0 कोर्ट-कचहरी, चुनाव को लेकर कडुवा अनुभव कर रहे सदस्यगण
कोरबा। शीश के दानी खाटू वाले श्याम बाबा की स्वमेव उभरी प्रतिछाया वाले आस्था के स्थल श्री श्याम बाबा,मिशन रोड कोरबा का दरबार राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। खाटू वाले श्याम बाबा के प्रति भक्तों की श्रद्धा अपार है लेकिन वर्तमान में जो श्याम बाबा के नाम पर हो रहा है, श्री श्याम मित्र मंडल संस्था के द्वारा संचालन सुचारु रूप से करने की बजाय जिस तरह से राजनीति का अखाड़ा श्याम दरबार को बना लिया गया है उससे कई वरिष्ठ और कनिष्ठ सदस्य बेहद कड़वा अनुभव कर रहे हैं।
श्याम बाबा की कृपा से श्याम दरबार और श्याम मित्र मंडल ने अपनी पहचान बना ली है। आस्था और भक्ति का केंद्र श्याम दरबार बना हुआ है लेकिन जब बेवजह का विवाद खड़ा किया जाकर मंदिर और समिति को कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाना पड़ रहा है तो इसे अनेक लोगों ने उचित करार नहीं दिया है। वर्तमान में हाईकोर्ट के निर्देश के आधार पर चुनाव की प्रक्रिया फर्म्स एवं सोसायटी के द्वारा कराई जा रही है लेकिन इस चुनाव की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ खड़े हैं कि जिनका निर्वाचन कराया जाना है उन्हें छोड़कर अपनी तरह से चुनाव कराया जाना कितना न्याय संगत है? अनेक लोग तो यह भी मानते हैं कि श्याम दरबार का संचालन के लिए अक्सर विवादित रहने वाले व्यक्तियों को बिल्कुल भी अवसर नहीं देना चाहिए बल्कि ऐसे तटस्थ व्यक्ति को जिम्मेदारी सौंपी जाए जो इस तरह के प्रपंचों से, राजनीतिक गुणा-भाग से अलग रहता हो। 10 जुलाई को संस्था का चुनाव के संबंध में मतदान होना है, अध्यक्ष बनने की दौड़ में जो लोग शामिल हैं वह अपनी कोशिश से कर रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ सदस्यों का ऐसा मानना है कि मंदिर को हमेशा विवादों से दूर रखना चाहिए। यह आस्था और भक्ति का केंद्र बिंदु है ना कि चुनाव और राजनीति का अखाड़ा। मंदिर में लोग मानसिक, शारीरिक और आत्मिक शांति की अनुभूति करने के लिए आते हैं, बाबा के प्रति अगाध आस्था है लेकिन जब यह बातें प्रसारित होती है कि पद के लिए आपस में ही लड़ाई हो रही है तो आस्था का कमजोर पड़ना स्वाभिक हो जाता है। यह अलग बात है कि फिलहाल ऐसा नहीं हुआ है और श्याम भक्तों के साथ-साथ नगर जनों का प्रेम और आस्था बाबा के प्रति निरंतर बनी हुई है किंतु इसी तरह से अगर श्याम मित्र मंडल संस्था, समिति और मंदिर चुनावी प्रपंचों कोर्ट- कचहरी में उलझते रहे, चुनकर आने वाले लोग मंदिर को कोर्ट तक ले जाते रहे तो ऐसे लोगों से दूरियां बनाने में भी कोई परहेज नहीं है।
श्याम मित्र मंडल संस्था के वरिष्ठ जन भी मानते हैं कि जो हो रहा है वह उचित नहीं है। यह कोई लाभ वाली संस्था अथवा पद नहीं है, जो भी निर्वाचित होकर आता है वह पूरे मनोयोग से मंदिर को आगे बढ़ाने के लिए काम करने की सोचता है लेकिन जब इसमें मेरा-तेरा और चुनाव जीतकर आने की मंशा के साथ मनमानी करने की बात बलवती हो जाती है तो फिर आस्था का डगमगाना लाजिमी है।
चुनाव में अक्सर दो पहलू होते हैं एक पक्ष और दूसरा विपक्ष और दोनों ही एक-दूसरे पर हावी होना चाहते हैं फिर भले ही जिस काम के लिए चुने गए थे,वो हो या न हो,इसका फर्क उन्हें नहीं पड़ता। संस्था में निर्मित इस तरह के हालात में अधिकांश श्याम भक्त यही चाहते हैं कि तीसरे तटस्थ को लाया जाना चाहिए जो दोनों पक्ष का न हो। कोर्ट- कचहरी के प्रपंचों से मंदिर और समिति पूरी तरह से पृथक रहे, कोई भी मामला आपस में ही निपटाया और सुलझाया जाए। तटस्थ रहकर काम करने वाले को मौका दिया जाना चाहिए जो अपने कार्यकाल में मंदिर और संस्था के हित के बारे में ही सोचे न कि पद और आर्थिक लाभ का लोभी हो।



