कोरबा। भारत के इतिहास में छात्र केवल शिक्षा प्राप्त करने वाले युवा नहीं रहे हैं, बल्कि वे सामाजिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक चेतना के सबसे सशक्त वाहक रहे हैं। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर गुजरात नव निर्माण आंदोलन, बिहार के जेपी आंदोलन, मंडल आंदोलन और शिक्षा से जुड़े अनेक जन आंदोलनों तक छात्रों ने देश की राजनीति और समाज को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
1905 के बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन में छात्रों ने स्वदेशी आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाया। 1920 के असहयोग आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में हजारों विद्यार्थियों ने पढ़ाई छोड़कर देश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया। 1965 के तमिलनाडु भाषा आंदोलन, 1974 के गुजरात नव निर्माण आंदोलन और बिहार के जेपी आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि जब छात्र संगठित होकर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण ढंग से अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो सरकारों को भी जनता की बात सुननी पड़ती है।
ऊर्जाधानी भूविस्थापित किसान कल्याण समिति,कोरबा के अध्यक्ष सपुरन कुलदीप ने मौजूदा घटनाक्रमों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि आज देश के सामने शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताएँ, बढ़ती फीस और युवाओं के भविष्य से जुड़े अनेक गंभीर प्रश्न हैं। ऐसे समय में छात्रों की लोकतांत्रिक भागीदारी पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो जाती है।
इसी संदर्भ में इस वर्ष जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र-युवा आंदोलन भी व्यापक चर्चा का विषय बना है। इस आंदोलन ने शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर फिर से केंद्र में लाने का प्रयास किया है। इसके समर्थकों का मानना है कि इससे युवाओं में जागरूकता बढ़ी है और देश में सकारात्मक बदलाव की एक नई उम्मीद जगी है। साथ ही, किसी भी आंदोलन के प्रभाव का अंतिम आकलन समय, उसके परिणामों और नीतिगत परिवर्तनों के आधार पर ही किया जा सकेगा।
दुर्भाग्य से आज कुछ राजनीतिक लोग यह कहते हैं कि “छात्रों को राजनीति से दूर रहना चाहिए।” यह एक अधूरी और भ्रामक अवधारणा है। यदि राजनीति का अर्थ किसी राजनीतिक दल का प्रचार करना है, तो शिक्षा संस्थानों को उससे दूर रहना चाहिए। लेकिन यदि राजनीति का अर्थ संविधान, लोकतंत्र, जननीतियों, अधिकारों और सरकार से जवाबदेही मांगने की समझ विकसित करना है, तो छात्रों को उससे दूर रखने की बात लोकतंत्र की भावना के विपरीत है।
विडंबना यह है कि जिन अनेक नेताओं की राजनीतिक यात्रा स्वयं छात्र आंदोलनों और छात्र राजनीति से शुरू हुई, वही आज युवाओं को राजनीति से दूर रहने की सलाह देते हैं। इतिहास गवाह है कि छात्र आंदोलनों ने देश को अनेक जननेता, सामाजिक कार्यकर्ता और विचारक दिए हैं।
यह भी आवश्यक है कि छात्र आंदोलन हमेशा शांतिपूर्ण, संवैधानिक और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर संचालित हों। हिंसा, तोड़फोड़ और नफरत किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमज़ोर करती है, जबकि शांतिपूर्ण संघर्ष समाज का व्यापक समर्थन प्राप्त करता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं की आवाज़ को दबाने के बजाय उसे सुना जाए। यदि जंतर-मंतर से उठी यह चेतना देशभर के छात्रों और युवाओं को शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मुद्दों पर लोकतांत्रिक तरीके से संगठित करती है, तो यह भारत के लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत हो सकता है। इतिहास बताता है कि जब युवा जागते हैं, तो परिवर्तन की संभावनाएँ भी मजबूत होती हैं। इसलिए उम्मीद की जा सकती है कि यह नई जागरूकता देश को अधिक जवाबदेह, न्यायपूर्ण और भविष्य उन्मुख व्यवस्था की ओर ले जाने में योगदान देगी।
विशेष लेख: छात्र आंदोलन का स्वर्णिम दौर और नई उम्मीद….








