👉🏻 रेंजर मृत्युंजय शर्मा ने काम पर लगाया था, कोई रिकार्ड मेन्टेन नहीं
👉🏻 न सुरक्षा, न दुर्घटना बीमा, मजदूर की जान जोखिम में
कोरबा। कोरबा वन मंडल के कोरबा रेंज अंतर्गत आने वाले ग्राम भुलसीडीह में भ्रष्टाचार का वॉच टावर की सीढ़ी ढह गई। सीढ़ी पर खड़े हो कर काम कर रहा मजदूर गिर पड़ा और गंभीर रूप से घायल हो गया। रेंजर मृत्युंजय शर्मा की देखरेख में यह पूरा कार्य कराया जा रहा है । घटिया निर्माण के कारण ढही सीढ़ी ने मजदूर के जीवन और उसके जान पर संकट उत्पन्न कर दिया और दूसरी तरफ रेंजर ने उसे उसकी हाल पर छोड़ दिया जो अपने अधीनस्थ नियोजित मजदूर की उपेक्षा की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
हमने अपने पिछले समाचार में बताया कि किस प्रकार से वॉच टॉवर के निर्माण में घटिया सामग्रियों का उपयोग किया जा रहा है, किस तरह से यह वास्तव में गुणवत्ताहीन होने के साथ-साथ जान को जोखिम में डालने वाला भी साबित हो सकता है। वॉच टावर के निर्माण में गुणवत्ता को ताक पर रखा जा रहा है क्योंकि इसकी कोई निगरानी करने वाला नहीं है।
इस वॉच टावर का निर्माण के दौरान करीब 20 फीट ऊंचाई से एक मजदूर गिरकर हादसे का शिकार हो गया। यह घटना विभाग के लोगों ने, रेंजर ने सबसे छुपाई और घायल मजदूर के इलाज में न सिर्फ लापरवाही बरती गई बल्कि उसे उसके हाल पर जीने- मरने के लिए छोड़ दिया गया। उसकी कोई खोज-खबर नहीं ली गई, न ही उसे पर्याप्त आर्थिक सहायता नियोक्ता होने के नाते प्रदान की गई। हालांकि वन विभाग में विकास व निर्माण का काम कार्य एजेंसी रेंजर के माध्यम से कराया जाता है किंतु ठेका पद्धति हावी है।
वॉच टावर के मामले में भी कुछ ऐसा ही है जिसमें 26 फरवरी 2026 को हुई घटना में मजदूर राकेश खड़िया की जान पर बन आई। उसकी पत्नी श्रीमती कलेश्वरी खड़िया भी मौके पर काम कर रही थी। इस घटना ने मजदूर राकेश खड़िया को गंभीर रूप से घायल करने के साथ-साथ उसकी पत्नी व दो मासूम बच्चों पर दु:खों का पहाड़ तोड़ दिया। ऐसे बुरे वक्त में काम करा रहे ठेकेदार के द्वारा आनन फानन में उपचार हेतु निजी अस्पताल पहुंचाया गया जहां ऑपरेशन में लाखों रुपए खर्च होने की बात सामने आने पर 3 दिन उपचार के बाद जिला अस्पताल रेफर करा दिया गया। जिला अस्पताल से उस मरीज को उच्च उपचार के लिए हायर सेंटर मेकाहारा,रायपुर रेफर कर दिया गया। इस पूरे घटनाक्रम में जब उसे कोरबा से रेफर किया गया तो फिर उसकी सुध लेना किसी ने जरूरी नहीं समझा।
👉🏻लेन-देन का हिसाब गोलमाल :- विभागीय सूत्र बताते हैं कि इस पूरे मामले में लेन-देन का हिसाब बड़ा गोलमाल है। काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा से लेकर, दुर्घटना बीमा और उपचार आदि की जिम्मेदारी संबंधित नियोक्ता की होती है लेकिन चिंताजनक बात यह है कि अनेक मजदूरों का ना तो कोई रिकॉर्ड होता है और ना ही कोई हिसाब, ना सुरक्षा ना दुर्घटना बीमा। चुनिंदा कुछ मजदूरों का एक आंकड़ा, उनका नाम, खाता नंबर आदि पहले से जिम्मेदार अधिकारियों के पास मौजूद रहता है, जैसा इस मामले में रेंजर के पास है। उनके नाम से पैसा जमा होता है और उसे निकाल कर एडजस्टमेंट कर लिया जाता है। लेकिन इससे पहले, काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर को हर हफ्ते मजदूरी चाहिए होती है। राकेश खड़िया को 600 रुपये प्रति दिन के हिसाब से सप्ताह में मजदूरी दिया जाता था लेकिन कार्य के दौरान उसकी सुरक्षा, दुर्घटना बीमा, उपचार आदि के मामले में उपेक्षा का शिकार होना पड़ा। अब ऐसे हालात में मुख्य नियोक्ता रेंजर अपने आपको सेफ कर कर बच निकला और कथित ठेकेदार जिसने मजदूर को काम पर लगाया था, वह भी थोड़ा-बहुत खर्चा -पानी देकर पल्ला झाड़ लिया। चूंकि नियमतः बात पूरी तरह से रेंजर और वन विभाग पर ही आना है लेकिन इस मामले में सबने अपना पल्ला झाड़ लिया और पूरी बात को दबाने का भरसक प्रयास किया जाता रहा जिसमें भी कामयाब भी हुए।
👉🏻अब सवाल उठता है कि खुद को सुरक्षित करने के लिए दूसरों की जान को दांव पर लगाने वाले ऐसे गैरजिम्मेदार रेंजर और उनको संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई कौन करेगा? मजदूर के साथ हुए हादसे की जिम्मेदारी कौन लेगा? घटिया निर्माण के कारण जान जोखिम में जाने की घटना के लिए आखिर किसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा? क्या इस मामले की जांच होगी? क्या घटिया निर्माण करने वाले रेंजर पर कोई जवाबदेही तय होगी या फिर जैसा चला आ रहा है, इस ढर्रे पर सब कुछ चलता रहेगा…? वन विभाग के अधिकारियों की संवादहीनता के कारण उनका पक्ष लिया जाना संभव नहीं हो सका है।






