(व्यंग्य) चुनाव भी बड़ी कमाल की चीज है। आते हैं तो विकास गली-मोहल्ले तक पहुंच जाता है, नेता भी जनता के इतने करीब आ जाते हैं कि लगता है बस अब समस्या गई कि गई। सड़क बनेगी, नाली सुधरेगी, पानी निकलेगा, बिजली चमकेगी और मोहल्ले की तस्वीर बदल जाएगी।
फिर, चुनाव चला जाता है और उसके साथ विकास भी शायद कहीं छुट्टी पर चला जाता है।
अब बरसात को ही देखिए। सड़क में गड्ढे हैं या गड्ढों में सड़क, इसका फैसला करना मुश्किल है। नाली का पानी सड़क पर है और सड़क का पानी लोगों के घरों तक पहुंचने की कोशिश में है। कहीं कीचड़ इतना कि पैदल चलने वाला भी सोचता है कि जूता पहनकर निकले या नाव लेकर।
ऐसे में मोहल्लों में एक बड़ा दिलचस्प सुझाव घूम रहा है…
काश..! चुनाव गर्मी या ठंड में नहीं, बरसात में होते।
👀 अब, आप जरा कल्पना कीजिए…
नेताजी वोट मांगने निकले हैं। गाड़ी मोहल्ले के बाहर ही खड़ी है, क्योंकि आगे सड़क नहीं, जलभराव का स्वागत द्वार है। नेताजी पैंट ऊपर चढ़ाकर आगे बढ़ रहे हैं। पीछे समर्थक छाता लेकर चल रहे हैं और सामने जनता हाथ में बाल्टी लेकर पानी निकाल रही है।
😁नेताजी मुस्कुराकर पूछते हैं-
“भाईयों-बहनों, कोई समस्या तो नहीं है?”
🙃 जनता शायद कहे-
“नहीं साहब, बिल्कुल नहीं। बस घर में पानी है, सड़क में पानी है, नाली में पानी नहीं है और बिजली कब आएगी इसका पता नहीं है। बाकी सब बढ़िया है!”
🥳काश..! ऐसा चुनावी मौसम सच में आता, तब पांच साल के विकास का हिसाब भी बड़ा आसान हो जाता-
❓जहां सड़क में गड्ढा मिलता, वहीं सवाल….
❓जहां नाली बंद मिलती, वहीं सवाल….
❓जहां पानी घर में घुसा मिलता, वहीं सवाल….
❓जहां कीचड़ में बच्चे स्कूल जाते मिलते, वहीं सवाल….और अगर कोई चम्मच कह देता कि “इलाके में तो खूब विकास हुआ है”
तो जनता शायद सामने खड़े होकर कहती-
“हां साहब, हुआ है… तभी तो पानी भी सड़क छोड़कर घर तक पहुंच गया है।”
असल में बरसात बड़ी ईमानदार होती है। यह किसी के विकास के दावे को नहीं मानती। सड़क बनी है तो उसकी पोल खोल देती है। नाली बनी है तो उसकी सफाई दिखा देती है। पुलिया मजबूत है तो पानी बता देता है। जल निकासी की व्यवस्था शानदार है तो बारिश उसका प्रमाण दे देती है।
🤔 गर्मी में सड़क देखकर लगता है- वाह, काम हुआ है।
बरसात में वही सड़क देखकर पता चलता है- काम कितना हुआ है।
चुनाव के समय नेताओं के भाषण में विकास दौड़ता है। बरसात में जनता के सामने सवाल दौड़ता है।
इसलिए एक बार चुनाव आयोग से भी आग्रह बनता है-
🙏🏻साहब, कभी चुनाव का मौसम बदलकर देखिए।
🫡 गर्मी में रैली करने के बजाय बरसात में कीचड़ के बीच सभा कराइए। मंच थोड़ा ऊंचा रखिए, क्योंकि नीचे पानी हो सकता है। माइक के साथ छाता भी दीजिए। और भाषण शुरू करने से पहले नेताजी से बस इतना पूछ लीजिए…
“आपके क्षेत्र में जल निकासी की व्यवस्था कैसी है?”
अगर जवाब भाषण से लंबा हो जाए तो समझिए समस्या गंभीर है।और अगर नेताजी कहें-
“सब बढ़िया है।”
तो उन्हें बस पांच मिनट के लिए जनता के साथ उस सड़क पर पैदल भेज दीजिए, शायद लौटकर उनका भाषण बदल जाए।
क्योंकि चुनाव में जनता को यह बताना आसान है कि विकास हो रहा है, लेकिन बरसात में जनता के सामने खड़े होकर यह साबित करना थोड़ा मुश्किल है कि—
“सड़क भी है, नाली भी है और जल निकासी भी शानदार है।”
😔 काश..! चुनावी मौसम भी बारिश की तरह होता।
हर पांच साल में एक बार नहीं, कम से कम हर बरसात में विकास का हिसाब लिया जाता।
तब शायद गड्ढे भी कम होते, नालियां भी साफ रहतीं और नेताओं को भी पता चलता कि-
जनता तक पहुंचने के लिए सिर्फ वोट मांगना काफी नहीं, कभी-कभी कीचड़ में उतरना भी पड़ता है।






