👉🏻 एमआईसी का निर्णय लागू कराने में नाकाम निगम,सत्ता-संगठन से जुड़े लोगों पर भी उठ रहे सवाल
👉🏻 सौंदर्यीकरण पर करोड़ों खर्च, फिर भी दीवारों, पुलों, खंभों और पेड़ों पर कब्जा
कोरबा। नगर पालिक निगम कोरबा द्वारा सार्वजनिक स्थलों को अवैध पोस्टर, बैनर और होर्डिंग्स से मुक्त रखने के लिए शहर सरकार का लिया गया निर्णय आज भी जमीन पर प्रभावी नजर नहीं आ रहा है। नगर निगम की मेयर-इन-काउंसिल (एमआईसी) ने वर्ष 2025 में स्पष्ट नियम बनाए थे कि सार्वजनिक चौक-चौराहों, शासकीय भूमि और अन्य सार्वजनिक संपत्तियों पर बिना अनुमति लगाए गए होर्डिंग्स और बैनरों पर कार्रवाई की जाएगी, लेकिन शहर की तस्वीर कुछ और ही कहानी बयां कर रही है।
देखने में आता है कि नगर पालिक निगम कोरबा क्षेत्रांतर्गत सार्वजनिक चौक-चौराहों एवं शासकीय भूमि पर जन्म दिवस, धार्मिक, सामाजिक आयोजनों हेतु नगर पालिक निगम की सहमति प्राप्त किये बिना ही विज्ञापन होर्डिंग्स लगाकर छोड़ दिया जाता है। इससे नगर पालिक निगम को अतिरिक्त अमला एवं संसाधनों को लगाकर विज्ञापन होर्डिंग्स निकलवाना पड़ता है जिससे निगम को अतिरिक्त वित्तीय भार वहन करना पड़ता है।
👉🏻 एमआईसी में लाया गया प्रस्ताव

इस तरह उक्त विज्ञापन एवं होर्डिंग्स को 24 घण्टे के भीतर नहीं निकाले जाने पर संबंधितों के विरूद्ध प्रति दिवस राशि रूपये 500/- एवं वृहद होर्डिंग्स पर राशि रूपये 1,000/- तथा विद्युत पोल पर राशि रूपये 200/- प्रति होर्डिंग्स / बोर्ड की दर से अर्थदण्ड अधिरोपित किये जाने तथा अवैध रूप से स्थापित विज्ञापन होर्डिंग्स को बिना किसी अन्य सूचना के जप्ती किये जाने हेतु प्रकरण मेयर इन काउंसिल के समक्ष विचारार्थ एवं निर्णय हेतु प्रस्तुत किया गया था।
👉🏻 सर्वसम्मति से पारित,सख्ती नहीं दिख रही
नगर पालिक निगम की एमआईसी में लाए गए इस प्रस्ताव को चर्चा उपरांत सर्वसम्मति से पारित किया गया। 29 सितंबर 2025 को यह प्रस्ताव पारित होने के बाद भी आज पर्यंत कुछ खास अमल होता नजर नहीं आया है।
👉🏻हकीकत में नहीं दिख रही सख्ती
निर्णय के महीनों बाद भी शहर के प्रमुख चौक-चौराहों, ओवरब्रिज, सुरक्षा रेलिंग, बिजली, टेलीफोन और रेल के खंभों के साथ-साथ पेड़ों तक पर पोस्टर और बैनर लगे दिखाई देते हैं। कई स्थानों पर इन्हें बांस-बल्ली के सहारे खड़ा कर दिया जाता है, जिससे शहर की सुंदरता प्रभावित हो रही है। 24 घण्टे ही नहीं, हप्ते और इससे अधिक समय तक कई बैनर-पोस्टर लटके नजर आते हैं,लगवाने के बाद खुद से उतरवाए नहीं जाते। अवैध पोस्टर लगाने वाले पर भी कार्रवाई अपेक्षित है।
👉🏻सौंदर्यीकरण पर करोड़ों, विरूपण पर चुप्पी
एक ओर नगर निगम शहर को इंदौर मॉडल की तर्ज पर विकसित करने और सौंदर्यीकरण पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं स्थानों पर अवैध पोस्टर-बैनर और बांस-बल्ली पूरे प्रयासों पर पानी फेरते नजर आते हैं। इससे सवाल उठ रहा है कि जब नियम बने हुए हैं तो उनका पालन आखिर क्यों नहीं कराया जा रहा।
👉🏻सत्ता-संगठन से जुड़े लोगों पर भी उठ रहे सवाल

शहर में चर्चा इस बात की भी है कि कई पोस्टर और बैनर सत्ता एवं संगठन से जुड़े लोगों द्वारा भी निर्धारित नियमों को ताक पर रखकर लगाए जाते हैं। यदि ऐसा है तो नियमों का पालन सुनिश्चित कराने में सभी पक्षों की समान जिम्मेदारी बनती है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या नियम सबके लिए समान रूप से लागू हो रहे हैं?
👉🏻आर्थिक नुकसान भी
अवैध होर्डिंग्स हटाने के लिए निगम को अतिरिक्त अमला और संसाधन लगाने पड़ते हैं, जिससे वित्तीय भार बढ़ता है। दूसरी ओर, निगम से करोड़ों रुपये का विज्ञापन ठेका लेने वाले एजेंसी संचालक के वैध व्यवसाय पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ने की चर्चा है, क्योंकि अवैध होर्डिंग्स के बीच अधिकृत विज्ञापन व्यवस्था प्रभावित होती है। हालांकि, कुछ माह पहले निगम आयुक्त के निर्देश पर सीएसईबी चौक व टीपी नगर चौक के निकट होर्डिंग्स की बांस-बल्लियों को जेसीबी से कुचलवा कर नष्ट कराया गया था।
👉🏻 सबसे बड़ा सवाल
एमआईसी के निर्णय को लागू हुए करीब नौ महीने बीत चुके हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि अब तक कितने लोगों पर जुर्माना लगाया गया, कितने अवैध होर्डिंग्स जब्त किए गए और नियम तोड़ने वालों पर कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई?






