कोरबा। प्रयाग नारायण शुक्ला भारतीय पुलिस सेवा के एक विशिष्ट अधिकारी थे। अपने सेवाकाल में उन्होंने कर्तव्य और कर्मठता को सदैव सर्वोपरि रखा। उन्हें ‘रिटायर’ शब्द से ही जैसे एक विशेष विरक्ति थी। वे स्वयं को कभी ‘रिटायर पुलिसवाला’ कहलाना पसंद नहीं करते थे। उनका मानना था कि मनुष्य जब तक सक्रिय है, तब तक वह किसी न किसी रूप में समाज और अपने परिवार के लिए उपयोगी रह सकता है।
इसी सोच के कारण 60 वर्ष की आयु में भारतीय पुलिस सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने अपने जीवन को विराम नहीं दिया। उन्होंने नियमित छात्र के रूप में एल.एल.बी. में प्रवेश लिया और कानून की पढ़ाई शुरू की। उनका उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं था, बल्कि अपनी पहचान को एक नई दिशा देना था। वे कहा करते थे कि “वकील कभी रिटायर नहीं होता।” इस प्रकार उन्होंने सेवानिवृत्ति के बाद स्वयं को एक नए पेशे और नई पहचान से जोड़ा।
अपने पिता की इसी जीवन-दृष्टि को उनके छोटे पुत्र सतीश शुक्ला ने भी आगे बढ़ाया।
सतीश शुक्ला ने भी 60 वर्ष की आयु पार करने के बाद अपने जीवन को विश्राम देने के बजाय ज्ञान की एक नई यात्रा प्रारंभ की। उन्होंने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU), दिल्ली से ज्योतिष विषय में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए।
इसके बाद उनकी अध्ययन-यात्रा और आगे बढ़ी। उन्होंने महर्षि कॉलेज ऑफ वैदिक एस्ट्रोलॉजी, उदयपुर, राजस्थान से ज्योतिष के क्षेत्र में शोधकार्य प्रारंभ किया। उनका शोध विषय था—
“ज्योतिषीय आधारों एवं सिद्धांतों के परिप्रेक्ष्य में शनि ग्रह की साढ़ेसाती एवं अढ़ैया का मानव जीवन पर प्रभाव का विश्लेषणात्मक अध्ययन।”
यह शोध कार्य उन्होंने अपनी शोध-निर्देशिका डॉ. आरती कपूर के मार्गदर्शन में पूर्ण किया।
अंततः 27 सितंबर 2026 का दिन उनके जीवन में एक विशेष उपलब्धि लेकर आया। उदयपुर में आयोजित दीक्षांत/उपाधि समारोह में महर्षि कॉलेज ऑफ वैदिक एस्ट्रोलॉजी द्वारा सतीश शुक्ला को ज्योतिष विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्रदान की गई।
इस प्रकार पिता और पुत्र की जीवन-यात्रा में एक अद्भुत समानता दिखाई देती है— पिता ने 60 वर्ष के बाद कानून को चुना और पुत्र ने ज्योतिष को।
दोनों ने यह सिद्ध किया कि उम्र जीवन की यात्रा का अंत नहीं, बल्कि अनुभव के आधार पर एक नई यात्रा का आरंभ भी हो सकती है।
प्रयाग नारायण शुक्ला के लिए “रिटायरमेंट” एक शब्द था, जीवन की समाप्ति नहीं।
सतीश शुक्ला ने उसी विचार को अपने ढंग से आगे बढ़ाते हुए यह संदेश दिया कि—
“ज्ञान अर्जित करने की कोई आयु नहीं होती और जीवन में नई पहचान बनाने के लिए कभी देर नहीं होती।”
यही पिता से पुत्र तक चली आ रही उस जीवंत परंपरा की सबसे सुंदर पहचान है— सेवानिवृत्ति नहीं, निरंतर कर्म और निरंतर ज्ञान।
सतीश शुक्ला कोरबा के रुमगरा, नंदबाग मे निवास करते हैं




