👉🏻शहर में गड्ढा दिखते ही हाय-तौबा, गांव की सड़क धंस जाए तो किसे फर्क पड़ता है?
👉🏻बदहाल सड़क ने खोली विकास के दावों की पोल
👉🏻DMF से लेकर ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार की विकासपरक सोच पर सवाल
कोरबा। शहर में सड़क पर दो-चार गड्ढे दिख जाएं तो शोर शुरू हो जाता है। जनप्रतिनिधि सक्रिय हो जाते हैं, अफसरों की बैठकें होती हैं, निरीक्षण होता है और सड़क के लिए लाखों-करोड़ों की योजनाएं तैयार हो जाती हैं। लेकिन गांव की सड़क अगर बरसात में धंस जाए, कीचड़ और कटाव में तब्दील हो जाए और उस रास्ते से स्कूली बच्चे रोज गुजरने को मजबूर हों, तो उसकी आवाज आखिर पहुंचे कहां?
ग्राम पंचायत मेरई की यह तस्वीर इसी सवाल का जवाब मांग रही है। ठाकुरदिया पारा, गौटिया पारा, छिनपानी और माझापारा की आवाजाही इसी रास्ते से होती है। ग्रामीणों के मुताबिक सड़क की यह हालत कोई नई नहीं है। वर्षों से कच्ची सड़क की समस्या बनी हुई है। बरसात आते ही हालात और बदतर हो जाते हैं।
तस्वीर में सड़क कम और बारिश के पानी से काटकर बनाई गई गहरी नालियां और कीचड़ ज्यादा नजर आ रहा है। पैदल चलना मुश्किल है तो बाइक और साइकिल से निकलना किसी जोखिम से कम नहीं। इसी रास्ते से बच्चों को स्कूल भी जाना पड़ता है।
सरपंच से ग्राम सभा तक गुहार, फिर भी ‘मुरुम’ सिर्फ आश्वासन में
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क पर मुरुम-मिट्टी डालकर रास्ता ठीक कराने के लिए सरपंच से कई बार कहा जा चुका है। ग्राम सभा में भी मामला उठाया गया, लेकिन हर बार आश्वासन के बाद बात आगे नहीं बढ़ी। ग्रामीण अब सवाल कर रहे हैं कि आखिर उनकी समस्या को समस्या मानने के लिए और कितने साल इंतजार करना होगा?
क्या विकास की नजर शहर की सीमा पर आकर रुक जाती है?
मेरई की यह सड़क सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि उस विकास मॉडल पर सवाल है जिसमें शहर की सड़क का गड्ढा खबर बन जाता है, लेकिन दूरस्थ गांव की पूरी सड़क ही गड्ढों और कटाव में बदल जाए तो उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं मिलता।
कोरबा में विकास के लिए DMF जैसे बड़े फंड उपलब्ध हैं। सरकार गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने की बात करती है। ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार की विकासपरक सोच के दावे भी किए जाते हैं। मगर सवाल यह है कि क्या इस विकास की प्राथमिकता में वे आंतरिक और पहुंचविहीन गांव भी हैं, जहां आज भी सड़क, बिजली, पानी और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए लोग संघर्ष कर रहे हैं?
चुनाव में गांव याद आता है, बरसात में क्यों नहीं?
विडंबना यह भी है कि नेताओं को जनता की याद चुनाव के समय खूब आती है। गांव-गांव संपर्क होता है, रास्ते नापे जाते हैं, समस्याएं सुनी जाती हैं और विकास के वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनावी मौसम अक्सर सूखा होता है। काश, चुनाव बरसात में होते! तब शायद शहरों के वातानुकूलित कमरों और पक्की सड़कों से निकलकर जनप्रतिनिधियों को इन कीचड़ भरे रास्तों से गुजरना पड़ता और पता चलता कि गांव में सड़क का मतलब सिर्फ सीसी रोड का उद्घाटन नहीं, बल्कि बरसात में उस पर सुरक्षित चल पाना भी है।
योजनाएं बनती रहीं, फिर भी गांव वहीं खड़ा है
सरकारी योजनाओं में सड़क, नाली, आवास, बिजली और पानी के नाम पर लगातार काम होने का दावा किया जाता है। लेकिन जमीन पर कहीं काम अधूरा है, कहीं गुणवत्ता सवालों में है तो कहीं जरूरतमंद इलाकों तक योजना पहुंचती ही नहीं। योजनाओं के क्रियान्वयन में भ्रष्टाचार और बंदरबांट के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
ऐसे में मेरई की सड़क प्रशासन के लिए महज एक कच्चा रास्ता नहीं, बल्कि विकास के दावों का आईना है। शहर में गड्ढे पर शोर मचाने वाले बहुत हैं। सवाल यह है कि गांव की पूरी सड़क जब गड्ढे में बदल जाए तो उसकी आवाज कौन उठाएगा?






