👉🏻 मामला- पाम मॉल से जुड़े जमीन घोटाला का
👉🏻 कोतवाली में 5 साल से अज्ञात पर दर्ज है धारा 420,465,467, 468, 471 का अपराध
👉🏻 जानकारी छिपा रहा राजस्व विभाग,अधूरे दस्तावेजों पर टिकी पुलिस की जाँच
👉🏻 एक जमीन से जुड़ी जाँच में अलग-अलग नक्शा व प्रतिवेदन, कैसे..?
👉🏻 क्या सभी आरोपियों को बेनकाब कर गिरफ्तार कर पाएगी पुलिस..?
कोरबा। शहर के बहुचर्चित पाम मॉल जमीन घोटाला के मामले में नया पेंच आ गया है। पुलिस के द्वारा राजस्व विभाग से प्राप्त जानकारी और जांच प्रतिवेदन के आधार पर दोबारा न्यायालय में प्रस्तुत किए गए क्लोजर को फिर खारिज कर दिया गया है।साथ ही न्यायालय ने कहा है कि विवेचना कर आदेश के 30 दिवस के भीतर अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।
यह मामला अरुणिमा सिंह की भूमि खसरा क्रमांक 663/3 को लेकर है जिसे राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों द्वारा समय-समय पर कूटरचित दस्तावेज और नक्शा के माध्यम से पाम मॉल के भीतर होने के बावजूद मॉल से दूर बताया जाता रहा। पावर हाउस रोड मुख्य मार्ग से लगी यह जमीन रसूख के इशारे पर तत्कालीन राजस्व विभाग के कर्मियों और अधिकारियों के साजिश का शिकार होती रही है। काफी कोशिशों के बाद सिटी कोतवाली में वर्ष 2020 में अज्ञात आरोपियों के विरुद्ध गंभीर धाराओं में अपराध दर्ज तो कर लिया गया लेकिन बीते 5 वर्षों में आज तक पुलिस आरोपी तय नहीं कर पाई है और खात्मा प्रस्तुत कर अपना पल्ला झाड़ने की फिराक में लगातार लगी हुई है लेकिन, इन कोशिशों को झटका लगा है। वहीं अब बड़ा सवाल है कि क्या पुलिस तीसरी बार गहराई तक विवेचना करते हुए आरोपियों के नाम और उनके गिरेबां तक पहुंच पाएगी? क्या राजस्व विभाग इस पूरे जांच में पुलिस को निर्भीक/ईमानदाराना सहयोग दस्तावेजी साक्ष्य के तौर पर प्रदान करेगा या फिर से गुमराह किया जाएगा?
👉🏻 सात बिंदुओं पर कोर्ट ने मांगी जानकारी, चार बिंदुओं में दिया आश्चर्य की बात है कि मुख्य न्याययिक मजिस्ट्रेट(फ़ास्ट ट्रेक) ने पुलिस के पहले क्लोजर को 10 नवम्बर 2025 को खारिज करते हुए विभिन्न सात बिंदुओं पर जांच प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था। पुलिस ने इन सात बिंदुओं पर कोरबा तहसीलदार से जानकारी चाही थी लेकिन तहसीलदार ने चार बिंदुओं पर ही अपनी जांच खत्म कर दी तथा महत्वपूर्ण खसरा नंबर 338,339, 340 की मूल स्थिति व चौहद्दी और वर्ष 1954-55 के अनुसार यही स्थिति की जानकारी भी नहीं दी।
👉🏻 जो जमीन है ही नहीं,वह रिकार्ड में चढ़ी फिर हटी
तहसीलदार के प्रतिवेदन में यह भी खुलासा हुआ है कि मूल ख.नं. 363 का कुल रकबा 1.34 ए. है, जिसमें ख.नं. 363/1 रकबा 0.67 ए. नेतराम एवं ख.नं.363/2 रकबा 0.67 ए. विमला वगैरह के नाम से दर्ज है। इस प्रकार दोनों बटांकन का रकबा का योग मिसल रकबा के बराबर हो रहा है। ख.नं. 363/3 रकबा 0.039 हे० प्रार्थिया (अरुणिमा सिंह) के पिता रामगुलाम दुबे के नाम से कम्प्यूटर अभिलेख में दर्ज था, लेकिन ऐसा कोई वास्तविक खसरा या भूमि मौके पर मौजूद नहीं है। यह केवल कम्प्यूटर रिकार्ड में दर्ज था, इसीलिए अभिलेख शुद्धता हेतु त्रुटिपूर्ण ख.नं. 363/3 का विलोपन किया गया। बता दें कि यह वही भूमि है जिसे 2017 से 2018 के बीच 663/3 के स्थान पर बताकर कूटरचना का खेल खेला गया। फिर गड़बड़ी पकड़ में आने पर विलोपन किया गया। इसी जमीन के सामने खसरा न.340 भी बताकर खेला हुआ है।
👉🏻एक जमीन का दो सीमांकन कैसे..? न्यायालय ने दिया यह आदेश
कु. मयूरा गुप्ता, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, कोरबा ने 20 फरवरी 2026 को जारी आदेश में कहा है कि – थाना कोतवाली के अपराध क्र. 1085/2020 में उपलब्ध सीमांकन रिपोर्ट के अनुसार प्रार्थी(अरुणिमा सिंह) की भूमि खसरा नं० 663/3 की पूर्व दिशा में खसरा नं० 340/3 की भूमि होना प्रतिवेदित किया गया है, जबकि थाना कोतवाली के अपराध क्र. 464/2023 के अपराध में प्रार्थी राजेश कुमार विश्वकर्मा के द्वारा प्रस्तुत सीमांकन में खसरा नं. 340/3 की भूमि उपलब्ध नहीं होने का प्रतिवेदन प्रेषित किया गया है। इस प्रकार एक ही भूमि के संबंध में दो अलग-अलग सीमांकन प्रतिवेदन प्रेषित किए जाने से प्रतिवेदन में संदेह उत्पन्न होता है तथा आज दिनांक तक कलेक्टर के आदेश का भी परिपालन नहीं किया गया है, इसलिए उपरोक्त दस्तावेजों के अवलोकन उपरांत संतुष्टिप्रद विवेचना नहीं होने से खात्मा स्वीकृत किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। थाना प्रभारी को अग्रिम विवेचना हेतु पुनः आदेशित करते हुए यह निर्देश दिया जाता है कि आदेश दिनांक के 30 दिवस के भीतर अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करे।
🫵🏻 जाँच में पूर्ण सहयोग की बात कही अंकित ने
इस पूरे मामले में जहां पुलिस की जांच राजस्व विभाग के अधिकारियों द्वारा दी गई आधी-अधूरी जानकारी पर ही निर्भर रहती आई है, वहीं पीड़ित अरुणिमा सिंह के पुत्र अंकित सिंह ने फिर दोहराया है कि वह जांच में पुलिस को पूर्ण रूप से दस्तावेजी सहयोग देने के लिए तैयार हैं। हालांकि पहले भी उन्होंने प्रयास किया था लेकिन पुलिस ने उनकी सारी बातों को अनसुना कर दिया, तथापि अंकित सिंह ने कहा है कि यदि पुलिस चाहे तो वह उन सारे दस्तावेजों की उपलब्धता सुनिश्चित करेंगे जिन्हें राजस्व विभाग अनुपलब्ध होना बता रहा है।






