नई दिल्ली/रायपुर/बिलासपुर। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के अंतर्गत कार्यरत 67 उप अभियंताओं की सेवा उच्च न्यायालय, बिलासपुर के फैसले के बाद समाप्त किए जाने को लेकर मची हड़कम्प के मध्य सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। विवादित निर्णय पर रोक लगा दी गई है।
रिट पिटीशन नंबर 661/2025 में 03-02-2026 को बिलासपुर में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट द्वारा पारित किए गए आखिरी फैसले और ऑर्डर से जुड़े मामले में तुलिका शर्मा और अन्य पिटीशनर ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली है।
छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य रिस्पॉन्डेंट(S) के विरुद्ध अपील याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया है। वकीलों की दलीलें सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया है कि- सम्बन्धितों को नोटिस जारी करें, जिसकी वापसी तिथि 06.04.2026 है। उच्च न्यायालय के विवादित निर्णय और अंतिम आदेश पर रोक लगाई जाएगी और उच्च न्यायालय के समक्ष प्रतिवादी(यों) की सेवा में निरंतरता वर्तमान विशेष अनुमति याचिका के परिणाम के अधीन होगी।
न्याय की उम्मीद जागी:- यहां यह भी चर्चा का विषय है कि जिस तरह से याचिकाकर्ता रवि तिवारी ने हाईकोर्ट में केवल नियुक्त उपअभियंताओं को नौकरी से निकालने एवं उनका प्रमोशन रोकने की गुहार लगाई और वे नियुक्ति देने वाले अधिकारियों के प्रति मौन रहे, एवं हाईकोर्ट ने भी नियुक्तिकर्ताओं को छोड़कर केवल नियुक्त अभ्यर्थियों को सजा सुनाई, यह एक षड्यंत्र का विषय प्रतीत होता है।
अब जब मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है, तो अब नियुक्तिकर्ता अधिकारियों के भी हाथ-पैर फूल रहे हैं। 67 नियुक्त अभियंताओं को सुप्रीम कोर्ट से न्याय मिलने की पूरी उम्मीद है।
🫵🏻हाईकोर्ट द्वारा यह दिया गया था आदेश
तदनुसार, रिट अपील आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है। विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा पारित विवादित आदेश रद्द किया जाता है। इसके फलस्वरूप, रिट याचिकाकर्ता/अपीलकर्ता की ओर से दायर रिट याचिका, संख्या डब्लूपीसी 3571/2025, आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है। प्रतिवादी संख्या 55 और 64 को छोड़कर निजी प्रतिवादी संख्या 4 से 73 और प्रतिवादी संख्या 10, जिन्होंने 09.05.2013 को सेवा से इस्तीफा दे दिया था, की नियुक्तियों को अवैध घोषित किया जाता है।
49 और यह नियुक्ति प्रारंभ से ही अमान्य है। उक्त प्रतिवादियों के विरुद्ध एक क्वो वारंटो रिट जारी की जाती है, जिसमें यह माना जाता है कि वे पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा विभाग में उप अभियंता (सिविल) के पदों पर आसीन होने के पात्र नहीं हैं, और उनकी नियुक्तियाँ रद्द की जाती हैं। यद्यपि, प्रतिवादी संख्या 55 और 64 की नियुक्तियाँ और सेवा में निरंतरता अप्रभावित रहेंगी।
- यह देखते हुए कि उपर्युक्त प्रतिवादियों ने प्रतिवादी विभाग को लगभग 14 वर्षों की सेवा प्रदान की है, और इनमें से अधिकांश प्रतिवादी अब वैकल्पिक रोजगार के लिए आवेदन करने की आयु सीमा से अधिक हो चुके हैं, न्यायालय सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाता है। यह स्पष्ट है कि चयन प्रक्रिया संचालित करते समय और इन प्रतिवादियों के पक्ष में नियुक्ति आदेश जारी करते समय निर्धारित समय सीमा का पालन न करने के लिए प्रतिवादी राज्य दोषी है। उचित प्रक्रियाओं का पालन करने में देरी और चूक ने दुर्भाग्यवश प्रतिवादियों को एक नाजुक स्थिति में डाल दिया है, जिन्होंने अपने-अपने पदों पर अपना समय और प्रयास लगाया है। इन परिस्थितियों के आलोक में, न्यायालय इस बात को मानता है कि यदि इस निर्णय के अनुसरण में उन्हें पहले से किए गए भुगतान और बकाया राशि की वसूली की जाती है तो इन प्रतिवादियों को अनुचित कठिनाई होगी। इसलिए, न्यायालय यह मानता है कि ऐसे भुगतान और बकाया राशि प्रतिवादी राज्य द्वारा वसूली के अधीन नहीं होंगे। लागत के संबंध में कोई आदेश नहीं दिया जाएगा।
🫵🏻 विशेष टिप्पणी की थी हाईकोर्ट ने
भर्ती प्रक्रिया के प्रारंभ में अधिसूचित चयन सूची में शामिल होने के लिए पात्रता मानदंड को भर्ती प्रक्रिया के मध्य में तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक कि मौजूदा नियम इसकी अनुमति न दें, या विज्ञापन, जो मौजूदा नियमों के विपरीत न हो, इसकी अनुमति न दे। यदि मौजूदा नियमों या विज्ञापन के तहत ऐसा परिवर्तन अनुमेय भी हो, तो परिवर्तन को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 की आवश्यकता को पूरा करना होगा और मनमानी न होने की कसौटी पर खरा उतरना होगा।







