का अधिकार समाज के पास रहता है।
‘कॉकरोच’ से पैदा हुआ व्यंग्यात्मक प्रतिरोध हो या ‘दिमागी नक्सल’ पर उठते सवाल—इन दोनों घटनाओं से एक ही सबक निकलता है:
नागरिक को किसी नाम से पुकारना आसान है, लेकिन उसके सवाल का जवाब देना कठिन।
और लोकतंत्र की असली ताकत इसी कठिन काम में है।
भारत को ऐसे लोकतंत्र की जरूरत है जिसमें सरकार को सरकार की तरह, न्यायपालिका को न्यायपालिका की तरह और नागरिक को नागरिक की तरह सम्मान मिले—जहाँ असहमति को दुश्मनी न समझा जाए और सवाल पूछने वाले को राष्ट्र-विरोधी ठहराने के बजाय उसके सवाल का उत्तर दिया जाए।
क्योंकि अंततः लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली शब्द ‘कॉकरोच’ या ‘दिमागी नक्सल’ नहीं है।
सबसे शक्तिशाली शब्द है—
“क्यों?”
और जब तक नागरिक “क्यों?” पूछता रहेगा, लोकतंत्र जीवित रहेगा।





