✍🏻 विशेष आलेख- लेखक प्राण नाथ मिश्रा, पूर्व प्रबन्धक-कंपनी संवाद, बालको-कोरबा(छ.ग.)
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़े चेतावनी दे रहे हैं कि भारत के अधिकांश शहर लगातार खतरनाक वायु गुणवत्ता श्रेणी में बने हुए हैं। जब हम अर्थव्यवस्था को गति देने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की बात करते हैं, तो यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्रदूषण नियंत्रण की मांग विकास का विरोध नहीं है, बल्कि ‘सतत विकास’ (Sustainable Development) का आग्रह है। सवाल यह है कि जिस विकास की नींव हम आज रख रहे हैं, क्या वह हमारी आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने योग्य हवा दे पाएगा?
👉🏻25 वर्षों का तुलनात्मक परिदृश्य: कैसे बिगड़ी हमारी हवा?
पिछले 25-30 वर्षों में तेजी से हुए औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण देश की वायु गुणवत्ता में लगातार गिरावट आई है। उपग्रह डेटा और CPCB के ऐतिहासिक अध्ययनों के आधार पर वायु गुणवत्ता ($\text{PM}_{2.5}$ और औसत AQI) का 5-वर्षीय अंतराल पर एक अनुमानित तुलनात्मक रुझान निम्न प्रकार है:
वर्ष/काल औसत PM2.5 स्तर (μg/m3) अनुमानित औसत AQI श्रेणी मुख्य कारण व परिस्थिति
2000 ~35–45 संतोषजनक / मध्यम (Satisfactory) सीमित वाहन, कम औद्योगिक घनत्व, जंगलों का बेहतर आवरण
2005 ~50–60 मध्यम (Moderate) औद्योगीकरण की गति में वृद्धि, पुरानी तकनीक के वाहन
2010 ~65–75 खराब (Poor) कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का विस्तार, रियल एस्टेट बूम
2015 ~85–95 अत्यंत खराब (Very Poor) अनियंत्रित निर्माण धूल, डीजल वाहनों की संख्या में उछाल
2020 ~75–85 अत्यंत खराब (Very Poor) लाकडाउन के कारण अस्थायी सुधार, लेकिन औद्योगिक उत्सर्जन जारी
2025/वर्तमान ~80–90+ खराब से गंभीर (Poor to Severe) वाणिज्यिक खनन, अनियंत्रित निर्माण और बड़े पैमाने पर वनोन्मूलन
(नोट: WHO का सुरक्षित वार्षिक मानक $5\ \mu\text{g/m}^3$ है, जबकि भारत का राष्ट्रीय मानक $40\ \mu\text{g/m}^3$ है।)
👉🏻प्रदूषण के तीन मुख्य स्तंभ: कोयला, उद्योग और निर्माण
आज वायु गुणवत्ता सूचकांक को गिराने में केवल एक कारक जिम्मेदार नहीं है, बल्कि तीन प्रमुख कारक मिलकर इसे हवा का संकट बना चुके हैं:
- आक्रामक कोयला खनन और वाणिज्यिक आवंटन: ऊर्जा आवश्यकताओं के नाम पर खदानों को केवल सार्वजनिक ही नहीं, बल्कि वाणिज्यिक उपयोग (Commercial Coal Mining) के लिए भी निजी कंपनियों को सौंपा जा रहा है। इसके कारण हसदेव अरण्य जैसे प्राचीन और घने जंगलों को काटा जा रहा है।
- अनियंत्रित औद्योगीकरण: भारी उद्योगों और थर्मल पावर प्लांटों से निकलने वाली फ्लाई ऐश, सल्फर डाइऑक्साइड ($\text{SO}_2$) और नाइट्रोजन ऑक्साइड ($\text{NO}_x$) हवा में घुल रहे हैं।
- निर्माण गतिविधियां (Construction Activities): सड़कों, पुलों, व्यावसायिक परिसरों और आवासीय सोसाइटियों के अनियंत्रित निर्माण से उड़ने वाली धूल ($\text{PM}{10}$ और $\text{PM}{2.5}$) शहरों के AQI को पूरे वर्ष ‘खराब’ श्रेणी में बनाए रखती है।
🌳🪵कटते पेड़ और ऑक्सीजन का दीर्घकालिक संकट
पेड़ केवल लकड़ी या संसाधन नहीं हैं; वे हवा में मौजूद धूल और जहरीली गैसों को सोखने वाले प्राकृतिक ‘एयर प्यूरीफायर’ हैं।
जब एक प्राकृतिक जंगल काटा जाता है, तो उसकी भरपाई कागजी वृक्षारोपण (Compensatory Afforestation) से तुरंत नहीं हो सकती। एक नए पौधे को वयस्क पेड़ बनकर कार्बन सोखने और उतनी ही मात्रा में ऑक्सीजन देने में 20 से 30 वर्ष का समय लगता है। तब तक के लिए जो तीन दशक का “ऑक्सीजन और पर्यावरण अंतराल” (Environmental Deficit) पैदा होता है, उसकी कीमत हमारी भावी पीढ़ी अपने स्वास्थ्य से चुकाती है।
🙋🏻♂️विकास विरोधी नहीं, ‘दीर्घकालिक दृष्टिकोण’ की मांग
आलेख का उद्देश्य देश के औद्योगिक और आर्थिक विकास को रोकना कतई नहीं है। ऊर्जा सुरक्षा और बुनियादी ढांचा देश की प्रगति के आधार स्तंभ हैं। लेकिन विकास ऐसा होना चाहिए जो विनाश का कारण न बने। इसके लिए सरकार को निम्नलिखित तीन कदम प्राथमिकता से उठाने चाहिए: - ‘पूर्व-विकसित वन’ नीति (Advance Afforestation): किसी भी क्षेत्र में वाणिज्यिक खनन या औद्योगिक पट्टा (Mining Lease) देने से पहले, कंपनी के लिए अनिवार्य किया जाए कि वह किसी अन्य स्थान पर उसी प्रकार का जंगल पहले से विकसित करे। जब वह नया जंगल स्थापित हो जाए, तभी मूल स्थान पर पेड़ काटने की अनुमति दी जाए।
- पारिस्थितिक संपत्ति का पूर्ण मूल्यांकन: खनन पट्टा देने से पहले जमीन के नीचे मौजूद कोयले के मूल्य के साथ-साथ जमीन के ऊपर स्थित जंगल, जैव-विविधता और ऑक्सीजन उत्पादन क्षमता का वैज्ञानिक मूल्यांकन होना चाहिए।
- सख्त निर्माण और औद्योगिक मानक: निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण नियमों का कड़ाई से पालन हो और औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास ‘ग्रीन बेल्ट’ का दायरा बढ़ाया जाए।
👀निष्कर्ष
हम अपनी आने वाली पीढ़ी को कैसी दुनिया सौंपना चाहते हैं—केवल बड़ी-बड़ी इमारतें और आर्थिक आंकड़े, या एक ऐसा वातावरण जहाँ वे सांस ले सकें? आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण में संतुलन बनाना असंभव नहीं है। समय आ गया है कि सरकार ‘पहले निष्कर्षण, फिर सोच’ की जगह ‘दीर्घकालिक योजना और अग्रिम वनीकरण’ की नीति अपनाए, ताकि विकास और जीवन साथ-साथ चल सकें।







