👉🏻सोशल मीडिया में तैर रही उपेक्षा की पीड़ा
👉🏻 जिला मंत्री ने की शिकायत, झूठी होने की चर्चा,आखिर किसके इशारे पर चल रही ओछी राजनीति..?
👉🏻जितने नेता उतने गुट-समर्थक नहीं एकजुट
कोरबा। जिले में भाजपा की राजनीति में गुटबाजी की भरमार होती जा रही है। यहां जितने नेता नेतृत्व कर रहे हैं, उनके अपने-अपने गुट औऱ समर्थक तैयार हो रहे हैं। अपने नेता के प्रति समर्पण भाव दिखाने के चक्कर में जुबानी बौछार करने के साथ-साथ शिष्टाचार भी भूल रहे हैं।
भाजपा एक वैचारिक/विचारधारा वाली पार्टी प्रचारित होती रही है जिसमें एकता और सम्मान को भी सर्वोपरि रखा गया है किंतु मौजूदा जिला/विधानसभा स्तरीय राजनीति में यह अपवाद हो चला है तथा टांग खींचने के साथ-साथ अपनी ढपली- अपना राग वाली कहावत को चरितार्थ किया जा रहा है।
हालात ऐसे हैं कि पुराने कर्मठ कार्यकर्ताओं की पीड़ा सोशल मीडिया में झलक रही है, तो उस पर कमेंट करके पुराने से पुराने कार्यकर्ता भी अपनी बढ़ती दूरियों और घटती पूछ परख को शब्दों में बयां कर रहे हैं। शब्दों के इशारों में यह भी बताया जा रहा है कि आखिर इसके पीछे कौन सी शक्ति काम कर रही है। ऐसी शक्तियां यह भूल रही हैं कि कार्यकर्ता और पार्टी एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं, फिर कर्मठ कार्यकर्ता अब कम ही मिलेंगे,जो हैं उनका ख्याल रखा जाना जरूरी है,नए को उनके मार्गदर्शन की जरूरत है किंतु नए लोग तो अपने नेता के रुआब में चल रहे हैं।
इन दिनों दीपका के वरिष्ठ नेता दीपक जायसवाल के विरुद्ध तथाकथित ठगी को लेकर की गई शिकायत से राजनीतिक माहौल में गर्मी है। यह शिकायत रामपुर विधानसभा क्षेत्र के युवा कार्यकर्ता और संगठन में अहम भूमिका निभा रहे जिला मंत्री अजय कंवर के द्वारा की गई है। शिकायत को पार्टी के लोग झूठा बता रहे हैं साथ यह भी बताया जा रहा है कि दीपक जायसवाल ने सोशल मीडिया में अपना दर्द बयां किया तो इससे किसी का ईगो हर्ट हुआ। उसने प्रभावशाली होने के कारण जिला मंत्री को अपने प्रभाव में लेकर दीपक जायसवाल के विरुद्ध झूठी शिकायत दर्ज करवा दिया। अब यह तो सर्वविदित है कि किसी से काम लेना हो/काम निकलवाना हो तो नीचे से ऊपर तक जेब गर्म करनी ही पड़ती है। पार्टी सूत्र बताते हैं कि जिस प्रभावशाली व्यक्ति के माध्यम से काम दिलाया गया, उसने आगे भी काम मिलते रहने की गारंटी देकर कुछ और ऊपरी खर्चा मांगा था। यही खर्चा लेन-देन का व्यवहार अब दीपक जायसवाल के गले की हड्डी बन गया है। दीपक के मुताबिक ठगी जैसी कोई बात ही नहीं है क्योंकि वह और अजय पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता हैं, कुछ गलतफहमियां आड़े आ रही हैं।
पार्टी में शीर्ष नेतृत्व के लिए जरूरी है कि वह कान का कच्चा ना हो बल्कि अपने सभी पदाधिकारी और कार्यकर्ताओं को बेहतर ढंग से समझते हुए किसी भी तरह के निर्णय और नतीजे पर पहुंचे। लेकिन, यहां तो कोई भी किसी का कान भर के किसी दूसरे का अहित करने में सफल हो रहा है।

सोशल मीडिया पर किए जा रहे कमेंट्स यह बताने के लिए काफी हैं कि कौन किसके वार से आहत हो रहा है। पर्दे के पीछे रहकर कराए जा रहे वार से बड़े नेता को ही प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष नुकसान पहुंच रहा है। कभी दूर-दूर रहने वाले जो अब इतने नजदीक हो गए हैं, वह कहीं ना कहीं पिछले चुनाव में हार की वजह थे और इस चुनाव के बाद बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। इनकी अवसरवादिता उनके आका के लिए गड्ढा खोदने का काम धीरे-धीरे करती जा रही है जिसके दूरगामी परिणाम आगामी चुनाव में देखने को मिल सकते हैं, इसकी भी चर्चा इन्हीं के लोगों के बीच से हो रही है। दूसरी सबसे अहम बात है कि जुबानी जंग में नए-नए बने युवा पदाधिकारी, नए-नए कार्यकर्ता अपने आका को खुश करने के चक्कर में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं से बात करने का लहजा और लिहाज दोनों भूल रहे हैं। इनकी बातों से शिष्टाचार गायब हो रहा है जो कि बढ़ते अंतर्कलह के बीच संगठन को कमजोर करने का ही काम कर रहा है। समझदारों के लिए इतना इशारा काफी है…..।







