👉🏻 जिला से लेकर मुख्य न्यायाधिपति तक शिकायत
कोरबा। मूल रूप से प्राचार्य किंतु प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर पदस्य रहते हुए टीपी उपाध्याय के कामकाज को लेकर कई शिकायतों के बीच एक बड़ी शिकायत हुई है जिसमें उनके द्वारा एक शिक्षिका को निलंबित कर देने के बाद 90 दिन में भी निलंबन पत्र नहीं दिया गया। उसका मुख्यालय जानबूझकर करतला किया गया। इतना ही नहीं 90 दिन तक निलंबित रहने वाली इस आदिवासी महिला शिक्षिका को खण्ड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से जीवन निर्वाह भत्ता भी प्रदान नहीं किया गया। यह दोनों ही कृत्य शासन की गाइडलाइन के बिल्कुल विपरीत हैं और इसे लेकर पीड़िता ने जिला से लेकर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधिपति तक शिकायत की है। अब जबकि पीड़िता ने डीईओ को सूचना देते हुए मूल स्थान पर एकतरफ़ा कार्यभार ग्रहण कर लिया है तो उसे अन्य तरह से प्रताड़ित होना पड़ रहा है। रजिस्टर में हस्ताक्षर भी करने नहीं दिया जा रहा है। आखिर जिला शिक्षा विभाग में यह चल क्या रहा है?
पीड़िता श्रीमती पुष्पा कमल प्रधान पाठिका के पद पर कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी के पदोन्नति आदेश के तहत शासकीय प्राथमिक शाला बनखेता, संकुल-कोरकोमा 01, विखं-कोरबा में स्थायी एवं नियमित कर्मचारी के पद पर पदोन्नति होकर पदस्थ हुई है। उन्हें 24/11/2025 को डीईओ कार्यालय के आदेश क्रमांक/7710/शिका./ निलंबन /2025-26 कोरबा दिनांक 24/11/2025 के द्वारा बिना पक्ष जाने, सुने और समझे राजनीति से प्रभावित होकर निलंबित कर दिया गया है और आज पर्यंत तक निलंबन के बाद ना तो निलंबन आदेश का मूल प्रति मिला और ना ही जीवन निर्वाह भत्ता मिला। शिकायत दिनाँक तक निलंबन हुए 90 दिन से अधिक हो गया और सरकारी गाईड लाईन एवं उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली के दिए आदेशानुसार 90 दिन के अंदर आरोप पत्रादि का वितरण संबंधित निलंबित कर्मचारी को अवश्य कर देना चाहिए जो कि आज तक नहीं दिया गया और ना ही किसी भी प्रकार के विभागीय जाँच प्रारंभ करने की सूचना मिली है जिससे वह अपना पक्ष नही रख पा रही हैं। कई पत्र के माध्यम से अपनी बात कहने व रखने का अवसर लेने प्रयास भी किया लेकिन उस पत्र पर आज पर्यंत तक की गई कोई प्रतिक्रिया की सूचना विधिवत नहीं मिली है। इससे ऐसा लगता है कि विभाग जानबूझकर पीड़िता को व्यक्तिगत टारगेट बना रहा है जो कि उचित नहीं है। पीड़िता ने न्यायालयों में झूठे शपथ पत्र देने व गुमराह करने वाले अधिकारियों के विरूद्ध उच्च कार्यालय पत्राचार किया था जिससे पूर्वाग्रह होकर उसे निलंबित किया गया और सभी मूलभूत अधिकारों से वंचित कर उसके प्रकरण में नैसर्गिक न्याय का उल्लंघन भी किया गया है और सिविल सेवा आचरण संहिता अधिनियम के तहत् आरोप पत्र, निलंबन आदेश और उससे संबंधित दस्तावेज प्रदाय नहीं किया गया है।
👉🏻 निलम्बन को लेकर यह है नियम
सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश क्रमांक सी-6.2/92/3/1 दिनांक 20-05-1992 के द्वारा (सिविल सेवा अधिनियम नियंत्रण, वर्गीकरण एवं अपील 1966) में उल्लेखित है कि “यदि कर्मचारी को 45/90 के भीतर आरोप पत्रादि का वितरण नहीं किया जाता है तो निलंबन आदेश प्रतिसंहत (Revoked) हो जाएगा और ऐसी स्थिति में संपूर्ण निलंबन अवधि समस्त प्रयोजनों के लिए ड्यूटी अवधि मानी जाएगी।”
निलंबन के बाद ना तो निलंबन आदेश की मूल प्रति मिली और ना ही जीवन निर्वाह भत्ता मिला। मैंने इस संबंध में आरोप पत्र, निलंबन आदेश प्राप्त करने संबंधित कार्यालय लिखित पत्राचार भी किया लेकिन एक भी पत्र का कोई जवाब नहीं मिला।
👉🏻 संभाग आयुक्त से बीईओ की शिकायत
पीड़िता ने बताया कि म०प्र० / छ०ग० सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1966 के सरल क्रमांक 9 में निलंबन काल में शासकीय सेवकों को निर्वाह भत्ता देने के संबंध में शासन का स्पष्टीकरण है कि “शासन द्वारा इस संबंध में पूर्व में निकाले गए अनुदेशों की प्रतियां संलग्न कर यह स्पष्ट किया जाता है कि निलंबित शासकीय सेवक के निर्वाह भत्ते से वित्त विभाग के ज्ञापन क्रमांक 2105-2536-चार-आर-5, दिनांक 23 नवंबर 1959 2107-1370-चार 5, दिनांक 28 सितंबर 1960 तथा 224-4-नि-3सी.आर/1-एक-15 (सी)-5-73 आर-तीस, दिनांक 29 जनवरी 1975 में उल्लेखित कटौतियों को छोड़कर किसी प्रकार की कटौती नहीं की जा सकती है और न ही निर्धारित मुख्यालय से बिना अनुमति प्राप्त किए अनुपस्थिति रहने के कारण निर्वाह भत्ता रोका जा सकता है।”
पीड़िता ने निवेदन किया है कि अपने अधीनस्थ सभी सक्षम प्राधिकारियों से इस अनुदेश का पालन कड़ाई से कराएँ तथा शासन के आदेश उल्लंघन करने पर जिम्मेदार अधिकारी के विरूद्ध कठोर कार्यवाही करें।






