0 संत श्री रविदास की 650वीं जयंती: विशेष लेख- सपुरन कुलदीप
“मन चंगा तो कठौती में गंगा”— संत रविदास जी का यह संदेश अपने आप में उस सोच पर प्रहार करता है, जिसमें बाहरी आडंबर और दिखावे को मन की पवित्रता से बड़ा मान लिया जाता है।
कठौती में रखा साधारण पानी और गंगा के पवित्र जल के बीच संत रविदास ने जो अंतर मिटाया, वह केवल धार्मिक प्रतीक नहीं था। यह उस सामाजिक मानसिकता को चुनौती थी, जो इंसान की पवित्रता और प्रतिष्ठा को उसकी जाति, जन्म और सामाजिक हैसियत से तय करती थी।
संत रविदास ऐसे दौर में सामने आए, जब जाति-व्यवस्था और छुआछूत ने समाज में गहरी असमानता पैदा कर रखी थी। जन्म के आधार पर मनुष्य की सामाजिक हैसियत तय होती थी। कुछ लोगों को ऊँचा और कुछ को नीचा माना जाता था। मंदिर, सार्वजनिक संसाधन, सामाजिक जीवन और धार्मिक अधिकारों तक पहुँच में भी भेदभाव मौजूद था।
रविदास जी ने इसी व्यवस्था के बीच खड़े होकर मनुष्य की बराबरी की बात कही।
उनका संदेश था कि मनुष्य की महानता जन्म से नहीं, उसके कर्म और मानवीयता से होती है।
यही कारण है कि रविदास केवल एक संत नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के महत्वपूर्ण स्वर बनकर सामने आते हैं।
सदियाँ बीत गईं, सवाल आज भी बाकी है
आज हमारा संविधान छुआछूत को पूरी तरह समाप्त घोषित करता है। संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करता है और उसके किसी भी रूप को अपराध मानता है।
लेकिन कानून बदल जाने मात्र से समाज की मानसिकता हमेशा नहीं बदलती।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2023 के आँकड़ों के अनुसार, अनुसूचित जातियों के खिलाफ 57,789 मामले दर्ज हुए। 2022 में यह संख्या 57,582 थी। यानी कानून और संवैधानिक अधिकारों के बावजूद जाति-आधारित अपराधों का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ है।
और जातिवाद हमेशा हिंसा के रूप में ही सामने नहीं आता।
कहीं सार्वजनिक स्थानों पर भेदभाव की शिकायत होती है, कहीं मंदिर में प्रवेश को लेकर विवाद होता है, कहीं सामाजिक बहिष्कार की शिकायत सामने आती है और कहीं जाति के आधार पर व्यक्ति की सामाजिक हैसियत तय करने की कोशिश होती है।
हाल ही में तमिलनाडु के करूर जिले में अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों ने एक मंदिर के वार्षिक उत्सव के दौरान प्रवेश से रोके जाने का आरोप लगाया और विरोध प्रदर्शन किया। प्रशासन ने मामले में हस्तक्षेप कर जाँच शुरू की।
पंजाब के पटियाला जिले में भी 2026 में कुछ दलित परिवारों ने सामुदायिक जमीन के विवाद को लेकर सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के आरोप लगाए; प्रशासन ने जाँच के आदेश दिए। हालांकि स्थानीय पंचायत ने आरोपों को राजनीतिक विवाद बताया।
इन घटनाओं का उल्लेख इसलिए जरूरी है क्योंकि ये हमें याद दिलाती हैं कि रविदास जी का सवाल केवल इतिहास का सवाल नहीं है; वह आज के समाज का भी सवाल है।
फिर अचानक रविदास जी इतने याद क्यों आने लगे?
650वीं जयंती के अवसर पर संत रविदास के नाम पर देशभर में कार्यक्रम, यात्राएँ और धार्मिक आयोजन हो रहे हैं। हरियाणा सरकार ने भी 650वें प्रकाश पर्व को 2027 में व्यापक रूप से मनाने की घोषणा की है और वाराणसी से रविदास जी की जन्मभूमि की पवित्र मिट्टी वाला कलश लाने की बात कही है। कार्यक्रम में वरिष्ठ भाजपा नेताओं की भागीदारी भी प्रस्तावित की गई है।
धार्मिक और सामाजिक आयोजनों का होना अपने आप में कोई समस्या नहीं है।
सवाल आयोजन का नहीं, आयोजन के पीछे की राजनीति का है।
जब कोई राजनीतिक दल किसी संत, महापुरुष या सामाजिक सुधारक को याद करता है, तो यह भी देखना चाहिए कि वह उनके विचारों को अपनी राजनीति और नीतियों में कितना स्थान देता है।
क्योंकि संत रविदास को याद करना केवल उनके चित्र पर माला चढ़ाना नहीं है।
रविदास को याद करना है तो उस सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देनी होगी, जिसमें किसी इंसान को उसके जन्म के कारण छोटा समझा जाता है।
राजनीति का भी अपना मौसम विज्ञान है
भारतीय राजनीति का मौसम बड़ा दिलचस्प है।
चुनाव नजदीक आते ही महापुरुषों की तस्वीरें बड़ी हो जाती हैं।
जयंती के कार्यक्रम बढ़ जाते हैं।
मंच सजते हैं।
मालाएँ लंबी होती हैं।
कलश यात्राएँ निकलती हैं।
और भाषणों में अचानक सामाजिक न्याय की गंगा बहने लगती है।
लेकिन सवाल यह है कि चुनाव के बाद उस गंगा का पानी कहाँ चला जाता है?
जिस समाज को वर्षों से शिक्षा, रोजगार, जमीन, सम्मान और समान अवसर की जरूरत है, उसके सवाल कितनी प्राथमिकता से उठाए जाते हैं?
रविदास जी की मूर्ति पर फूल चढ़ाना आसान है,
उनके विचारों को व्यवस्था में उतारना कठिन।
कठौती में गंगा खोजने वाले संत के नाम पर अगर केवल कलश यात्रा निकाली जाए, लेकिन समाज में मौजूद भेदभाव को समाप्त करने के लिए ठोस काम न हो, तो यह रविदास के संदेश की आत्मा के साथ न्याय नहीं होगा।
“ऐसा चाहूँ राज मैं…” का असली अर्थ
संत रविदास का प्रसिद्ध विचार है—
“ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न।”
यह केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज की कल्पना है—ऐसी व्यवस्था जहाँ किसी को भूखा न रहना पड़े, किसी के साथ जन्म के आधार पर भेदभाव न हो और हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार मिले।
आज रविदास जी की 650वीं जयंती मनाने वालों से यही सवाल पूछा जाना चाहिए—
क्या हम ऐसा समाज बना रहे हैं?
क्या गरीब बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है?
क्या वंचित समाज के युवाओं को रोजगार के समान अवसर मिल रहे हैं?
क्या जाति के कारण होने वाला सामाजिक बहिष्कार समाप्त हुआ?
क्या सार्वजनिक स्थानों और धार्मिक स्थलों पर सभी को समान अधिकार मिल रहा है?
क्या किसी व्यक्ति का सम्मान उसके नाम और जाति से नहीं, उसके इंसान होने के आधार पर होता है?
अगर इन सवालों का जवाब अभी भी पूरी तरह “हाँ” नहीं है, तो रविदास जी के विचारों की जरूरत आज भी उतनी ही है जितनी सदियों पहले थी।
रविदास की जयंती: उत्सव से आगे बढ़कर आत्ममंथन
संत रविदास की जयंती मनाइए।
कलश यात्रा निकालिए।
उनकी प्रतिमा पर पुष्प चढ़ाइए।
भजन गाइए।
कार्यक्रम कीजिए।
लेकिन उसके साथ एक काम और कीजिए—
अपने भीतर और अपने समाज में मौजूद जाति के अहंकार को खोजिए।
क्योंकि रविदास जी का संदेश यही था कि पवित्रता बाहर के पानी में नहीं, मनुष्य के मन और व्यवहार में होती है।
मन चंगा तो कठौती में गंगा।
इसलिए यदि मन में जाति का अहंकार है, दूसरे मनुष्य के प्रति घृणा है, छुआछूत है, भेदभाव है और कमजोर को कमजोर समझने की मानसिकता है, तो सिर पर रखा कलश भी उस मन की गंदगी को साफ नहीं कर सकता।
और यही आज की राजनीति के लिए सबसे बड़ा सवाल है—
क्या रविदास जी केवल चुनावी पोस्टर पर रहेंगे,
या उनके विचार सत्ता और समाज की नीतियों में भी दिखाई देंगे?
क्योंकि रविदास की जयंती का सबसे बड़ा उत्सव वह दिन होगा,
जब किसी बच्चे से उसकी जाति पूछकर उसकी क्षमता तय नहीं की जाएगी,
जब किसी इंसान को छूने से कोई अपवित्र नहीं होगा,
जब मंदिर, स्कूल, पानी, जमीन और अवसर पर सबका समान अधिकार होगा,
और जब इंसान की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसकी इंसानियत से होगी।
तब शायद संत रविदास सचमुच मुस्कुराएँगे और कहेंगे—
“अब मेरे नाम पर केवल यात्रा नहीं निकल रही,
मेरे विचार समाज में चल रहे हैं”
वरना हर साल जयंती आएगी,
मंच सजेंगे, भाषण होंगे, मालाएँ चढ़ेंगी, तस्वीरें वायरल होंगी…
और रविदास का सवाल वहीं खड़ा रहेगा—
“मेरे नाम पर इतना कुछ कर रहे हो,
मेरे विचारों पर थोड़ा चल भी लेते तो समाज कैसा होता?”







