👉🏻बारिश आते ही सामने आ जाती है शहर की बदहाल जल निकासी की व्यवस्था
👉🏻हर साल परेशानी झेलते हैं लोग, फिर भी स्थायी समाधान की ओर ध्यान नहीं
कोरबा (सत्या पाल)। बारिश शुरू होते ही कोरबा शहर और आसपास के इलाकों में जलभराव की वही पुरानी कहानी फिर शुरू हो जाती है। कहीं नाली का पानी सड़क पर है तो कहीं बारिश का पानी घरों और दुकानों में घुस रहा है। कॉलोनियों से लेकर नदी-नालों के किनारे बसी बस्तियों और मोहल्लों तक कमोबेश यही स्थिति दिखाई दे रही है। इस बार कई जगहों पर हालात पिछले साल से भी ज्यादा खराब नजर आ रहे हैं।
वैसे तो कोरबा में जलभराव कोई नई बात नहीं है। हर साल बारिश आती है, लोग परेशान होते हैं, निगम का अमला कहीं पानी निकालने पहुंचता है और कुछ दिन बाद मामला ठंडा पड़ जाता है। मौसम बदलता है, लेकिन समस्या वहीं की वहीं रह जाती है।
असल सवाल यही है कि आखिर हर साल की इस समस्या का स्थायी इलाज कब होगा?
👉🏻 नालियां पैक होती गईं, पानी के रास्ते सिकुड़ते गए
शहर बढ़ता गया और उसके साथ निर्माण भी बढ़ते गए। लेकिन इस बढ़ते शहर में बारिश के पानी के निकलने के रास्ते कितने बचे हैं, इस पर शायद उतना ध्यान नहीं दिया गया।
ज्यादातर नालियों के ऊपर निर्माण हो गया, बहुत सी चालू नालियां ही पैक कर दी गईं। पानी सड़कों पर बहता है, जालियों के रास्ते नाली में नहीं जाता। कई जगह नालों के आसपास अतिक्रमण है तो कहीं अधूरे, मलबा से पैक नाला-नाली निर्माण ने पानी का रास्ता रोक दिया है। सामान्य दिनों में सड़कों पर लोगों के घरों-दुकानों का पानी तो बहता ही रहता है, पर इसका खामियाजा बारिश के दिनों में आम लोगों को ज्यादा ही भुगतना पड़ता है।
नगर निगम क्षेत्र के 67 वार्डों में स्थिति अलग-अलग जरूर है, लेकिन समस्या का मूल लगभग एक ही है, पानी की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था का न होना।
👉🏻वर्षों से जमे अधिकारी, फिर भी नहीं दिखता शहर का बदलता मिजाज?
नगर निगम में कुछ अधिकारी ऐसे हैं जो वर्षों से यहीं काम कर रहे हैं। शहर को बदलते हुए उन्होंने देखा है। कहां पानी भरता है, कौन सा नाला कहां से गुजरता है,सफाई का क्या हाल है और किस इलाके में हर साल समस्या आती है, यह भी उनसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो।
इसके बावजूद यदि हर साल बारिश में वही तस्वीर सामने आती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
आखिर इतने वर्षों में ऐसे इलाकों की समस्या का स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ?
शहर में अनियमित/अनियंत्रित विकास/निर्माण होते जा रहे हैं। नालियां सिकुड़ती गईं। नालों के किनारे कब्जे होते जा रहे हैं। कई जगह निर्माण शुरू होकर अधूरे पड़े रहे। लेकिन जिम्मेदारों ने समय रहते इस पर रोक लगाने की कोशिश कितनी की, यह बड़ा सवाल है।
👉🏻पुराने ढर्रे पर चलने से कैसे बदलेगा शहर?
नगर निगम में वर्षों से जमे अधिकारियों की अपनी कार्यशैली बन जाती है। नए अधिकारी आते हैं, कुछ नया करने की कोशिश करते हैं और दो-तीन साल बाद उनका तबादला हो जाता है। इसके बाद वही पुराने अधिकारी फिर व्यवस्था संभालते नजर आते हैं।
यही वजह है कि कई बार नए अधिकारियों की सोच और नीचे की कार्यशैली में तालमेल नहीं बैठ पाता।
वर्तमान आयुक्त आशुतोष पांडे को लेकर यह उम्मीद जरूर है कि वे शहर के विकास को लेकर कुछ अलग सोच रखते हैं और कई कामों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन नगर निगम अकेले आयुक्त के भरोसे नहीं चल सकता।
आयुक्त योजना बनाएं और नीचे बैठे जिम्मेदार अधिकारी उसे उसी पुराने ढर्रे पर ले जाएं तो नतीजा क्या निकलेगा, यह समझना मुश्किल नहीं है।
“एक अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता..” नगर निगम में यह कहावत इन दिनों कुछ ज्यादा ही सटीक बैठती नजर आती है।
👉🏻 नेताओं को भी सब दिखाई देता है, लेकिन…
शहर की इस हालत के लिए केवल नगर निगम के अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराकर बात पूरी नहीं हो जाती। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
वार्ड पार्षदों को अपने इलाके की समस्या सबसे पहले पता चलती है। किस गली में पानी भरता है, किस नाले की सफाई नहीं हुई, कहां अतिक्रमण है और कहां नाली की जरूरत है, यह सब उनके सामने होता है। लेकिन समस्या उठाने और उसके स्थायी समाधान के लिए दबाव बनाने के समय अक्सर राजनीति बीच में आ जाती है। जनहित की समस्या कब व्यक्तिगत या राजनीतिक हित में बदल जाती है, यह भी शहर देखता रहा है।
👉🏻 बारिश हर साल होगी, फिर तैयारी कब होगी?
बारिश को रोका नहीं जा सकता। लेकिन बारिश का पानी घरों और दुकानों में घुसे, इसे रोकने की तैयारी तो की जा सकती है।
जरूरत है कि नगर निगम केवल बारिश शुरू होने के बाद नालियां साफ कराने और पानी निकालने तक सीमित न रहे। शहर के नदी-नालों की स्थिति, अतिक्रमण, बंद नालियों और प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों का एक बार गंभीरता से सर्वे होना चाहिए।
जहां निर्माण ने पानी का रास्ता रोका है, वहां रास्ता खोला जाए। जहां नाली छोटी है, वहां क्षमता बढ़ाई जाए। जहां निर्माण अधूरा है, उसे पूरा कराया जाए। क्योंकि समस्या हर साल नई नहीं होती, बस बारिश के साथ फिर सामने आ जाती है।
और सवाल भी बहुत सीधा है- जब नगर निगम के अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को पता है कि कहां-कहां पानी भरता है, तो फिर हर साल शहर को डूबने का इंतजार क्यों किया जाता है?






