👉🏻 शहर को सुंदर बनाने की कोशिशों को लग रहा पलीता
कोरबा। कोरबा शहर और जिले में बनाई जा रही व्यवस्थाओं पर अनेक लोगों की हठधर्मिता के कारण अव्यवस्था कायम है। हम बात करें नगर पालिक निगम क्षेत्र की तो यहां व्यवस्थाओं पर हठधर्मिता कुछ ज्यादा ही हावी होती नजर आ रही है। एक पुरानी कहावत है कि एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। अगर बात करें निगम की तो वर्तमान में अव्यवस्था रूपी भाड़ को फोड़ने की लगातार कोशिश में एक शख्स लगा हुआ है। नगर निगम आयुक्त आशुतोष पांडेय के द्वारा क्षेत्र के राजनेताओं प्रमुख रूप से मंत्री लखन लाल देवांगन, महापौर श्रीमती संजू देवी राजपूत के मार्गदर्शन में पूरे इच्छाशक्ति से शहर को सुंदर और व्यवस्थित बनाने का कार्य किया जा रहा है। वह वर्षों से जमे और कुछ मट्ठड़ किस्म के उन अधिकारियों को भी साथ लेकर उनके दायित्वों का आभास कराने में जुटे हुए हैं, जो इस शहर की तासीर को अच्छी तरह से जानते हैं लेकिन अपनी कुर्सी पर ही चिपके रहते हैं। हालांकि ऐसे जिद्दी किस्म के अधिकारियों का कुछ ज्यादा साथ तो नहीं मिल पा रहा लेकिन जितना कोशिश हो रही है, उस पर उन्हें फटकार के साथ जिम्मेदारी का बोझ भी उठाना पड़ रहा है।
तमाम कोशिशों को सफलता भी मिल रही है तो कुछ अपवाद किस्म के लोगों के कारण अच्छी कोशिशें को पलीता भी लग रहा है। एक बात तो तय है कि जैसी प्रजा होगी वैसा शासन होगा, लेकिन प्रशासन को भी समय-समय पर चाबुक चलाने की आवश्यकता जरूर है क्योंकि बिना चाबुक चलाए जनता निरंकुश हो जाती है। हठधर्मी किस्म के लोगों को सबक सिखाने के लिए उनके प्रति कठोर होना भी जरूरी है। कुछ हठधर्मी किस्म के लोग बनती व्यवस्थाओं को बिगाड़ने का काम हर दिन कर रहे हैं।
👉🏻व्यवसायियों का अधूरा साथ
सिर्फ निगम क्षेत्र ही नहीं बल्कि प्राय: जिले भर में कई ऐसे व्यापारी हैं जिनके आगे बार-बार आग्रह करने के बावजूद वह व्यवस्था को बनाने में साथ देना जरूरी नहीं समझते। ऐसे लोग अपने दुकानदारी के कारण न सिर्फ सड़क पर सुगम आवागमन को बाधित करते हैं बल्कि ऐसे व्यापारियों के मन में क्षोभ का भाव भर देते हैं कि वह कर रहा है तो हम क्यों नहीं..!लेकिन, वह इस बात पर आत्मसंतुष्ट रहता है कि कम से कम वह दूसरों की तरह गलत तो नहीं कर रहा। यदि व्यापारी अपने दायरे में दुकान की सीमा क्षेत्र में सामानों को व्यवस्थित रखें, सड़क तक न पहुंचे तो व्यवस्था में बहुत कुछ सुधार नजर आएगा।
👉🏻अवैधानिक बैनर-पोस्टर
शहर की सुंदरता को अवैधानिक बैनर-पोस्टर बदसूरत बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। खास अवसरों को लेकर प्रचार सामग्रियों को व्यवस्थित तरीके से लगाने का एक सलीका भी होता है लेकिन यहां एक भेड़ चाल सी चल रही है। उसने लगाया तो हम भी लगाएंगे। ऐसे में हजारों-लाखों रुपए खर्च कर किए जा रहे हैं सौंदर्य करण के कार्य प्रभावित होने के साथ-साथ सुगम आवागमन और खासकर चौक- चौराहों पर दूसरे तरफ की दृश्यता प्रभावित होती है। बिजली के खंभे, टेलीफोन के खंभे,रेलवे, साइन बोर्ड, मार्ग संकेतक, लैंप पोस्ट सहित अन्य सार्वजनिक संपत्तियों पर बैनर-पोस्टर लगाना प्रतिबंधित है। इस पर जुर्माना का प्रावधान है किंतु नगर निगम सहित सम्बंधित विभागों के अधिकारियों की सहनशीलता/ भाईचारा/उदासीनता/अकर्मण्यता और हद से ज्यादा अपनापन तथा राजनेताओं का कोपभाजन बनने का भय, कर्तव्यों के निर्वहन व जुर्माना की कार्रवाई पर रोक लगा रखे हैं।
👉🏻संपत्ति विरूपण
शहर को साफ-सुथरा बनाने के साथ-साथ रंग-रोगन कर इसे और सुंदर बनाने की कवायदों में लाखों नहीं बल्कि करोड़ों रुपए लगाए जा रहे हैं। कलाकार अपनी कलाकृतियों को दीवारों पर उकेर रहे हैं। महंगे रंग -रोगन कराए जा रहे हैं लेकिन इसके बावजूद संपत्ति विरूपण का जिन्हें कीड़ा काटता है, उनके लिए ऐसे सुंदर कार्य भी कोई मायने नहीं रखते। उनका सिर्फ एक काम है कि जहां साफ-सुथरी जगह मिल जाए वहां पोस्टर चिपका दो, हमारा क्या जाता है। हालांकि, कुछ मामलों में जुर्माना वसूली की कार्रवाई होती है लेकिन अधिकांश मामलों में इस तरह की कार्रवाई नगण्य नजर आती है। लोग पोस्टर लिए इस तैयारी में रहते हैं कि कब दीवार साफ हो और कब हम जाकर उस पर अपना प्रचार सामग्री चस्पा कर दें। फिर दूसरा शख्स तैयार रहता है और वह उसके ऊपर अपनी सामग्री चिपका आता है। ऐसे हठधर्मी सदैव दंड के पात्र हैं।
👉🏻ठेले-खोमचे,पसरा
अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए, परिवार का भरण-पोषण करने के लिए ठेला, खोमचा, पसरा, तम्बू लगाकर सामान बेचने वालों की बहुतायत है। ऐसे लोग भी अपनी हठधर्मिता की वजह से व्यवस्था को बनाए रखने में सहयोग नहीं कर रहे।इन्हें जिस जगह पर मना किया जाता है वहीं जाकर जरूर खड़े हो जाते हैं।कभी अपनी रोजी-रोटी की बात कह कर तो कभी दुकानदारी नहीं चलने की बात कहते हैं, लेकिन ऐसे अस्थाई दुकानदारी करने वालों की वजह से दिन भर कहीं ना कहीं किसी न किसी क्षेत्र में व्यवस्था बिगड़ती ही रहती है। ऐसे लोगों के द्वारा भी व्यवस्था को बिगाड़ने का कार्य किया जा रहा है जबकि इन्हें इस तरह का सहयोग करना चाहिए कि ना तो इनको दिक्कत हो, ना लोगों को और ना ही प्रशासन को कार्रवाई करने की जरूरत पड़े।
👉🏻डस्टबिन नहीं,स्ट्रक्चर खड़े
सुंदरता का सबसे बड़ा दुश्मन कचरा है। कचरों को, दुकानों से निकलने वाले अपशिष्ट जैसे कागज, पुट्ठा, प्लास्टिक, खाद्य पदार्थों के पैकेट, डिब्बे आदि सामग्रियों को डस्टबिन रखा जाए, इधर-उधर ना फेंका जाए तो दुकान के आसपास की सुंदरता बनी रहती है। देखा जा रहा है कि नगर निगम ने पिछले के पिछले साल जो डस्टबिन प्रमुख-प्रमुख जगहों पर स्टील के स्ट्रक्चर में लगवाया था, डस्टबिन तो गायब हो चुका है, पर स्ट्रक्चर जरूर खड़े हैं। कई जगह से डस्टबिन ही गायब है। बड़े-बड़े व्यावसायिक काम्प्लेक्स, दुकानों के सामने कचरे का ढेर पड़ा रहता है। यह व्यावसायिक क्षेत्र के मुख्य मार्गों के किनारे सहज ही देखा जा सकता है। सुबह से लेकर रात तक यह यूं ही पड़े रहते हैं, रात में सफाई करने वाला इन्हें उठा कर ले जाता है और दूसरे दिन फिर वही हालात नजर आते हैं। दुकानदारों को अपनी दुकानों के सामने डस्टबिन रखने के लिए बार-बार आग्रह किया जाता रहा है किंतु दरकिनार ही होते हैं। हालांकि, कई लोग यह तर्क जरूर देते हैं कि हम स्वच्छता के नाम पर भारी भरकम टैक्स चुका रहे हैं तो स्वच्छता निगम की जिम्मेदारी है। वह अपनी जगह पर सही भी हैं किंतु समस्या तो ऐसे लोग ज्यादा पैदा कर रहे हैं जो ना तो टैक्स देते हैं और न ही स्वच्छता में सहयोग। ऐसी प्रवृत्ति के लोगों के बीच वे लोग अपने मन में दुख महसूस करते हैं जो समय पर हर तरह का टैक्स जमा करते हैं/स्वच्छता कर भी देते हैं, साफ सफाई भी करते हैं, पर गैर जिम्मेदारों के विरुद्ध कार्रवाई नहीं होती। रही सही कसर लापरवाह किस्म के सफाई कर्मी और उन्हें संरक्षण देते उनके ठेकेदार पूरी कर देते हैं। इनकी वजह से अनेक क्षेत्रों की नालियां महीने तक बजबजाती नजर आती है।
👉🏻वाहन मालिक/चालक
अक्सर देखा जाता है कि लोग अपने चार पहिया-दो पहिया वाहनों से खरीदारी करने बाजार में पहुंचते हैं। लेकिन वह इस दौरान अपने वाहनों को जहां पाए ,जैसा पाए आड़ा- तिरछा खड़ी कर देते हैं। संकरी जगह पर भी अपनी गाड़ी खड़ी कर देते हैं जिसके कारण दूसरे लोगों को जाने- आने का रास्ता नहीं मिल पाता। चौड़ी सड़कों वाले इलाकों में भी ऐसे लोगों के लिए अच्छी खासी जगह भी कम पड़ती नजर आती है। सीतामढ़ी से पावर हाउस रोड तक की संकरी सड़क पर ऐसे वाहन चालक तो बाधा उत्पन्न करते ही हैं, टीपी नगर क्षेत्र से बुधवारी, कोसाबाड़ी तक की अच्छी खासी चौड़ी सड़क भी उनके लिए छोटी पड़ जाती है। ऐसे वाहन खड़ी करने वालों/ सड़क पर वाहन खड़ी करने वालों के विरुद्ध नियमित कार्रवाई अपेक्षाकृत कमजोर नजर आती है। ऐसे लापरवाह वाहन धारकों की हठधर्मिता सुगम यातायात व्यवस्था की मंशा को पलीता लग रही है।
👉🏻मजबूरी की आड़
इसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हैं जो अपने आप को दीन-हीन और मजबूर बेबस जताते हुए सड़क पर ही तंबू तान कर बैठे रहते हैं। इन्हें व्यवस्था और समस्या से कोई मतलब नहीं रहता बल्कि सिर्फ और सिर्फ इनको अपने काम निकालने से मतलब रहता है। ऐसे लोग हर जगह पाए जाते हैं। अब निगम प्रशासन इतना लाचार हो चुका है कि वह मजबूर तो नहीं पर मजबूर की तरह दिखने वाले ऐसे लोगों पर भी सख्ती नहीं दिखा पा रहा है। इन पर सख्ती इसलिए जरूरी है क्योंकि जिस तरह से यह सड़क तक आकर अपनी दुकानदारी चलाते हैं, वह दूसरों के साथ-साथ इनके लिए भी घातक साबित हो सकती है। इनके जान- माल की रक्षा के लिए सख्त होना जरूरी है। सड़क किनारे, मुख्य सड़कों के टर्निंग प्वाइंट पर ये नजर आते हैं।
👉🏻असामाजिक तत्व,चोर-उचक्के
शहर के सौंदर्यीकरण और अच्छी खासी व्यवस्था को असामाजिक तत्वों/चोर-उचक्कों की भी नजर लगी हुई है। ऐसे लोग बनती व्यवस्थाओं को बिगाड़ने में अपना भरपूर योगदान दे रहे हैं। कभी यह लैंप पोस्ट को क्षतिग्रस्त करते हैं तो कभी लाइट चुराते हैं, कभी बल्ब फोड़ते हैं तो कभी सौंदर्यीकरण का लोहा चुरा कर ले जाते हैं, पौधा भी चोरी कर लेते हैं। और तो और सार्वजनिक स्थान पर गंदगी फैलाने से भी बाज नहीं आते।






