👉🏻 न डीएमएफ की नजर पड़ रही, न विभागीय मद की…
👉🏻 दो उफनती नदियों के बीच हर बारिश में कैद हो जाता है पूरा गांव
👉🏻 ग्रामीणों ने दी चुनाव बहिष्कार की चेतावनी
कोरबा-पोड़ी उपरोड़ा। लोकतंत्र में जनता अपने वोट से नेताओं की तकदीर बदलती है, इस उम्मीद के साथ कि उनकी अपनी तकदीर भी बदलेगी। चुनाव दर चुनाव अमहवा गांव के लोगों ने भी विकास के सपनों के साथ मतदान किया, सरकारें बदलीं, सांसद-विधायक बदले, सत्ता कांग्रेस से भाजपा और भाजपा से कांग्रेस के बीच बदलती रही, लेकिन नहीं बदली तो अमहवा की तस्वीर। हर बरसात में दो उफनती नदियों के बीच कैद हो जाने वाले इस गांव की सबसे बुनियादी जरूरत-एक पुल और सड़क-आज भी अधूरी है। बड़े-बड़े विकास कार्यों और करोड़ों की योजनाओं के बीच अमहवा जैसे छोटे गांव की बड़ी पीड़ा लगातार अनदेखी होती रही। न कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों ने इसे प्राथमिकता दी, न भाजपा के निर्वाचित प्रतिनिधियों ने। नतीजा यह है कि हर मानसून के साथ यहां की जिंदगी थम जाती है और ग्रामीण फिर उसी दर्द, डर और बेबसी के साथ जीने को मजबूर हो जाते हैं।
👉🏻 दावे कटघरे में…
जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर पोंडी उपरोड़ा विकासखंड के ग्राम पंचायत पचरा के आश्रित गांव अमहवा की कहानी विकास के उन दावों पर सवाल खड़े करती है, जिनमें अंतिम व्यक्ति तक सुविधाएं पहुंचाने की बात कही जाती है।खनिज संपदा से मालामाल कोरबा जिले में विकास के बड़े-बड़े दावे हर साल किए जाते हैं। जिला खनिज न्यास (DMF) से करोड़ों रुपये की योजनाएं स्वीकृत होती हैं, सड़क, पुल और बुनियादी सुविधाओं के आंकड़े गिनाए जाते हैं। लेकिन ग्राम अमहवा की तस्वीर इन तमाम दावों को कठघरे में खड़ा कर देती है।
👉🏻 हर मानसून के साथ ठहर जाती है जिंदगी
यहां हर मानसून के साथ जिंदगी ठहर जाती है और पूरा गांव दो नदियों के बीच एक टापू बनकर रह जाता है। गांव के दोनों ओर बहने वाली कटोरी नदी और तान नदी बारिश में उफान पर आ जाती हैं। पानी बढ़ते ही गांव का बाहरी दुनिया से संपर्क पूरी तरह टूट जाता है। पिछले कई दिनों से ग्रामीण घरों में कैद जैसी जिंदगी जी रहे हैं। गांव तक पहुंचने का न तो पक्का पुल है और न ही सुरक्षित सड़क।
👉🏻 जोखिम उठाना नियति बनी
ग्रामीण बताते हैं कि बारिश के दिनों में राशन, दवा, बाजार या किसी भी जरूरी काम के लिए नदी पार करना मजबूरी बन जाती है। तेज बहाव के बीच एक-एक कदम जान हथेली पर रखकर बढ़ाना पड़ता है। कई बार लोग घंटों पानी उतरने का इंतजार करते हैं, लेकिन जरूरत के आगे जोखिम उठाना उनकी नियति बन चुकी है।
👉🏻 पढ़ाई भी पानी के भरोसे
अमहवा के बच्चों को शिक्षा के लिए करीब आठ किलोमीटर दूर जटगा जाना पड़ता है। बारिश शुरू होते ही स्कूल जाने का रास्ता बंद हो जाता है। कई बच्चे दिनों तक स्कूल नहीं पहुंच पाते, जबकि कुछ छात्र अपनी पढ़ाई बचाने के लिए उफनती नदी पार करने का जोखिम उठाते हैं। अभिभावकों के लिए हर दिन बच्चों की सुरक्षित वापसी चिंता का विषय बनी रहती है।
👉🏻बीमार पड़ना मतलब नई मुसीबत
स्वास्थ्य सुविधाओं की हालत और भी बदतर है। गांव तक एम्बुलेंस नहीं पहुंच सकती। किसी मरीज या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाना हो तो पहले उसे किसी तरह नदी तक लाना पड़ता है, फिर पानी का बहाव कम होने का इंतजार या जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ती है। ग्रामीण बताते हैं कि इलाज में देरी की कीमत गांव पहले भी चुका चुका है। पिछले वर्ष समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाने के कारण एक युवक की जान चली गई थी।
👉🏻वादे बहुत, काम एक भी नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि पुल और सड़क की मांग कोई नई नहीं है। वर्षों से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के सामने यह समस्या रखी जा रही है। वर्तमान सांसद ज्योत्सना महंत, तत्कालीन विधायक मोहितराम केरकेट्टा और वर्तमान विधायक तुलेश्वर मरकाम गांव पहुंचकर आश्वासन दे चुके हैं। जिला प्रशासन को भी कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन हर बार सिर्फ भरोसा मिला, समाधान नहीं।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब जिले में डीएमएफ और विभिन्न विभागों के माध्यम से विकास कार्यों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तब अमहवा जैसे गांव की सबसे जरूरी जरूरत एक पुल और सड़क, आज तक प्राथमिकता क्यों नहीं बन सकी?
👉🏻अब वोट नहीं, पहले विकास
लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि अगले चुनाव से पहले पुल और सड़क निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो पूरा गांव चुनाव का बहिष्कार करेगा। उनका कहना है कि हर चुनाव में नेता वोट मांगने पहुंचते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही गांव फिर अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है। इस बार बिना विकास के किसी भी नेता का स्वागत नहीं होगा।
👉🏻 क्या, बनेंगे कागजों में कहानी..?
लोकतंत्र में वोट की ताकत से सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन अमहवा के लोगों के लिए हर बरसात वही पुराना इम्तिहान लेकर आती है। जब तक पुल नहीं बनेगा, तब तक विकास के दावे इस गांव के लिए सिर्फ कागजों की कहानी ही रहेंगे।” अमहवा के लोग नेताओं की तकदीर बदलते रहे, लेकिन अपनी तकदीर बदलने के लिए आज भी एक पुल और सड़क का इंतजार कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या अगला चुनाव भी सिर्फ वादों का पुल बनाएगा, या इस बार गांव तक सचमुच पुल पहुंचेगा?”





