👉🏻हिरासत में मौत के एक मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस पर सख्त टिप्पणी
नई दिल्ली/रायपुर। छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत में हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस और वरिष्ठ अधिकारियों के रवैये पर बेहद कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) की कार्यप्रणाली पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोर्ट को मामले के हर पहलू पर गुमराह किया जा रहा है। अदालत ने यहां तक कहा कि उसे यह दर्ज करने में दुख हो रहा है कि “छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह अयोग्य हैं।”
मामला बिलासपुर जिले के सीपत थाना अंतर्गत ग्राम मोहरा निवासी श्रवण सूर्यवंशी उर्फ श्रवण तामरे, उम्र 34 वर्ष की जनवरी 2024 में हुई मौत से जुड़ा है। मृतक की पत्नी और दो बेटियों ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि पुलिस हिरासत में उसके (श्रवण तामरे के) साथ मारपीट और टॉर्चर किया गया, जिसके कारण उसकी मौत हुई। परिवार ने निष्पक्ष जांच के साथ 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी।
👉🏻तीन दिन में अस्पताल पहुंचा, फिर हुई मौत
मामले के अनुसार मृतक को 18 जनवरी 2024 को उसकी किराने की दुकान के सामने बिक्री के लिए करीब 1200 रुपये कीमत की शराब रखने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद उसकी मेडिकल जांच कराई गई थी। राज्य की ओर से हाईकोर्ट में बताया गया था कि उस समय उसके शरीर पर कोई चोट नहीं मिली थी, केवल करीब 15 दिन पुरानी थोड़ी सूजन का उल्लेख था।
गिरफ्तारी के तीन दिन बाद, 21 जनवरी 2024 को उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां सुबह करीब 6 बजे उसकी मौत हो गई।
मौत के अगले दिन यानी 22 जनवरी 2024 को जेल अधीक्षक ने सेशन जज को पत्र लिखकर न्यायिक जांच कराने का अनुरोध किया। इसके बाद चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 176 के तहत जांच शुरू की। संबंधित JMFC ने जुलाई 2024 में अपनी रिपोर्ट में यह राय दी कि मृतक की मौत सिर पर लगी चोट से उत्पन्न जटिलताओं के कारण हुई थी। न्यायिक जांच में सिर पर किसी कुंद हथियार (Blunt Weapon) से चोट लगने की बात सामने आई।
👉🏻 FIR में ढाई साल से ज्यादा की देरी पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सबसे गंभीर सवालों में से एक यह था कि जनवरी 2024 में मौत होने के बावजूद पुलिस ने मामले की जांच के लिए 30 जुलाई 2026 को FIR दर्ज की। परिवार ने पहले हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और हिरासत में हुई मौत की निष्पक्ष जांच तथा 50 लाख रुपये मुआवजे की मांग की थी। हालांकि हाईकोर्ट ने FIR दर्ज करने अथवा आरोपों की जांच के संबंध में कोई निर्देश दिए बिना 1 लाख रुपये का मुआवजा देकर मामले का निपटारा कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य उन कर्मचारियों का नियोक्ता है, जिनकी लापरवाही के कारण मृतक की जान गई और इसी आधार पर राज्य मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार है। अदालत ने यह भी माना कि मुआवजे का उद्देश्य पुलिस अथवा जेल अधिकारियों पर ऐसा प्रभाव डालना है कि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो, जिससे किसी व्यक्ति की जान चली जाए।
👉🏻सुप्रीम कोर्ट ने 1 लाख रुपये का मुआवजा बताया अपर्याप्त
इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया था। राज्य की ओर से जवाबी हलफनामा दाखिल किया गया, लेकिन उसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मृतक की हिरासत में मौत की जांच और FIR दर्ज करने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए गए।
अपने पहले के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा दिए गए 1 लाख रुपये के मुआवजे को “पूरी तरह अपर्याप्त” बताया था। अदालत ने कहा था कि मृतक के परिवार को हुए नुकसान की गंभीरता को देखते हुए यह मुआवजा उचित नहीं है।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को आवश्यक निर्देश प्राप्त करने का समय दिया और राज्य के गृह सचिव तथा DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।
DGP ने कहा- जांच के आदेश दिए, दोषियों पर होगी कार्रवाई
हाल की सुनवाई में राज्य के गृह सचिव और DGP वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यवाही में शामिल हुए। DGP ने अदालत को बताया कि मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और दोषी पाए जाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुआ। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर नाराजगी जताई कि जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने में इतनी लंबी देरी क्यों हुई।
जस्टिस संदीप मेहता ने कहा कि अदालत यह भी देखेगी कि जिम्मेदारी तय करने का काम किस एजेंसी को सौंपा जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राज्य पुलिस इस मामले की जांच करने में सक्षम है या किसी दूसरी एजेंसी से जांच कराने की जरूरत है।
जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की कि अब तक अदालत ने जो कुछ देखा है, उससे उसे नहीं लगता कि छत्तीसगढ़ का प्रशासन इस मामले से निपटने में सक्षम है।
👉🏻“न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस को नहीं मिली” वाले तर्क पर भी फटकार
सुनवाई के दौरान DGP ने देरी को यह कहते हुए उचित ठहराने की कोशिश की कि मौत के कारणों से संबंधित न्यायिक जांच की रिपोर्ट पुलिस विभाग को नहीं भेजी गई थी।
इस पर जस्टिस मेहता ने स्पष्ट किया कि उक्त रिपोर्ट हाईकोर्ट में राज्य सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे के साथ ही संलग्न थी।
अदालत ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि “हम अवमानना की कार्रवाई शुरू करेंगे! हर पहलू पर कोर्ट को गुमराह किया जा रहा है।”
👉🏻“कुंद हथियार से सिर पर चोट का क्या मतलब है?”
सुनवाई के दौरान DGP ने रिकॉर्ड में मौजूद रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि उसे पढ़ने पर ऐसा कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) सामने नहीं आता, जिसके आधार पर FIR दर्ज की जा सके।
इस पर जस्टिस मेहता ने DGP से बेहद सख्त लहजे में सवाल किया-“कुंद हथियार से सिर पर चोट लगने से मौत का क्या मतलब है? हमें बताइए। आप समझते हैं? आसान भाषा में?”
इसी दौरान अदालत ने छत्तीसगढ़ पुलिस के शीर्ष अधिकारी की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए कहा-
“हमें यह कहते हुए दुख हो रहा है कि हमें यह दर्ज करना होगा कि छत्तीसगढ़ के DGP पूरी तरह अयोग्य हैं!”
👉🏻अब 12 अगस्त को फिर होगी सुनवाई
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की जांच क्षमता और जिम्मेदारी तय करने के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने यह भी संकेत दिया है कि जरूरत पड़ने पर जांच किसी अन्य एजेंसी को सौंपने पर विचार किया जा सकता है। मामला अब 12 अगस्त 2026 को आदेश के लिए सूचीबद्ध किया गया है। इस सुनवाई पर यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि हिरासत में हुई मौत के लिए जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होगी, जांच किस एजेंसी से कराई जाएगी और मृतक के परिवार को मुआवजे के संबंध में आगे क्या आदेश दिया जाएगा। (साभार)







