👉🏻ग्राम केराकछार में 33 कार्यों पर सवाल, फर्जी मस्टररोल से लेकर भुगतान तक गंभीर आरोप
👉🏻वेंडरों की आड़ में गांव से जनपद और जिला तक बना सिंडिकेट
कोरबा-करतला। ग्रामीणों को लाभ पहुंचाने वाली सरकारी योजनाओं में कागजों पर विकास और जमीन पर हकीकत के बीच कितना अंतर हो सकता है, इसका एक मामला ग्राम पंचायत केराकछार, जनपद पंचायत करतला से सामने आया है। यहां वर्ष 2023-24 में स्वीकृत बताए गए 33 पशु शेडों में करीब 20.13 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता को लेकर जिला पंचायत कोरबा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी से शिकायत की गई है।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि 33 पशुशेडों के लिए प्रत्येक हितग्राही 77 हजार रुपये की राशि निर्धारित थी, लेकिन स्वीकृति से लेकर निर्माण और भुगतान तक की प्रक्रिया में नियमों की अनदेखी की गई। शिकायत के अनुसार इन कार्यों के लिए ग्रामसभा में हितग्राही चयन का कोई प्रस्ताव नहीं हुआ और MIS में सभी 33 कार्यों के सामने “Is Secure = NO” दर्ज है। इसके बावजूद कार्यों को आगे बढ़ाकर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर दी गई।
👉🏻एक-दो दिन के मस्टररोल से भुगतान को सही ठहराने का आरोप

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सामग्री भुगतान को आधार देने के लिए कई हितग्राहियों के नाम पर केवल एक-दो दिन के मस्टररोल तैयार किए गए। चंदन सिंह के नाम एक दिन का 221 रुपये, सखा राम के नाम दो दिन का 442 रुपये और सीता राम के नाम दो दिन का 442 रुपये दर्ज होने का उदाहरण दिया गया है। शिकायतकर्ता के मुताबिक 133 मस्टररोल में 12 में इसी तरह की प्रविष्टियां हैं। इसके साथ ही तकनीकी निरीक्षण और एस्टीमेट तैयार करने की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गएन हैं।
आरोप है कि मौके का समुचित निरीक्षण किए बिना MB और जियो टैग से संबंधित प्रक्रिया पूरी कर दी गई तथा कम लागत वाले पुराने कोठों में मामूली सामग्री लगाकर उन्हें स्वीकृत पशुशेड के रूप में दर्शाया गया।
👉🏻एक ही वेंडर को 20.13 लाख का भुगतान
मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामग्री भुगतान को लेकर है। शिकायत के अनुसार 10 फरवरी 2026 को 33 कार्यों की राशि एक ही वेंडर राजवाड़े ट्रेडर्स को हस्तांतरित की गई। बिल क्रमांक 139 से 198 तक की तारीख 20 दिसंबर 2025 बताई गई है।शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि करीब 20.13 लाख रुपये सीधे वेंडर के खाते में पहुंच गए, जबकि कई स्थानों पर स्वीकृत राशि के अनुरूप सामग्री मौजूद नहीं है।
वेंडर प्रवीण राजवाड़े की फर्म को लेकर भी जांच की मांग की गई है। शिकायत में दुकान, GST बिल, स्टॉक रजिस्टर और E-Way Bill का सत्यापन कराने तथा स्थानीय वेंडर संबंधी नियमों की जांच की मांग की गई है।
👉🏻कागजों में पूरा, जमीन पर अधूरा?
मामले में MIS रिकॉर्ड भी सवालों के घेरे में है। शिकायत के अनुसार कुछ कार्यों की पूर्णता तारीख 15 और 29 अप्रैल 2026 दर्ज है, जबकि भुगतान फरवरी में ही हो चुका था। शिकायतकर्ता का कहना है कि इससे यह सवाल उठता है कि जिस कार्य को बाद की तारीख में पूर्ण दिखाया गया, उसकी राशि पहले ही किस आधार पर जारी कर दी गई।
जिला प्रशासन से शिकायत के बाद अब मौके पर कुछ पशुशेडों का काम शुरू कराया जाना इस मामले को और गंभीर बना रहा है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि PO, TA, DEO और संबंधित वेंडर की भूमिका अलग-अलग स्तर पर रही और पूरी प्रक्रिया सामूहिक रूप से संचालित की गई। हालांकि संबंधित अधिकारियों और वेंडर पर लगाए गए ये आरोप शिकायत का हिस्सा हैं, इनकी वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
👉🏻स्वतंत्र जांच की मांग
शिकायतकर्ता ने मांग की है कि चूंकि आरोप जनपद स्तर के अधिकारियों की भूमिका से जुड़े हैं, इसलिए जांच जनपद से बाहर के स्वतंत्र राजस्व अथवा पंचायत अधिकारियों की समिति से कराई जाए। 33ों कार्यों की फाइलें जब्त कर 100 प्रतिशत भौतिक सत्यापन, वीडियोग्राफी और हितग्राहियों के बयान दर्ज कराने की मांग की गई है। साथ ही वेंडर के GST, स्टॉक, दुकान और E-Way Bill की जांच तथा दोष प्रमाणित होने पर FIR, सरकारी राशि की वसूली, संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई और वेंडर को ब्लैकलिस्ट करने की मांग की गई है।
यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो यह केवल किसी एक पंचायत में अनियमितता का मामला नहीं होगा, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करेगा कि सरकारी योजनाओं में वास्तविक काम कराने के बजाय कागजों पर विकास दिखाकर सरकारी राशि की बंदरबांट तो नहीं की जा रही
👉🏻शिकायत के बाद शुरू हुआ काम, पहले ही निकल चुकी थी पूरी राशि
इस मामले का सबसे अहम पहलू यह है कि शिकायत के बाद जिन पशुशेडों को लेकर सवाल उठे हैं, उनमें अब निर्माण गतिविधियां दिखाई देने लगी हैं। मौके की तस्वीरों में ट्यूब डालकर उसके ऊपर दीवार खड़ी करने का काम शुरू किया जाना नजर आ रहा है।
यह स्थिति इसलिए सवाल खड़े करती है क्योंकि शिकायत में संबंधित कार्यों की राशि फरवरी 2026 में ही निकाले जाने का उल्लेख है, जबकि कुछ कार्यों को सरकारी रिकॉर्ड में अप्रैल में पूर्ण बताया गया है।
👉🏻 निर्माण अब, तो पहले राशि किस आधार पर निकाला?
ऐसे में सवाल यह नहीं है कि अब काम क्यों कराया जा रहा है, बल्कि सवाल यह है कि यदि निर्माण अब हो रहा है तो पहले जारी की गई पूरी राशि किस कार्य के आधार पर निकाली गई थी?
यदि शिकायत नहीं होती और मौके पर निर्माण शुरू नहीं कराया जाता, तो क्या अधूरे कार्य सरकारी रिकॉर्ड में ही पूर्ण माने जाते रहते? यही वह सवाल है जिसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
सरकारी योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीणों को वास्तविक लाभ देना है। ऐसे में शिकायत के बाद काम शुरू होना इस पूरे प्रकरण की जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य बन सकता है। जानकारों की मांग है कि मौके की वर्तमान स्थिति, पूर्व के जियो टैग, MB, भुगतान रिकॉर्ड और सामग्री की उपलब्धता का मिलान कराया जाए। आरोप प्रमाणित होने पर केवल राशि की वसूली नहीं, बल्कि जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई भी होनी चाहिए।





