🤔 कोरबा के एक गौशाला संचालक का सवाल—कुत्ते की मौत पर पशु क्रूरता का कानून, लेकिन सड़क पर गाय मर जाए तो क्या व्यवस्था?
👉🏻 गौवंश को ‘कृषि पशु’ से अलग कर ‘राज्य संरक्षित पशु’ का दर्जा दें
कोरबा। छत्तीसगढ़ में गौवंश संरक्षण को लेकर कानून होने के बावजूद उसके प्रभावी क्रियान्वयन और गौवंश की मौत के हर मामले में स्पष्ट जवाबदेही तय करने की मांग उठने लगी है। पशुओं को लावारिस छोड़ने वालों पर आज तक जिम्मेदारी/कार्रवाई तय नहीं हो सकी है,बैठकों और कागजों में बारंबार निर्देश जरूर हुए हैं।
पहले उरगा थाना क्षेत्र के कुदुरमाल मार्ग में पेट्रोल पंप के पास और हाल ही में कोरबा-दर्री मार्ग के नए पुल पर 17 मवेशियों की मौत/घायल होने की घटना से विचलित एक गौशाला के संचालक ने अपनी पीड़ा और मन की बात सत्यसंवाद से साझा की। इनका सीधा सवाल सरकार से है कि “कुत्ते जैसे पशु के साथ क्रूरता पर कार्रवाई का प्रावधान है, लेकिन सड़क दुर्घटना में गाय की मौत हो जाए, किसी वाहन से गौवंश कुचलकर मर जाए या करंट अथवा लावारिस हालत में उसकी मौत हो जाए तो उसके लिए स्पष्ट प्रक्रिया क्या है?”
जानकारों के मुताबिक, ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ में गौवंश की हत्या पर कोई कानून ही नहीं है। राज्य में छत्तीसगढ़ कृषि पशु परिरक्षण अधिनियम, 2004 लागू है। इसमें कृषि पशुओं के वध, प्रतिबंधित मांस के कब्जे और वध के उद्देश्य से परिवहन पर कार्रवाई का प्रावधान है। अवैध गौवंश परिवहन में प्रयुक्त वाहन को राजसात करने की कार्रवाई भी प्रशासन द्वारा की जा चुकी है। लेकिन गौशाला संचालकों का सवाल कानून के उस हिस्से से आगे का है, जिसमें दुर्घटना, लापरवाही, जानबूझकर वाहन से कुचलना, सड़क पर घायल पड़े पशु की चिकित्सा, मृत पशु का पोस्टमार्टम और मालिक अथवा जिम्मेदार व्यक्ति की पहचान जैसी परिस्थितियां आती हैं।
👉🏻मवेशियों की टैगिंग जरूरी,अलग श्रेणी बनाने के संभावित लाभ
- हर गौवंश की अलग कानूनी पहचान
गाय-बैल को यूनिक टैग नंबर से जोड़कर मालिक, स्थान, नस्ल, उम्र, टीकाकरण और स्वास्थ्य का रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। - चोरी और अवैध परिवहन पर नियंत्रण
टैग से पशु की पहचान होने पर यह पता लगाना आसान होगा कि वह किसके नाम दर्ज था और किस स्थान से निकला था। - दुर्घटना में जवाबदेही
यदि टैगयुक्त गौवंश सड़क पर मृत मिलता है तो उसके मालिक की पहचान तत्काल हो सकती है। वाहन की टक्कर की स्थिति में पुलिस और पशुपालन विभाग के लिए जांच आसान होगी। - संदिग्ध मौत की जांच
संदिग्ध मृत्यु में पशु चिकित्सक की जांच और पोस्टमार्टम को अनिवार्य प्रक्रिया बनाया जा सकता है। इससे हत्या, दुर्घटना और बीमारी से हुई मौत में अंतर स्पष्ट करने में मदद मिलेगी। - गौशालाओं की वास्तविक संख्या सामने आएगी
कितने पशु गौशाला में हैं, कितने आए, कितने मरे और कितने अन्यत्र भेजे गए,इसका डिजिटल रिकॉर्ड बनाया जा सकेगा। - सरकारी सहायता में पारदर्शिता
यदि गौशालाओं को प्रति पशु अनुदान मिलता है तो टैगिंग से वास्तविक पशु संख्या की पुष्टि की जा सकती है। फर्जी संख्या दिखाकर अनुदान लेने की संभावना घटेगी। हालांकि,कोरबा में कुछ सेवाभावी लोग आपसी सहयोग से ही अच्छी गौशाला चला रहे हैं। - पशुपालक की जिम्मेदारी भी तय होगी
टैगिंग केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं बल्कि मालिक की जिम्मेदारी भी तय करेगी। पशु को लावारिस छोड़ने, चोरी होने या अवैध रूप से बेचने की स्थिति में रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा।
👉🏻‘कृषि पशु’ की श्रेणी से बाहर करने की मांग
छत्तीसगढ़ के मौजूदा कानून में संरक्षित पशुओं को ‘कृषि पशु’ की कानूनी श्रेणी में रखा गया है। यही श्रेणी वध और वध के उद्देश्य से परिवहन जैसे मामलों में संरक्षण का आधार भी बनती है। गौशाला संचालकों की मांग है कि गौवंश को केवल कृषि उपयोगिता के आधार पर परिभाषित करने के बजाय अलग से संरक्षित श्रेणी दी जानी चाहिए। मौजूदा कृषि पशु परिरक्षण कानून में जिन प्रावधानों के माध्यम से संरक्षण मिलता है, उनमें संशोधन करना पड़ेगा।
सुझाव तो यह भी है कि गौवंश को कृषि पशु की मौजूदा श्रेणी से हटाने की बजाय उसके ऊपर एक स्वतंत्र ‘संरक्षित गौवंश अधिनियम’ या मौजूदा कानून में अलग अध्याय जोड़ा जा सकता है। इससे कृषि उपयोगिता से इतर गौवंश की जीवन-सुरक्षा, पहचान, कल्याण, दुर्घटना, चिकित्सा, परिवहन और मृत्यु की जांच को अलग कानूनी संरक्षण दिया जा सकेगा।
👉🏻‘राज्यमाता’ का दर्जा भी केवल सम्मान न रहे
महाराष्ट्र सरकार ने 2024 में देशी गाय को ‘राज्यमाता-गोमाता’ का दर्जा दिया। वहां इस निर्णय के साथ देशी गायों के संरक्षण और गौशालाओं को आर्थिक सहायता की नीति भी जोड़ी गई। स्पष्ट है कि किसी विशेष दर्जे का वास्तविक लाभ तभी है जब उसके साथ बजट, प्रशासनिक व्यवस्था और संरक्षण की ठोस नीति जुड़े।
छत्तीसगढ़ में भी यदि गाय को ‘राज्यमाता’ का दर्जा देने की दिशा में कदम उठाया जाता है तो उसके साथ टैगिंग, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, गौशाला अनुदान, दुर्घटना सहायता और मृत्यु की जांच जैसी व्यवस्थाएं जोड़ना अधिक प्रभावी होगा।
👉🏻कानून कितना है यह नहीं, कानून कितना प्रभावी है..यह जरूरी
छत्तीसगढ़ में गौवंश वध और अवैध परिवहन के खिलाफ कानून मौजूद है और प्रशासन द्वारा उसके तहत कार्रवाई भी हुई है किन्तु बढ़ते मामलों में अब जरूरत उस व्यवस्था को विस्तार देने की है। गौवंश संरक्षण के लिए केवल भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक पशु की पहचान और जिम्मेदारी तय हो। यही ‘राज्यमाता’ अथवा ‘राज्य संरक्षित गौवंश’ की अवधारणा को वास्तविक संरक्षण में बदल सकता है।


















