👉🏻घटिया निर्माण ने मजदूर की अंतड़ी फाड़ दी,इन्होंने कर्तव्य से मुंह मोड़ा
👉🏻 सीढ़ी हादसे के बाद बदहाली में जी रहा परिवार,कोई सुध नही ले रहे रेंजर व अधिकारी
👉🏻 ठेकेदार पर पल्ला झाड़कर खुद को बचाने की जुगत (सत्यसंवाद लगातार)
कोरबा। प्रदेश के श्रम मंत्री के गृह जिले में एक मजदूर सुनियोजित घटिया निर्माण की वजह से हादसे का शिकार हुआ है। कोरबा वन मंडल के कोरबा वन परिक्षेत्र अंतर्गत ग्राम भुलसीडीह में निर्माणधीन वॉच टावर न सिर्फ घटिया निर्माण की कहानी कह रहा है बल्कि इस घटिया निर्माण की वजह से एक मजदूर की जान जाते-जाते बची। वह जिंदा तो है पर असहनीय दर्द से कराहते हुए..। उसकी यह कराहट ना तो वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी जैसे रेंजर, एसडीओ, डीएफओ नहीं सुन पा रहे हैं तो दूसरी ओर हादसे के बाद से बदहाली का जीवन जी रहे इन मजदूरों की सुध लेने के लिए अधिकारियों को ना तो फुर्सत मिली ना आर्थिक सहयोग करने का वक्त।
दरअसल, वन विभाग में विभिन्न मद के कार्यों में पहले एक सुनियोजित घोटाले की स्क्रिप्ट लिखी जाती है और फिर इसे सारे अधिकारी अपनी- अपनी भूमिका निभाते हुए पूरी शिद्दत से अंजाम देने में जुटे रहते हैं। ऐसे ही घोटाले की भेंट चढ़ गया भुलसीडीह का वॉच टावर, जिसने निर्माण सामाग्रियों के गुणवत्ता मानक को भी ताक पर रखा और इसी गुणवत्ताहीन कार्य के कारण यहां काम कर रहे एक मिस्त्री की जान आफत में आ गई। निर्माण एजेंसी वन विभाग/कोरबा रेंज के अधीन इस वॉच टावर का निर्माण किसी शेखर श्रीवास नामक ठेकेदार के द्वारा कराया जा रहा है। रेंजर मृत्युंजय शर्मा की सीधी देखरेख, एसडीओ के पर्यवेक्षण और डीएफओ की निगरानी में यह कार्य हो रहा है, जो कमोबेश वन विभाग के अंतर्गत होने वाले सभी कार्यों में जिम्मेदारियां क्रमबद्ध इनकी ही रहती है। मुख्य नियोक्ता रेंजर अथवा वन विभाग को ही माना जाता है।राकेश खड़िया नामक मिस्त्री भी अपनी पत्नी के साथ इस वॉच टावर के निर्माण कार्य में लगा हुआ था। करीब 20 फीट की ऊंचाई से 26 फरवरी 2026 को राकेश खड़िया नीचे गिर पड़ा। वह ऊंचाई पर टावर की पूर्व निर्मित सीढ़ी (अन्य मिस्त्री द्वारा निर्मित) पर खड़े हो कर के किनारे काम कर रहा था, कि इस दौरान घटिया मटेरियल, कमजोर छड़ के सहारे निर्मित आधारहीन सीढ़ी टूट गई और मजदूर गिर पड़ा। शाम लगभग 4:30 बजे यह घटना हुई। राकेश खड़िया को सिर, हाथ-पैर और पेट में गंभीर चोट आई। उसे निजी अस्पताल ले जाया गया जहां ठेकेदार के साथ रेंजर भी मौजूद था। निजी अस्पताल में तीन दिन तक इलाज का खर्च ठेकेदार ने उठाया इसके बाद लगभग 5 लाख रुपए ऑपरेशन में लगने की जानकारी होते ही रेंजर और ठेकेदार के होश उड़ गए। अब चूंकि जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ना था इसलिए जिला अस्पताल ले जाया गया और वहां से मेकाहारा रायपुर रिफर कर दिया गया। राकेश खड़िया की अंतड़ी फट चुकी थी। मेकाहारा में उसका ऑपरेशन किया गया, पेट मे कई टांके लगे। काफी दिनों तक यहां उसने इलाज कराया। एक बार ठेकेदार शेखर श्रीवास उसे देखने के लिए गया तो 5-10000 रुपए की मदद कर दी। इसके बाद मजदूर के डिस्चार्ज होने से लेकर आज तक ना तो रेंजर और न ही ठेकेदार ने झांकने की जरूरत समझी बल्कि आर्थिक मदद मांगने पर ठेकेदार के द्वारा फोन काट दिया जाता है।
👉🏻मजदूरी में झोल

पीड़ित मिस्त्री राकेश खड़िया और उसकी पत्नी इस वॉच टावर में काम करते थे। वॉच टावर में महिला को 250 रुपये की दिहाड़ी और राकेश खड़िया को 550 रुपये की मजदूरी दी जा रही थी। कुशल और अकुशल मजदूर के दायरे में रखकर मजदूरी दी जाती है किंतु जानकारों की मानें तो महिला को काफी कम मजदूरी मिल रही थी। इन दोनों का ना तो दुर्घटना बीमा कराया गया था, ना ही ईएसआईसी से पंजीकृत कराए गए। बताया गया कि यह दोनों मजदूर ठेकेदार के सीधे संपर्क में थे और उसके अधीन ही निर्माण कार्यों में लगे रहते थे। वॉच टावर के निर्माण में भी इन्हें ठेकेदार ने ला कर लगाया था किंतु यहां मुख्य नियोक्ता की हैसियत से रेंजर/ वन विभाग की जिम्मेदारी सुनिश्चित होती है।
👉🏻दर्द से कराहती जिंदगी, दाने-दाने को मोहताज
कैम्पा मद के वॉच टावर में कम राशि लगाकर ज्यादा पैसा बचाने रेंजर की लालच ने पीड़ित राकेश खड़िया को जिंदगी भर का दर्द दे दिया। मिस्त्री राकेश खड़िया की अंतड़ी फट जाने के बाद वह अब फिलहाल कामकाज के लायक नहीं रह गया। उसका टांका सूख चुका है लेकिन अंदर उठने वाले दर्द से दोहरा हो जाता है। उसकी पत्नी ने बताया कि दर्द काफी रहता है। इलाज में काफी पैसा लग गया, रिश्तेदारों से उधार मांग-मांग कर किसी तरह से दवा और राशन का खर्चा उठा रहे हैं लेकिन रिश्तेदार भी कब तक मदद करेंगे! ठेकेदार को फोन लगाने पर फोन काट देता है। रेजर या वन विभाग के अधिकारी आज तक यह जानने नहीं पहुंचे कि किस हालत में जी रहे हैं। पीड़ित राकेश खड़िया, पत्नी श्रीमती कलेश्वरी खड़िया,पुत्री हिमांशी 10 वर्ष और पुत्र आस्तिक कुमार 5 वर्ष को आर्थिक मदद की दरकार है, साथ ही साथ इस मामले में वन विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड सकता किंतु वह ऐसा कर रहा है।






