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हाल-ए-कोरबा: कब बबा मरही,त कब बरा चुरही अऊ खाबो….

Admin
Last updated: 04/09/2025 10:39 AM
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8 Min Read
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0 सन्दर्भ-सड़कों के गड्ढों से जान- माल का बढ़ता नुकसान,उपेक्षा पर लोग हैरान

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    कोरबा (सत्या पाल)। छत्तीसगढ़ी में एक प्रसिद्ध कहावत है- कब बबा मरही,त कब बरा चुरही अऊ खाबो….!
    यह कहावत इस बात का बोध कराती है कि किसी चीज की इच्छा हो लेकिन उसके लिए इंतजार करना पड़े अथवा कोई कार्य होना है किंतु उस कार्य के होने की अनिश्चितता बनी हुई है….। अलग-अलग अवसर के लिए अलग-अलग मायने प्रस्तुत करता यह कहावत कोरबा जिले में बढ़ती सड़क समस्याओं के मामले में काफी सटीक बैठता है कि कब टेंडर होगा,कब निजात मिलेगी।

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      कोरबा शहर ही नहीं बल्कि पूरे जिले की जनता और पड़ोसी जिलों में भी जनता इन दिनों सड़क की बदहाल समस्याओं से बेहद जूझ रही है। यह कोई पहली बार नहीं हुआ बल्कि महीनों और वर्षों से ऐसा होता आ रहा है और सड़कों पर गड्ढे सुरसा के मुंह की तरह फैलते ही जा रहे हैं। कुछ जगह पर तो हालात ऐसे हैं मानो लगता है कि इसमें गए तो सीधा रसातल में समा जाएंगे। गड्ढों को देख मन में भय ऐसा भी उत्पन्न होता है कि भगवान ना करें कोई अचानक इन गड्ढों की वजह से हादसे का शिकार होकर भगवान को प्यारा ना हो जाए।इन सभी सूरतों में रोज सड़कों पर गड्ढों से बचते-बचाते मेड की तरह छूटे हुए रास्तों अथवा सड़कों के किनारे से बच-बचाकर निकलते लोग हर बार उन जिम्मेदारों को जरूर कोसते हैं जिनकी वजह से यह हालात बने हुए हैं।
      🫡 जैसा दाम-वैसा काम

      बरसात का मौसम सड़क व अन्य निर्माण संबंधी कार्यों के लिए सरकारी तौर पर बाधित रहता है। वर्षा ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं के लिए टेंडर जारी होते हैं, काम भी चल पड़ता है लेकिन यह निर्भर करता है ठेकेदार द्वारा दिए जाने वाले चढ़ावा और संबंधित जनप्रतिनिधि से लेकर निरीक्षणकर्ता अधिकारियों, इंजीनियरों की मेहरबानी पर कि उस सड़क/निर्माण की दशा-दिशा और गति कैसी होगी। फिर, गुणवत्ता तो जैसा दाम वैसा काम की तर्ज पर निर्भर करने लगा है।
      🤦🏼‍♂️सरकार बदली, हालात नहीं
      पिछली सरकार के कार्यकाल में भी हिचकोले खाती जनता को बड़ी उम्मीद थी कि सत्ता परिवर्तन होने के बाद कुछ राहत मिलेगी लेकिन राहत तो दूर मुसीबत दिनों दिन बढ़ती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि अब गड्ढों में सड़क ढूंढनी पड़ रही है। इन गड्ढों में समाकर जहां वाहनों के पुर्जे-पुर्जे हिल रहे हैं तो इंसानी जिस्म अपना अंजर -पंजर ढीला कराने पर मजबूर है। मानसिक तनाव के साथ-साथ शरीर को झटका देकर इन रास्तों से गुजरना आम जनता की मजबूरी बन चुकी है। घर से निकलने के बाद सही सलामत घर तक वापस लौट आने की कामना करते हुए वह अपना सफर पूरा करता है।
      🎁 डीएमएफ मद की संजीवनी
      मुक्त हस्त से कई योजनाओं में सरकारी धन लुटा रही सरकार के पास यूं तो पैसे की कोई कमी नहीं है, विभागीय भारी-भरकम मद के अलावा ऊपर से डीएमएफ का पैसा संजीवनी बूटी की तरह काम आ रहा है लेकिन जनप्रतिनिधियों में इच्छा शक्ति की पर्याप्त कमी के कारण और अनेक जनप्रतिनिधियों में सारा कुछ खुद ही समेट कर काम करने की बढ़ती इच्छा ने सिस्टम का मटियामेट कर रखा है। वही नेता वही ठेकेदार होने के कारण सत्ता पक्ष का जहां उसके गलत और गुणवत्ताहीन कार्यों को संरक्षण मिलता है वहीं प्रशासन तंत्र द्वारा ना तो उनका भुगतान रोका जाता है और ना खराब कार्यों पर कोई कार्रवाई होती है। यह किसी एक दल के लिए नहीं बल्कि प्रमुख दलों के लिए लागू है और दोनों ही दलों में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर भ्रष्टाचार के पैमाने को और गहरा किया जा रहा है।
      👉🏻टैक्स तो भरपूर, सुविधा चूर-चूर

      जनता तरह-तरह के टैक्स का भुगतान विभिन्न अवसरों पर करती है किंतु उसके एवज में उसे जिस तरह से सुचारू और सुगम सुविधा प्राप्त होनी चाहिए, वह मुहैया नहीं हो पा रही है। शहर और जिले का आंखों देखा हाल दोनों ही प्रमुख व अन्य दलों से छुपा नहीं है, बल्कि दलों के लोग भी इससे दो-चार होते ही हैं। उनकी नजरों के सामने ही गड्ढों का दायरा और संख्या बढ़ते चले गए/ बढ़ते ही जा रहे हैं और न जाने कब तक बढ़ेंगे…? कभी कभार निर्देश पर कुछ ठेकेदार ऐसी दरियादिली दिखाकर गड्ढों पर कभी डामर तो कभी गिट्टी तो कभी सीमेंट का लेप ऐसा लगाते हैं कि जख्म भरने की बजाय और बढ़ जाता है। कोरबा शहर के भीतर भी यही हालत है आंतरिक सड़कों और बाहर की स्थिति और भी बदतर है।
      😱 रेलवे क्रासिंग बने नासूर,उसे भी फिक्र नहीं

      जनता को शहर के भीतर ही पांच-पांच रेलवे क्रॉसिंग से गुजरना पड़ता है। कोई भी क्रॉसिंग ऐसा नहीं है जहां से गुजरते वक्त खास कर दोपहिया गाड़ी का पहिया ना फंसता हो। स्थिति तब और खराब हो जाती है जब ट्रेन गुजरने के बाद क्रॉसिंग से निकलने की रेलमपेल मची होती है। उस पर जब तक गाड़ी का गियर एक नंबर पर ना हो तब तक क्रॉसिंग के गड्ढों से पार हो जाना मुश्किल हो जाता है। आपस में टकराते ही रहते हैं, कहासुनी होती ही रहती है। रेलवे को भी कोई फिक्र नहीं/मतलब नहीं। ब्रेकर भी जान आफत में डाले हुए हैं क्योंकि ब्रेकर पार करने के ठीक पहले और ठीक बाद में गड्ढा जरूर होता है। अब गड्ढे से बचें कि ब्रेकर से !
      📅 समस्या बारहमासी

      ऐसा नहीं है कि इस बरसात में ही समस्या हुई हो, समस्या बरसात के पहले ठंड में भी थी, गर्मी में भी थी लेकिन उपाय नहीं किए गए। बड़ा ही चिंताजनक है कि कुछ ऐसी भी सड़कें हैं जिसमें ठेकेदार अपनी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं। निर्माण के बाद रखरखाव का एक निश्चित समय होता है और उससे पहले ही टूट-फूट होने लग जाए तो उस ठेकेदार की पूरी जिम्मेदारी बनती है लेकिन मजाल है कि एक-दो को छोड़ किसी ठेकेदार पर ठीकरा फूटा हो, कार्रवाई हुई हो क्योंकि सब तो अपने हैं फिर जनता के लिए अच्छी सड़क अभी दूर के सपने हैं।
      😔 यहां की जनता बेहद सहनशील

      गैरजिम्मेदार लोग तो इस बात का शुक्र मनाएं कि यहां की जनता अब बेहद सहनशील हो गई है। अपने नेताओं,चुने हुए जनप्रतिनिधियों की तरफ कातर निगाहों से उम्मीद भरी नजर फेरती है कि वो सब ठीक करा देंगे। भाग दौड़ भरी जिंदगी में अब समस्याओं को दूर कराने के लिए आवाज उठाने का चलन विलुप्त हो चला है इसलिए मनमानियों को बल मिला है। अधिकारी अपने शीर्ष के निर्देशों से बंधे हैं,शीर्ष भी सरकार की हवा के रुख को भांपकर चलते हैं,और जनता दोनों पाट में पिस रही है।

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