👉🏻 शहर के सौंदर्यीकरण को खराब करते बैनर-पोस्टर, चौराहों पर भी समस्या
कोरबा। कोरबा शहर और इससे लगे व्यस्त इलाकों पावर हाउस रोड, टीपी नगर, सीएसईबी, बुधवारी, निहारिका मार्ग को व्यवस्थित और सुसज्जित करने के साथ ही सौंदर्यीकरण करने के लिए लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। सौंदर्यीकरण करने का उद्देश्य शहर को हरा-भरा बनाने के साथ-साथ सुंदर दिखाने का भी है किंतु सौंदर्यीकरण के चार चांद में अवैधानिक रूप से लगाए जाने वाले बैनर, पोस्टर, फ्लेक्स दाग लगा रहे हैं।
जगह-जगह सड़क के बीच, सड़क के किनारे, लैम्प पोस्ट, पेड़ -पौधों, रेल्वे के खम्भों, बिजली के खम्भों सहित चौक-चौराहा पर बैनर, फ्लेक्स लगाये जाने के कारण जहां वाहन चालकों को ध्यान भटकने से दिक्कत होती है तो वहीं सौंदर्यीकरण की सुंदरता भी खराब नजर आती है। किसी विशेष अवसर/खास आयोजन पर लगाए जाने वाले बैनर, फ्लेक्स, पोस्टर को समर्थकों और शुभचिंतकों सहित परिक्रमाकारियों के द्वारा लगवा तो दिया जाता है लेकिन इसके बाद उतारने की कोई जिम्मेदारी महसूस नहीं की जाती।
इसकी वजह से हालात ऐसे रहते हैं कि कई बैनर, पोस्टर तो 15-15 दिन तक तो कुछ महीने तक लगे रहते हैं। भले ही मौसम की मार और गुणवत्ताहीन निर्माण,कमजोर बंधान के कारण यह फटेहाल ही क्यों ना हो जाएं। कुछ ऐसे ही फटे हाल बधाई संदेश का नजारा वर्तमान में शहर के चौक-चौराहे और सौंदर्यीकरण वाले क्षेत्र में नजर आ रहा है।
पिछले दो-तीन दिनों से खराब होते मौसम और आंधी तूफान ने इन बधाई संदेशों की हालत खराब कर दी है। कोई लकड़ी/टीन के फ्रेम का साथ छोड़ चुके हैं तो कई बैनर, पोस्टर फट चुके हैं, कई आड़े-तिरछे,उल्टे लटकते नजर आ रहे हैं, इनकी सुंदरता खत्म हो चुकी है फिर भी यह अपने स्थान पर टिके हैं। सड़क के बीच डिवाइडरों में तो आलम यह है कि खम्भों पर एक पोस्टर के ऊपर दूसरा, दूसरे के ऊपर तीसरा,तीसरे के ऊपर चौथा पोस्टर लगाया जा रहा है। कभी किसी संस्था के द्वारा अपने प्रचार के लिए तो कभी बधाई तो कभी किसी आयोजन के लिए पोस्टर पर पोस्टर लगाने की होड़ सी मची रहती है।

👉🏻 सवाल है कि आखिर जिनकी जिम्मेदारी इन्हें लगवाने की रहती है वे भला विशेष दिवस/खास आयोजन के गुजर जाने के बाद इनको उतरवाने में उदासीनता क्यों दिखाते हैं। ऐसा लगता है कि जब तक चीथड़े न उड़ जाएं, तब तक इनका पैसा वसूल नहीं होता।
ऐसे हालत में नगर निगम पर ही अतिरिक्त भार पड़ता है कि वह अपने वाहनों में डीजल फूँकवा कर, कर्मचारी लगवा कर सारे बैनर, फ्लेक्स को उतरवाए। अपने नेताओं के प्रति कार्यकर्ता और पदाधिकारियों की श्रद्धा जायज है किंतु उनका सम्मान करने के बाद फटेहाल बैनर,पोस्टर के जरिए तथाकथित अपमान से बचाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की ही होती है। बुरा तो तब लगता है जब नेताओं के बैनर, फ्लेक्स पर चौक-चौराहे में लगे बैनर पर पान की पीकें छप जाती हैं। क्या यह अपमानजनक दृश्य पदाधिकारियों/ समर्थकों को नजर नहीं आता…?
👉🏻खास अवसरों और विशेष आयोजनों को लेकर लगाए जाने वाले बैनर, पोस्टर पर ऐतराज नहीं है लेकिन इन्हें लगाने के बाद उतरवाने के जिम्मेदारी और लगाए जाने की अवधि का निर्धारण एवं पालन सख्ती से कराए जाने की जरूरत जरूर है।








