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अब इसे चोरी कहेंगे या डाका,सजा 2 साल हो या 5 साल…इनको फर्क नहीं पड़ता

Admin
Last updated: 02/10/2023 7:58 PM
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7 Min Read
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0 बेलचा-फावड़ा नहीं,जेसीबी ही उतार दिया घाट पर
कोरबा। जब अवैधानिक कार्य करने वालों में शासन और प्रशासन का भय खत्म हो जाए तो वह निरंकुशता पर उतर आता है। कुछ इसी तरह की निरंकुश कार्यप्रणाली का प्रदर्शन खनिज की चोरी नहीं बल्कि डाका डालने वाले कर रहे हैं।

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      एक वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आया है जिसमें रेत के अवैध कारोबार में संलिप्त व्यक्ति के द्वारा उपस्थित रहकर न सिर्फ मजदूर लगाकर बल्कि जेसीबी के जरिए नदी घाट से रेत को खुदवा कर एक,दो नहीं बल्कि कई ट्रैक्टरों में लदवाया जा रहा है। दोपहर बाद इसे अंजाम दिया जा रहा है। इस कार्य से इतना तो है कि इन्हें हाईकोर्ट के निर्देश के बाद 2 साल या 5 साल की सजा का कोई भी भय नहीं है।
      कोरबा जिले के सीतामणी के आगे इमलीडुग्गु से लगे भिलाईखुर्द क्षेत्र जो कि सिटी कोतवाली और उरगा थाना की अंतिम व प्रारम्भिक सीमा पर है, में हसदेव नदी पर निर्माणाधीन पुल के पास रेत का दिनदहाड़े डाका देखा जा सकता है। यहां मानव श्रम के साथ जेसीबी भी लगाया गया है।
      जिस स्थान पर रेत की अवैधानिक खुदाई कराया जाकर ट्रेक्टरों में लोडिंग कराया जा रहा है वह निर्माणाधीन रेलवे पुल से काफी नजदीक है। पुल निर्माण से जुड़े जानकार अधिकारी बताते हैं कि स्पॉन से लगभग 100 मीटर के दायरे में रेत का खनन नहीं होना चाहिए, ऐसा तकनीकी तौर पर माना जाता है। खनन से स्पॉन के कमजोर होने, खिसकने व टूटने का खतरा बना रहता है लेकिन रेत की चोरी कर रहे इस शख्स को इन सबसे कोई मतलब नहीं।

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      बताया जा रहा है कि यह वही शख्स है जिसके द्वारा कुछ माह पहले सीतामढ़ी के रेट घाट से अवैधानिक रेत खनन करने के दौरान यहां दफन लाशों और कब्रों को भी खोद दिया गया था। जिनके दिवंगत परिजन यहां दफन किए गए थे उनके द्वारा इस मामले में आक्रोश जाहिर करते हुए शिकायत की गई तो पुलिस ने भी यहां पहुंच कर जांच किया था लेकिन बाद में मामला रफा-दफा हो गया और मामूली से धारा पर कार्रवाई कर इतिश्री कर ली गई। सज्जाद/शहजाद नाम के इस शख्स ने अब सीधे तौर पर हाई कोर्ट के आदेश और कोरबा कलेक्टर के उसे निर्देश को आंख दिखाया है जिसमें पिछले दिनों ही बड़े-बड़े बोर्ड घाटों के आसपास लगवाए गए कि अवैधानिक रूप से रेत का खनन/परिवहन करते हुए पाए जाने पर 2 साल से 5 साल की सजा हो सकती है। अब इसमें बड़ा झोल यही है कि जांच पड़ताल के दौरान मौके पर अमले को कोई भी नहीं मिलेगा तो आखिर करवाई किस पर की जाए? इसके लिए सोशल मीडिया में वायरल हो रहे फोटो और वीडियो को आधार बनाकर प्रशासन चाहे तो सख्त से सख्त कार्रवाई कर सकता है जो रेत के अवैध कारोबारियों के लिए सबक भी होगा। बाकी सारा कुछ प्रशासन के अधिकारियों के मूड पर निर्भर करता है,वरना कानून की तो धज्जियां उड़ाई ही जा रही हैं। अवैध खनन और परिवहन पर 2 से 5 साल की सजा का बोर्ड लगाकर क्रियान्वयन कराना भूल गए हैं। एनजीटी,हाईकोर्ट, जिला प्रशासन,आदेश- निर्देश सब दरकिनार हैं…।
      0 खुलने चाहिए सरकारी रेत घाट
      इन सबके बीच यह भी एक चिंतन और मनन का विषय है कि रेत घाटों को मंजूरी नहीं दी जा रही है। नगरीय निकायों के द्वारा घाटों का संचालन तथा पंचायत क्षेत्र में पंचायत को संचालन का अधिकार दिया जाना चाहिए। रेत खनन और भंडारण की मंजूरी नहीं मिलने के कारण अवैध कारोबारियों को कहीं ना कहीं इस बात से प्रश्रय मिल रहा है कि वह रेत की आपूर्ति करके समाजसेवा कर रहे हैं बल्कि वे इसकी आड़ में बड़े पैमाने पर काली कमाई कर रहे हैं। जो रेत सरकारी दर पर प्रति ट्रेक्टर 500 में मिलनी चाहिए उसे खरीदने के लिए तीनसे ₹5000 खर्च करना पड़ रहा है। यदि खनन और भंडारण की अनुमति शासन द्वारा प्रदान कर दी जाए तो इस तरह की समस्याओं और आर्थिक चोट से जनता को छुटकारा मिल जाएगा तथा रुके हुए शासकीय, अर्थशासकीय और निजी निर्माण कार्यों को भी गति मिलेगी। चुनिंदा रेत चोरों ने तो रेत बेच बेचकर लाखों की कमाई अर्जित कर ली है, यदि इनके कारोबार के कार्यकाल में जांच पड़ताल कर ली जाए तो बड़ा आर्थिक रहस्य उजागर हो सकता है।

      0 ट्रैक्टरों की खरीदी और उपयोग भी जांच का विषय

      अवैध रेत का कारोबार चल निकलने पर इससे जुड़े कई लोगों ने नए-नए ट्रैक्टर हाथों-हाथ खरीदे हैं। ऐसे में ट्रैक्टर एजेंसी में पिछले साल-डेढ़ साल के भीतर जब खरीदी उफान पर रही है तब खरीदी के रिकॉर्ड की जांच होनी चाहिए। वैसे कृषि फार्म के नाम पर कृषि कार्य के लिए ट्रैक्टर खरीदा जाता है जिसमें संभवत: सब्सिडी का भी लाभ लिया जाता होगा लेकिन अनेक ट्रैक्टरों का उपयोग कृषि कार्यों के लिए ना किया जाकर रेत की चोरी और ढुलाई में लिया जा रहा है। रेत के साथ-साथ मिट्टी की ढुलाई में भी इनका उपयोग ज्यादातर हो रहा है। अक्सर हरे रंग के ट्रैक्टर शहर की सड़कों पर तो लाल रंग के ट्रैक्टर ग्रामीण सड़कों पर दौड़ते हुए नजर आते हैं। अधिकांश वाहनों में नंबर प्लेट नहीं होते तो कई में हाथ से लिखा हुआ नंबर प्लेट नजर आ जाता है। इन सब की सत्यता की भी पड़ताल जरूरी है।

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              Saty Sanwad

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