👉🏻 ग्रामीण में हाल-बेहाल,शहरी आवासों का बदलता उपयोग
👉🏻कोरबा जिले में हितग्राहीवार व्यापक जांच और भौतिक सत्यापन की जरूरत
कोरबा। कोरबा जिले में प्रधानमंत्री आवासों के निर्माण को लेकर सवाल पर सवाल उठ रहे हैं और मामले-दर-मामले उजागर हो रहे हैं। उजागर होते मामलों के बीच अभी यह निहायत जरूरी हो चला है कि जिले भर में विगत 5 वर्ष के प्रधानमंत्री ग्रामीण व शहरी आवासों की स्वीकृति,निर्माण की स्थिति, भुगतान की स्थिति और पूर्ण हो चुके आवासों के उपयोग की भौतिक जांच तथा सत्यापन की हितग्राहीवार परीक्षण कराया जाना चाहिए।
ग्रामीण क्षेत्रों में जहां वर्षों से आधे -अधूरे कई आवासों के पूरे नहीं होने और फर्जी जिओ टैगिंग के माध्यम से उस आवास की राशि तथा आवास निर्माण में नियोजित मजदूरों की मनरेगा से राशि मजदूरी के तौर पर भुगतान में गड़बड़ी की शिकायतें हैं तो वहीं शहरी क्षेत्र में भी ऐसे मामले हैं जिनमें प्रधानमंत्री आवासों का दूसरा उपयोग हो रहा है। कुछ मामलों में सूत्र बताते हैं कि किराए पर दे दिए गए हैं, तो कुछ मामलों में बेच दिए गए हैं तो कुछ में उपयोग का स्वरूप ही परिवर्तित कर दिया गया है। ऐसे में प्रधानमंत्री आवास योजना के महत्वाकांक्षी उद्देश्य पर सवाल उठना लाजिमी है।
👉🏻 कुछ में जाँच, बहुतों में अपेक्षित
वर्तमान समय में मृतकों के नाम आवास स्वीकृति, अधूरे आवासों का फर्जी जिओ टैगिंग से पूरा भुगतान व मनरेगा से मजदूरी भुगतान का मामला काफी सुर्खियों में है। कोरबा तथा करतला जनपद पंचायत क्षेत्र में ऐसे दर्जनों मामले उजागर हो चुके हैं। कुछ में जांच चल रही है तो बहुतों में जांच अपेक्षित है। इस विषय में जब और जानकारी जुटाने का प्रयास किया गया तो सूत्रों से ज्ञात हुआ कि फर्जी जियो टैगिंग से अधूरे आवासों को पूर्ण बताने का खेल प्रशासनिक अधिकारियों से शाबाशी लेने और सरकार को आंकड़ों में उलझाने के लिए खेला जा रहा है।
👉🏻 साँठगाँठ में बराबर के सहभागी
दरअसल, केंद्र सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना है और सरकार की मंशा है कि प्रत्येक ग्रामीण/शहरी जिसके पास कच्चा मकान है उसे पक्की छत प्रदान की जाए। योजना की समीक्षा समय-समय पर/प्रति सप्ताह/पाक्षिक/मासिक की जाती है। ब्लॉक व जनपद अधिकारियों/ ब्लॉक समन्वयक को अपने ऊपर के अधिकारियों को योजना की पूर्णता, मकान के वर्तमान स्थिति की जानकारी देनी होती है। ऐसे में यदि आवास का निर्माण शासन निर्धारित समय सीमा में पूरा नहीं दिखाया जाता है तो कार्रवाई की संभावना बनी रहती है। ऐसी किसी भी संभावना को दरकिनार करने व कार्रवाई से बचने के लिए आवासों को कागजों में पूर्ण बताने का खेल खेला जा रहा है। मैदानी स्तर पर आवास भले अधूरे हों लेकिन कागजों में इसे पूरा बता कर आंकड़ों में भी अच्छा प्रतिशत हासिल कर लिया जा रहा है व जिम्मेदार अधिकारी किसी भी दंड से बचते आ रहे हैं। आवास मित्र तकनीकी सहायक, रोजगार सहायक, सचिव-सरपंच से लेकर मैदानी स्तर पर निरीक्षण करने की जिनकी जिम्मेदारी होती है, वह सब इसमें बराबर के सहभागी हैं। तकनीकी सहायक को फील्ड में जाकर देखना होता है लेकिन कई सहायक दफ्तर में कुर्सी तोड़ते हुए बिना निगरानी काम निपटा रहे हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्रत्येक विकासखंड में तकनीकी सहायक की नियुक्ति इस उद्देश्य से की गई है कि वे निर्माणाधीन आवासों का नियमित रूप से स्थल निरीक्षण करें, प्रत्येक चरण का सत्यापन करें और वास्तविक स्थिति के आधार पर जियो टैगिंग एवं भुगतान की अनुशंसा करें। यदि तकनीकी सहायक अपने दायित्वों का ईमानदारीपूर्वक निर्वहन करते हुए समय-समय पर फील्ड में जाकर भौतिक सत्यापन करते, तो अधूरे आवासों की फर्जी जियो टैगिंग, अपूर्ण निर्माण पर भुगतान और प्रधानमंत्री आवास योजना में सामने आ रहे कथित फर्जीवाड़े जैसे मामलों पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती थी। ऐसे मामलों ने तकनीकी निगरानी व्यवस्था की कार्यप्रणाली और संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
👉🏻 हितग्राही भी खुश,कमीशन भी पक्का
जानकार सूत्रों के मुताबिक होता यह है कि जिस हितग्राही का आवास अधूरा रहता है और वह पहली अथवा दूसरी प्राप्त करने के बाद भी किसी कारण से अपने आवास को समय सीमा में पूर्ण नहीं कर पाता तो, ऐसे हितग्राही के आवास को पूरा बताने के लिए फर्जी जिओ टैगिंग का सहारा लिया जाता है। उस आवास को फर्जी टैगिंग से पूर्ण बताने के साथ ही बची हुई किश्त की राशि और मनरेगा से मिलने वाली मजदूरी की राशि हितग्राही को मिल जाती है। अब हितग्राही को अधूरे आवास का पूरा पैसा मिल जाता है। उसे कहा जाता है कि मकान जब चाहो तब बना लेना लेकिन इसे पूरा बताकर तुम्हारा पैसा निकलवा देते हैं, तो वह हितग्राही खुशी-खुशी तैयार हो जाता है। इन सब रिस्क के एवज में कुछ कमीशन की राशि मिल जाती है। इस तरह से आवास मित्र, तकनीकी सहायक, रोजगार सहायक, सचिव-सरपंच भी खुश और इधर अधिकारी भी खुश कि उसे बैठक में फटकार नहीं पड़ेगी/ नोटिस का सामना नहीं करना पड़ेगा/किसी दंड का भागीदार नहीं होना पड़ेगा। यह खेल बड़ी सांठगांठ के साथ खेला जा रहा है लेकिन जमीनी हकीकत तो यही है कि पक्की छत सरकार की मंशानुरूप और योजना के अनुसार लक्ष्य प्राप्ति से दूर है।






